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चर्चा में: भाजपा ने मेनका-वरुण का कद घटाया, कहीं इसकी वजह सोनिया-राहुल तो नहीं?

Sat, 09 Oct 2021 11:24 PM IST
प्रतिभा ज्योति प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Sat, 09 Oct 2021 11:24 PM IST
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सार
एक समय था कि भाजपा में मेनका गांधी और वरुण गांधी की खास पूछ थी। सोनिया-राहुल से मुकाबला करने के लिए ही उन्हें भाजपा में लाया गया था लेकिन वे सोनिया-राहुल विरोधी इमेज नहीं बना सके। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में दोनों को जगह नहीं मिलने के बाद यह चर्चा तेज है कि क्या भाजपा में अब मां-बेटे की इस जोड़ी की प्रासंगिकता या जरूरत खत्म हो गई है? 
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BJP leaders Varun Gandhi and Maneka Gandhi dropped from national executive has sonia rahul reduced the importance of them
सोनिया-राहुल की वजह से घट गई मेनका वरुण की पूछ - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है। लोकसभा हो या विधानसभा हर चुनाव में कांग्रेस उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पा रही है। राजस्थान-पंजाब जैसे राज्यों में कांग्रेस ने सत्ता जरूर हासिल की, लेकिन अंदरूनी कलह ने यहां भी पार्टी का खेल बिगाड़ा। इससे सोनिया-राहुल के नेतृत्व पर सवालिया निशान लग रहे हैं तो इसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ रहा है और यह स्वाभाविक है। लेकिन क्या इसका असर भारतीय जनता पार्टी की नेता मेनका गांधी और वरुण गांधी के सियासी करियर पर भी पड़ रहा है?


यह सवाल जरूर हैरानी पैदा कर सकता है  कि सोनिया-राहुल की वजह से मेनका-वरुण को क्या नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन राजनीति के जानकार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मां-बेटे को जगह नहीं मिलने का यही मतलब निकाल रहे हैं कि जैसे-जैसे सोनिया-राहुल कमजोर पड़ रहे हैं भाजपा में मेनका-वरुण की अहमियत भी कम हो गई है।


पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गांधी कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों का समर्थन कर रहे थे। लखीमपुर खीरी कांड को लेकर वे लगातार योगी सरकार पर निशाना साध रहे थे और जिस तरह का बागी तेवर अपनाए हुए थे तभी राजनीतिक पंडितों को अंदेशा हो गया था कि अब भाजपा में उनका भविष्य उज्जवल नहीं है। जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मेनका गांधी और उनके बेटे वरुण गांधी को जगह नहीं मिली तो सवाल उठने शुरू हो गए। 

क्या है राष्ट्रीय कार्यकारिणी का महत्व
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी 80 सदस्यों की समिति होती है जिसे नीति-निर्धारक समिति माना जाता है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल होने वाले नेताओं की पार्टी में एक खास जगह होती है। इस बार पार्टी ने कई नए नेताओं को कार्यकारिणी में जगह दी है, जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, विजय बहुगुणा और मिथुन चक्रवर्ती भी शामिल हैं। 

भाजपा के मीडिया संपर्क अधिकारी सुदेश वर्मा से जब यह पूछा गया तो उन्होंने अमर उजाला डिजिटल को बताया कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी में किसी को रखने का फैसला पार्टी नेतृत्व करती है। नए लोग आते हैं और पुराने जाते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। पार्टी जो भूमिका देखती है वह देती है। वे अभी लोकसभा सदस्य हैं। पार्टी में सब लोगों का महत्व रहता है। 

 

सोनिया गांधी और मेनका गांधी
सोनिया गांधी और मेनका गांधी - फोटो : फाइल फोटो
सोनिया के मुकाबले के लिए मेनका आईं
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, उस समय यह माना गया कि उत्तर प्रदेश में सोनिया गांधी का मुकाबला अगर कोई कर सकता है तो वह मेनका गांधी ही है। सोनिया और मेनका के रिश्तों में पड़ी दरार और इंदिरा गांधी से मेनका की नाराजगी से हर कोई वाकिफ है और भाजपा ने पारिवारिक रिश्तों में पड़ी दरार और नाराजगी का सियासी फायदा उठाने की कोशिश की और मेनका को पार्टी में शामिल किया।

उन्हें उत्तर प्रदेश से लगातार लोकसभा चुनाव का टिकट दिया गया और मेनका जीतकर संसद भी पहुंचती रही। लेकिन कांग्रेस के गिरते ग्राफ के कारण आज भाजपा में मेनका गांधी और वरुण गांधी की वैसी जरूरत और राजनीतिक प्रासंगिकता नहीं रह गई है। दोनों की एंट्री भाजपा में इसलिए हुई थी कि गांधी परिवार को जवाब दिया जाए। 

पार्टी ने बहुत कुछ दिया
वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामशेषण बताती हैं कि दोनों को प्रमोद महाजन पार्टी में लेकर आए थे। वे अक्सर हमें कहा करते थे कि अब भाजपा में भी दो गांधी हैं, हमारे पास भी अब गांधी परिवार है और इस पर सिर्फ कांग्रेस का हक नहीं। वे बताती हैं कि मेनका गांधी जब भाजपा में शामिल हुई थीं तब भाजपा का उत्तर प्रदेश में असर कम था। मेनका की पार्टी में पूछ हुई। उनके पीछे-पीछे वरुण भी शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें बहुत कुछ दिया। 

एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि मेनका गांधी को शामिल करके भाजपा ने एक बड़ा जोखिम लिया था क्योंकि वे संजय गांधी की पत्नी हैं। संजय गांधी पर आपतकाल लागू कराने की मुख्य भूमिका मानी जाती है। लेकिन पार्टी खुश थी कि सोनिया का मुकाबला करने के लिए इंदिरा की दूसरी बहू को लाकर उनकी काट ढूंढ ली गई है। सूत्रों के मुताबिक मेनका को यह समझाया गया कि उनके बेटे का भविष्य भी भाजपा में ही है। अपने बेटे को सम्मानजक स्थान देने के शर्त पर ही मेनका भाजपा में शामिल हुई थीं।
 

वरूण गांधी
वरूण गांधी
वरुण गांधी की भाजपा में एंट्री 2004 में हुई थी तब की कांग्रेस पर सोनिया गांधी का पूरा राज था। यही वह वक्त था जब राहुल गांधी पहली बार 2004 में अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। सोनिया राज से ही यह माना जाने लगा था कि आगे कांग्रेस की बागडोर राहुल गांधी संभालेंगे। जिस वक्त वरुण भाजपा में आए थे तब की भाजपा पर वाजपेयी-आडवाणी की छाप थी। उन्हें लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और प्रमोद महाजन का पूरा समर्थन हासिल हुआ। गांधी परिवार से ही एक दूसरे मां-बेटे की जोड़ी को अपनी पार्टी में लाकर भाजपा गदगद थी।

राजनाथ के दौर में यूपी का प्रमुख चेहरा माने गए वरूण
राधिका रामशेषण के मुताबिक राजनाथ सिंह जब पार्टी अध्यक्ष तो दोनों मां-बेटे को पार्टी से बहुत कुछ मिला। जब तक भाजपा की कमान राजनाथ सिंह के पास रही, तब तक वरुण गांधी की पार्टी में सम्मानजनक जगह रही। राजनाथ सिंह जब अध्यक्ष थे तो 2013 में उन्हें महासचिव बनाया और वे सबसे युवा महासचिव बने। फिर उन्हें पश्चिम बंगाल का प्रभारी बना दिया गया। लेकिन जैसे ही भाजपा की कमान अमित शाह के हाथ में आई, तो वरुण गांधी पार्टी महासचिव पद से विदा हो गए और पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी भी उनसे ले ली गई। जबकि राजनाथ सिंह के दौर में उन्हें यूपी में पार्टी की प्रमुख चेहरा माना जाने लगा था।

ऐसा रहा वरुण का करियर 
2004 में वरुण 25 साल के भी नहीं हुए थे इसलिए उस साल लोकसभा चुनाव नहीं लड़ पाए थे। सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने 2006 में उन्हें मध्यप्रदेश की विदिशा का उपचुनाव लड़ाने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला। बताया जाता है कि वे तभी भाजपा नेतृत्व से नाराज हो गए।

2009 में वे पहली बार चुनाव में खड़े हुए और राजनीति में प्रवेश किया। उन्हें पीलीभीत से मां मेनका गांधी की सीट से टिकट दे दिया गया। वे पौने तीन लाख वोटों से जीते। उस समय जीत का यह मार्जिन गांधी परिवार के तीन अन्य सदस्यों सोनिया, राहुल और मेनका से भी ज्यादा थी। उसके बाद 2014 में वे सुल्तानपुर से और 2019 में पीलीभीत से चुनाव जीत कर संसद पहुंचे। 
 

वरुण गांधी
वरुण गांधी - फोटो : amar ujala
राहुल का जवाब नहीं बन पाए वरुण
हालांकि वरुण गांधी को जिस तरह राहुल गांधी के जवाब के तौर पर लाया गया था वे उसमें सफल नहीं माने गए। ना ही मेनका और वरूण सोनिया और राहुल विरोधी इमेज बना सके। हां पार्टी को इतना जरूर फायदा हुआ कि वरुण ने राहुल गांधी की धर्मनिरपेक्ष छवि से विपरीत कम्यूनल छवि बनाने की कोशिश की और यह वोटों के ध्रुवीकरण में मददगार बना। लेकिन पार्टी के कुछ नेता इस बात से चिढ़ते रहे।   

कद कैसे घटता गया?
भाजपा और संघ को लंबे समय से कवर करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार एक किस्सा बताते हैं। 2013 का समय था। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने की चर्चा जोरों पर थी। लेकिन मई मेंआयोजित पार्टी की स्वाभिमान रैली में वरुण गांधी ने तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह की जमकर तारीफ की और उनकी तुलना वाजपेयी से कर दी। उनके इस बयान से इस बात को हवा मिली की कहीं 2014 में पीएम पद की रेस में राजनाथ सिंह भी तो शामिल नहीं हो गए।

दूसरी तरफ मोदी जब गोवा में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुने गए तो वरुण गांधी आडवाणी खेमे के साथ खड़े हो गए और पीएम उम्मीदवार के तौर पर राजनाथ सिंह को अपनी पसंद बताई। सूत्रों के मुताबिक इस घोषणा के बाद 2014 के चुनाव से पहले जब मोदी दिल्ली आए तो वे यहां एक सप्ताह रूके लेकिन कोशिश करने के बाद भी उन्होंने वरूण गांधी को मिलने का समय नहीं दिया। 

राधिका रामशेषण बताती हैं मेनका और वरुण की कभी मोदी-शाह जोड़ी के साथ जमी नहीं और इसलिए धीरे-धीरे दोनों मां-बेटे किनारे लगा दिए गए। यही वजह रही कि 2019 की जीत के बाद मोदी मंत्रिमंडल में दोनों में से किसी को जगह नहीं दी गई।

 

varun gandhi
varun gandhi - फोटो : सोशल मीडिया
एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले 2016 में यूपी में राष्ट्रीय कार्यकरिणी की बैठक इलाहाबाद में हो रही थी। एयरपोर्ट से लेकर सभा स्थल तक बड़े-बड़े वरुण गांधी को मुख्यमंत्री बनाने के होर्डिंग लगा दिए गए। पूरे शहर में ऐसे होर्डिंग लगे थे। इससे पार्टी नेतृत्व सख्त नाराज हो गई और तुरंत पोस्टर और होर्ड़िंग्स हटाने के आदेश दिए गए। उसके बाद 2017 के चुनाव में उनकी कोई भूमिका नहीं रही। 

राधिका रामशेषण एक अन्य किस्सा सुनाती हैं। 2017 के चुनाव के समय एक बार मेनका ने कहीं यह बयान दे दिया कि मुख्यमंत्री के रूप में वरुण भी एक चेहरा हैं और इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। बाद में शाह उनके घर गए और उन्हें यह बयान वापस लेना पड़ा। रामशेषण मेनका और वरुण को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नहीं शामिल किए जाने का यही मतलब निकालती हैं कि अब उनकी पार्टी में पारी खत्म हो गई है। उनका कहना है कि जब गांधी परिवार का वह औरा और उस नाम में वह आकर्षण ही नहीं बचा तो अब क्या लड़ाई है।

अब उनके पास रास्ता क्या 
भाजपा में उपेक्षित होने के बाद क्या मेनका और वरुण कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं? राधिका रामशेषण इस बात से बिल्कुल इंकार करती हैं। उनका मानना है कि वे पार्टी जरूर छोड़ सकते हैं लेकिन कांग्रेस  उनके लिए विकल्प है क्या यह नहीं कहा जा सकता। क्योंकि सोनिया तो छोड़िए राहुल-प्रियंका से भी उनके संबंध उतने मधुर  नहीं लगते है। उनकी शादी में इस परिवार से कोई नहीं गया था। अगर वरुण जाएंगे तो उत्तर प्रदेश में किसी गैर कांग्रेसी पार्टी में जा सकते हैं।  

वरुण ने क्यों अपनाए बागी तेवर
वरुण को अपनी सियासी जमीन बचाने की चिंता थी। लखीमपुर खीरी, सुल्तानपुर और उधमसिंह नगर- सिखों का इलाका है। उनके संसदीय क्षेत्र पीलीभीत में भी सिख आबादी है। लखीमपुर खीरी में प्रदर्शन कर रहे ज्यादा किसान सिख थे। मेनका गांधी सिख परिवार से हैं और उनका इन मतादाताओं के बीच जनाधार माना जाता है। ऐसे में मेनका-वरुण को डर था कि किसान आंदोलन का नुकसान उन्हें चुनावों में उठाना पड़ सकता है। 

बताया जाता है कि वरुण गांधी अपने संसदीय क्षेत्र में लोगों की निजी तौर भी बहुत मदद करते हैं। कई गरीब बच्चों की शिक्षा और गरीब लड़कियों की शादी करवाई है। वे कविताएं और लेख लिखते हैं। माना जा रहा है कि यदि पार्टी ने उनसे और उनकी मां से किनारा किया तो पार्टी को इन दोनों नेताओं के संसदीय क्षेत्र में नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

 
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