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गरीब सवर्ण को आरक्षण की पहल से खिला भाजपा नेताओं का चेहरा

Tue, 08 Jan 2019 11:37 PM IST
गौरव द्विवेदी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव द्विवेदी Updated Tue, 08 Jan 2019 11:37 PM IST
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BJP leaders feeling happy with General Reservation Bill

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के राज्यसभा में प्रवेश करते समय चेहरे से आत्मविश्वास साफ झलक रहा था। इस चमक का बड़ा कारण गरीब सवर्ण को आरक्षण देने की पहल मानी जा रही है। वित्त राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ला, भाजपा महासचिव भूपेन्द्र यादव, राज्यसभा सांसद विनय सह बुद्धे के चेहरे पर गरीब सवर्ण को आरक्षण देने की पहल ने मुस्कान ला दी है। संविधान के इस 124वें संविधान संशोधन को रेल मंत्री पीयूष गोयल गेम चेंजर मानते हैं। भाजपा नेता जहां इसे गरीब सवर्ण का अधिकार मिलने से जोड़ रहे हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी असहज महसूस कर रही है। कांग्रेस गरीबों को आरक्षण दिए जाने का समर्थन तो कर रही है, लेकिन अपनी राजनीतिक लाइन को लेकर उलझ गई है।

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कांग्रेस और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की सबसे बड़ी दुविधा राफेल लड़ाकू विमान सौदे के मुद्दे को लेकर है। संसद के आखिरी दिन में यह मुद्दा और पार्टी की जेपीसी जांच की मांग दोनों अपना असर नहीं दिखाई पाई। पार्टी के नेताओं को 9 जनवरी को भी इसमें कोई जान नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीके हरिप्रसाद का मानना है कि इसके असर से कुछ जरूरी मुद्दे थोड़े समय के लिए दब जाएंगे। इसकी चिंता अब केवल सदन में चर्चा के दौरान ही संभव है। हरिप्रसाद का कहना है कि कांग्रेस गरीब सवर्ण को आरक्षण देने के पक्ष में है, लेकिन केन्द्र सरकार का यह कदम चुनावी जुमला है। 
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राष्ट्रीय जनता दल के प्रो. मनोज झा, जय प्रकाश नारायण यादव, समाजवादी पार्टी के प्रो. राम गोपाल यादव, बसपा के सतीश चंद्र मिश्र, एनसीपी की सुप्रिया सुले, लोकजनशक्ति पार्टी के प्रमुख चिराग पासवान और राम विलास पासवान समेत अन्य ने केन्द्र सरकार के संविधान संशोधन बिल का समर्थन किया है। विपक्षी दलों की यह बेचारगी भाजपा के नेताओं के चेहरे पर मुस्कान ला रही है। माना जा रहा है कि यह बिल लोकसभा में पारित होने के बाद बुधवार को राज्यसभा में आएगा और वहां इसे व्यापक विमर्श के लिए समिति के पास भेजे जाने की मांग उठ सकती है।

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जातिगत राजनीति गरमाई

गरीब सवर्ण को आरक्षण देने का बिल पेश होने के बाद संसद में राजनीतिक दलों ने जातिगत राजनीति को फिर हवा देना शुरू कर दिया है। राजद के प्रो. मनोज झा ने एससी, एसटी, ओबीसी के लिए दिए जा रहे आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 85 प्रतिशत करने की मांग की। समाजवादी पार्टी के प्रो. रामगोपाल यादव ने अन्य पिछड़ी जाति के लोगों के लिए इसे 27 फीसदी से बढ़ाकर 54 प्रतिशत करने की मांग की। राजद के जय प्रकाश यादव का कहना है कि सरकार जातिगत आधार पर जनगणना कराए और जिसकी जितनी आबादी हो, उसे उस हिसाब से आरक्षण दिए जाएं। 

विपक्षी दलों के पास बस एक बहाना

एनसीपी की सुप्रिया सूले ने सवाल उठाया कि सरकार संसद का शीत कालीन सत्र समाप्त होने के अंतिम दिन इस बिल को लेकर क्यों आई? रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा, कांग्रेस के दीपेन्द्र हुड्डा, राजद के जयप्रकाश यादव, समाजवादी पार्टी के धर्मेंन्द्र यादव समेत तृणमूल और अन्य राजनीतिक दलों के सांसदों ने भी यही सवाल उठाया है। कांग्रेस पार्टी के बीके हरिप्रसाद, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद, राजद की मीसा भारती ने भी यही सवाल उठाया है। हालांकि इस बारे में केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री का शिवप्रताप शुक्ला ने कहा कि इस सवाल का कोई अर्थ नहीं है। सरकार यह बिल लाई है। वह गरीब सवर्णों को उनका अधिकार देकर सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ आगे बढ़ रही है। यह ऐतिहासिक और स्वागत योग्य कदम है। 

भाजपा के चेहरे पर खुशी, विपक्ष के चेहरे पर मातम क्यों?

-पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद राजस्थान, छत्तीसगढ़, म.प्र. में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का देश में जादू फीका पड़ जाने के तौर पर देखा जा रहा है। चुनाव नतीजे आने के बाद से कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों के चेहरे खिल गए हैं। माना जा रहा है कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने बिल लाकर सबकी बोलती बंद कर दी है। राफेल लड़ाकू विमान, किसान, रोजगार समेत अन्य मुख्य मुद्दे फिलवक्त दब गए हैं।

-2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर भाजपा की सबसे बड़ी चिंता उ.प्र. को लेकर है। यहां से ब्राह्मण समेत अन्य मतदाताओं पार्टी की पकड़ कमजोर हो रही थी। म.प्र. समेत तमाम राज्यों में सवर्ण मतदाता भाजपा से नाराज बताए जा रहे थे। एक अनुमान के मुताबिक उ.प्र. करीब 28 प्रतिशत सवर्ण मतदाता हैं। इनमें करीब 15 प्रतिशत ब्राह्मण, चार-पांच प्रतिशत क्षत्रिय समेत अन्य हैं। माना जा रहा है कि यह बिल अगड़ी जातियों को भाजपा के साथ बने रहने में सहायक होगा।

-भाजपा को इसका फायदा उ.प्र., म.प्र. के अलावा गुजरात, झारखंड, राजस्थान, म.प्र., दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, असम, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल में मिल सकता है। इन राज्यों में 2014 के चुनाव में भाजपा ने 190 से अधिक सीटों को जीतने में सफलता पाई थी। 

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