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दलबदलुओं को टिकट देने में भाजपा ने कांग्रेस को पछाड़ा
रीता तिवारी/अमर उजाला,
Updated Thu, 24 Mar 2016 10:12 AM IST
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- फोटो : Getty Images
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पूर्वोत्तर का प्रवेशद्वार कहे जाने वाले असम के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हराकर सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रही भाजपा ने दलबदलुओं को टिकट देने के मामले में तो उसे पछाड़ ही दिया है। कांग्रेस ने अबकी बार जहां पांच दलबदलुओं को टिकट दिया है, तो वहीं भाजपा की सूची में 14 दलबदलू शामिल हैं।
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लेकिन जब दोनों दलों के प्रत्याशियों की सूची पर गौर किया जाए, तो यह आंकड़ा और अहम नजर आता है। दरअसल, कांग्रेस जहां राज्य की 126 में से 122 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, तो भाजपा महज 86 सीटों पर मैदान में उतर रही है।
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भाजपा की सूची में सबसे अहम नाम है पूर्व स्वास्थ्य मंत्री हिमंत विश्वशर्मा का। वह बीते साल सितंबर तक कांग्रेस के प्रमुख नेता थे। भाजपा की सूची देखने के बाद कांग्रेस प्रवक्ता अपूर्व भट्टाचार्य कहा कि भाजपा के पास योग्य उम्मीदवारों की भारी कमी है। लिहाजा उसने कांग्रेस और असम गण परिषद (अगप) समेत दूसरे दलों से आने वाले इतने लोगों को टिकट दिए हैं।
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'हमारी सूची में ऐसे चार-पांच लोग ही हैं'
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- फोटो : Getty Images
वही, कांग्रेस की सूची में दलबदलुओं के नाम शामिल होने का बचाव करते हुए भट्टाचार्य ने कहते हैं कि हमारी सूची में ऐसे चार-पांच लोग ही है, जो योग्य हैं और सबका दामन साफ-सुथरा है। इनमें चार बार अगप से विधायक और दो बार मंत्री रहे जय नाथ शर्मा के अलावा दुर्गा दास बोरो और एआईयूडीएफ के दो निवर्तमान विधायक शरमन अली अहमद व अब्दुर रहमान के साथ आसू के पूर्व अध्यक्ष शंकर प्रसाद राय शामिल है।
राय ने दो सप्ताह पहले ही कांग्रेस का दामन थामा था। दूसरी ओर, भाजपा की सूची में सात ऐसे उम्मीदवार शामिल हैं, जो पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे। इसके अलावा पांच लोग पहले असम गण परिषद में थे।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ऐसे नेता महज निजी फायदे के लिए ही दल बदलते हैं। उनसे निष्ठा की उम्मीद करना बेमानी है। कल तक दूसरे दलों की भक्ति का राग अलापने वाले इन नेताओं को जैसे ही भनक लगी कि अबकी उनका पत्ता कट सकता है, तो उन्होंने दूसरे दलों का दामन थाम लिया। ऐसे में सवाल यह है कि क्या मतदाता इन नेताओं पर एक बार फिर भरोसा जताएंगे?
राय ने दो सप्ताह पहले ही कांग्रेस का दामन थामा था। दूसरी ओर, भाजपा की सूची में सात ऐसे उम्मीदवार शामिल हैं, जो पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे। इसके अलावा पांच लोग पहले असम गण परिषद में थे।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ऐसे नेता महज निजी फायदे के लिए ही दल बदलते हैं। उनसे निष्ठा की उम्मीद करना बेमानी है। कल तक दूसरे दलों की भक्ति का राग अलापने वाले इन नेताओं को जैसे ही भनक लगी कि अबकी उनका पत्ता कट सकता है, तो उन्होंने दूसरे दलों का दामन थाम लिया। ऐसे में सवाल यह है कि क्या मतदाता इन नेताओं पर एक बार फिर भरोसा जताएंगे?