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जन्मदिन स्पेशल: इस बड़ी सजा के बाद चंद्रशेखर बने 'आजाद', अंग्रेजों में जगाया डर

Mon, 23 Jul 2018 03:10 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 23 Jul 2018 03:10 PM IST
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Birthday Special: Chandra Shekhar becomes 'Azad' after this big punishment

आज भारत मां के वीर सपूत और महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जयंती है। कभी अंग्रेजी हुकूमत के आगे न झुकने की कसम खाने वाले चंद्रशेखर ने दो लाइनें भी लिखी थीं। जिसमें उन्होंने आजादी की लहर फूंक दी थी। ये लाइनें थीं- दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं आजाद ही रहेंगे। वह अपने जीवन का केवल एक ही मकसद मानते थे जो थी आजादी। इसी कारण उन्होंने अपना नाम भी चंद्रशेखर तिवारी से बदलकर चंद्रशेखर आजाद रख लिया।

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देश की आजादी के लिए लोहा लेने वाले चंद्रशेखर का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिसे के भावरा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडिता सीताराम तिवारी जबकि माता का नाम जगरानी देवी था। गांव के ही स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद वे अध्ययन के लिए वाराणसी की ओर चले गए। वहां वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित हुए और असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। चंद्रशेखर इस दुनिया में महज 24 साल ही बिता पाए लेकिन उनसे और उनके साथी क्रातिकारियों से अंग्रेज खौफ खाया करते थे।
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13 साल की उम्र में खाए 15 कोड़े, फिर कहलाए आजाद

साल 1921 में महज 13 साल की उम्र के चंद्रशेखर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। वह संस्कृत कॉलेज के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे। चंद्रशेखर को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस उन्हें मजिस्ट्रेट के पास लेकर गई। वहां जब मजिस्ट्रेट ने उनसे उनका नाम पूछा तो उन्होंने कहा आजाद, जब उनके पिता का नाम पूछा गया तो उन्होंने कहा स्वाधीनता। इसके बाद उनसे उनके घर का पता भी पूछा गया।
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चंद्रशेखर ने पूरी निडरता के साथ जवाब देते हुए कहा जेल। उनकी तरफ से ऐसे जवाब सुनकर मजिस्ट्रेट गुस्से में आ गया और उन्हें 15 कोड़े मारने की सजा दी गई। छोटा बालक होकर इतनी बड़ी सजा मिलने के बाद भी वह डरे नहीं। कोड़े पड़ने से उनकी कमर लहू लूहान हो चुकी थी। जब भी उन्हें कोड़ा पड़ता तो वह महात्मा गांधी की जय बोलते। उसी दिन से उनके नाम के आगे आजाद जुड़ गया।

वेश बदलकर दिया कई गतिविधियों को अंजाम

Birthday Special: Chandra Shekhar becomes 'Azad' after this big punishment

असहयोग आंदोलन खत्म होने के बाद चंद्रशेखर की विचारधारा में बदलाव आया और वह क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए। वह हिंदुस्तान सोशल रिपब्लिक आर्मी में शामिल हो गए। उन्होंने कई क्रांतिकारी गतिविधियों जैसे काकोरी कांड, सांडर्स-हत्या को अंजाम दिया। उनके साथियों के छोटे से समूह ने अंग्रेजों को परेशान कर दिया था।

अंग्रेजों ने पकड़ने के लिए रखा इनाम

पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए उन पर 5,000 रुपये का इनाम भी रखा। लेकिन वह वेश बदलकर आसानी से अपनी योजनाओं को अंजाम देते रहे। उस समय में 5 हजार रुपये बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी।

कैद से बचने के लिए खुद को मारी गोली और हो गए आजाद

अंत में 27 फरवरी 1931 के दिन पुलिस ने उन्हें इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया था। वह आजाद थे और कभी कैद में नहीं आना चाहते थे इसलिए उन्होंने स्वयं गोली चलाकर अपनी जान दे दी और सदा के लिए आजाद हो गए। उन्हीं के बलिदान से प्रेरित होकर देश के हजारों युवा स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े। आखिरकार उनका सपना 15 अगस्त 1947 को पूरा भी हुआ और भारत विदेशी चंगुल से छूट हमेशा के लिए आजाद हो गया।

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