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Murli Manohar Joshi: 'हम अब विश्वगुरु नहीं, संस्कृत को बढ़ाने की जरूरत', भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी का बयान
Tue, 21 Apr 2026 07:20 AM IST
Nirmal Kant
ब्यूरो, नई दिल्ली।
ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: Nirmal Kant
Updated Tue, 21 Apr 2026 07:20 AM IST
सार
Murli Manohar Joshi: भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि भारत अब वर्तमान में विश्वगुरु नहीं है। हालांकि, ऐसी आकांक्षा रखना जरूरी है और संस्कृत को आधुनिक तकनीक सहित विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ावा दिया जाना चाहिए। पढ़िए रिपोर्ट-
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मुरली मनोहर जोशी, भाजपा के वरिष्ठ नेता
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार और क्वांटम कंप्यूटिंग में भी इसके उपयोग की वकालत करते हुए कहा कि भारत अब विश्वगुरु नहीं है। साथ ही कहा, हमें विश्वगुरु बनने की आकांक्षा जरूर रखनी चाहिए।
जोशी ने संस्कृत को भारत की राजभाषा बनाने की भी जोरदार वकालत की और कहा कि भीम राव आंबेडकर सहित कई लोगों ने अतीत में इसके लिए प्रयास किए थे, लेकिन प्रस्तावों को मंजूरी नहीं मिली। जोशी संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर पत्रकारों से बात कर रहे थे।
भारत के विश्वगुरु के रूप में उभरने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बनाने के दौरान संस्कृत के संवर्धन में देश की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि वर्तमान में इस शब्द का प्रयोग करने से परहेज करना चाहिए कि हम विश्वगुरु हैं।
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भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, सचमुच, एक समय हम विश्वगुरु थे। लेकिन आज वास्तविकता यह है कि वर्तमान में ऐसा नहीं हैं। जोशी ने कहा कि इस दृष्टिकोण से, संस्कृत आज बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने संस्कृत भाषा को और अधिक बढ़ावा देने पर जोर दिया। साथ ही कहा, क्वांटम कंप्यूटिंग सहित आधुनिक वैज्ञानिक कार्यों में इसका उपयोग किया जाना चाहिए।
भारत में संस्कृत का अधिक प्रचार-प्रसार जरूरी : भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने देश में संस्कृत के अधिक प्रचार-प्रसार की सोमवार को पुरजोर वकालत की। उन्होंने कहा कि इसके प्रसार में वृद्धि
न सिर्फ अन्य सभी भारतीय भाषाओं को समृद्ध करेगी और उनके बीच एक सेतु का काम करेगी, बल्कि लोगों को भारत के प्राचीन विचारों और संस्कृति से भी जोड़ेगी। भागवत सोमवार को संस्कृत भारती के नवनिर्मित केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे।
ये भी पढ़ें: पीएम के झालमुड़ी खाने का कमाल, गूगल सर्च ट्रैफिक ने 22 वर्षों में सर्वोच्च स्तर छुआ
उन्होंने कहा, भारत नाम केवल भौगोलिक नहीं है। भारत एक परंपरा है, एक आधार है जिस पर जीवन का प्रवाह निरंतर बना रहता है। यह एक ऐसी परंपरा है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में जीवन को बनाए रखती है, जिसमें इसके सभी सजीव और निर्जीव घटक शामिल हैं। विश्व को इस परंपरा की निरंतर आवश्यकता है और इस आवश्यकता को पूरा करना उन लोगों का कर्तव्य है जो स्वयं को भारतीय मानते हैं।
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जोशी ने संस्कृत को भारत की राजभाषा बनाने की भी जोरदार वकालत की और कहा कि भीम राव आंबेडकर सहित कई लोगों ने अतीत में इसके लिए प्रयास किए थे, लेकिन प्रस्तावों को मंजूरी नहीं मिली। जोशी संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर पत्रकारों से बात कर रहे थे।
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भारत के विश्वगुरु के रूप में उभरने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बनाने के दौरान संस्कृत के संवर्धन में देश की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि वर्तमान में इस शब्द का प्रयोग करने से परहेज करना चाहिए कि हम विश्वगुरु हैं।
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भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, सचमुच, एक समय हम विश्वगुरु थे। लेकिन आज वास्तविकता यह है कि वर्तमान में ऐसा नहीं हैं। जोशी ने कहा कि इस दृष्टिकोण से, संस्कृत आज बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने संस्कृत भाषा को और अधिक बढ़ावा देने पर जोर दिया। साथ ही कहा, क्वांटम कंप्यूटिंग सहित आधुनिक वैज्ञानिक कार्यों में इसका उपयोग किया जाना चाहिए।
भारत में संस्कृत का अधिक प्रचार-प्रसार जरूरी : भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने देश में संस्कृत के अधिक प्रचार-प्रसार की सोमवार को पुरजोर वकालत की। उन्होंने कहा कि इसके प्रसार में वृद्धि
न सिर्फ अन्य सभी भारतीय भाषाओं को समृद्ध करेगी और उनके बीच एक सेतु का काम करेगी, बल्कि लोगों को भारत के प्राचीन विचारों और संस्कृति से भी जोड़ेगी। भागवत सोमवार को संस्कृत भारती के नवनिर्मित केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे।
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उन्होंने कहा, भारत नाम केवल भौगोलिक नहीं है। भारत एक परंपरा है, एक आधार है जिस पर जीवन का प्रवाह निरंतर बना रहता है। यह एक ऐसी परंपरा है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में जीवन को बनाए रखती है, जिसमें इसके सभी सजीव और निर्जीव घटक शामिल हैं। विश्व को इस परंपरा की निरंतर आवश्यकता है और इस आवश्यकता को पूरा करना उन लोगों का कर्तव्य है जो स्वयं को भारतीय मानते हैं।
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