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बिहार के बाहुबली: छोटे सरकार की अपराध कथाएं 'अनंत', आठ की उम्र में हुआ पहला मुकदमा; सियासी हनक की है ऐसी कहानी
Mon, 03 Nov 2025 08:37 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 03 Nov 2025 08:37 AM IST
सार
बिहार चुनाव से जुड़ी नई सीरीज- ‘बिहार के बाहुबली’ की पहली कड़ी में आज बात अनंत कुमार सिंह की। जिनका नाम पहली बार पुलिस केस में आठ साल की उम्र में ही दर्ज हो गया था। तब से लेकर अब तक अनंत कुमार पर दर्जनों केस हो चुके हैं। इनमें हत्या, हत्या की साजिश, असलहे रखने से जुड़े केस, अपहरण, वसूली, आदि शामिल हैं।
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अनंत कुमार सिंह।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
'बिहार' और 'बाहुबली' दो ऐसे शब्द हैं, जिन्हें राजनीति में एक-दूसरे का पर्याय माना जाता है। बिहार में कई बाहुबलियों ने राजनीति में अपनी धमक दिखाई है। कई अभी भी सक्रिय हैं। मोहम्मद शहाबुद्दीन, आनंद मोहन से रीत लाल यादव तक इस सूची में शामिल हैं। इस सूची में एक बड़ा नाम अनंत कुमार सिंह का भी है, जिन्हें बिहार की राजनीति में 'छोटे सरकार' के नाम से जाना जाता है।
बिहार चुनाव से जुड़ी नई सीरीज- ‘बिहार के बाहुबली’ की पहली कड़ी में आज बात अनंत कुमार सिंह की। जिनका नाम पहली बार पुलिस केस में आठ साल की उम्र में ही दर्ज हो गया था। तब से लेकर अब तक अनंत कुमार पर दर्जनों केस हो चुके हैं। इनमें हत्या, हत्या की साजिश, असलहे रखने से जुड़े केस, अपहरण, वसूली, आदि शामिल हैं। इतना ही नहीं उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत भी केस दर्ज है। अनंत सिंह पर एक हालिया केस जनसुराज पार्टी के नेता दुलारचंद यादव की हत्या से जुड़ा दर्ज हुआ है। इस मामले में उनकी गिरफ्तारी भी हुई है।
Mokama Murder Case: दुलारचंद हत्याकांड में अब तक अनंत सिंह समेत 80 गिरफ्तार, तनाव के बीच सबूत खंगाल रही CID
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बिहार चुनाव से जुड़ी नई सीरीज- ‘बिहार के बाहुबली’ की पहली कड़ी में आज बात अनंत कुमार सिंह की। जिनका नाम पहली बार पुलिस केस में आठ साल की उम्र में ही दर्ज हो गया था। तब से लेकर अब तक अनंत कुमार पर दर्जनों केस हो चुके हैं। इनमें हत्या, हत्या की साजिश, असलहे रखने से जुड़े केस, अपहरण, वसूली, आदि शामिल हैं। इतना ही नहीं उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत भी केस दर्ज है। अनंत सिंह पर एक हालिया केस जनसुराज पार्टी के नेता दुलारचंद यादव की हत्या से जुड़ा दर्ज हुआ है। इस मामले में उनकी गिरफ्तारी भी हुई है।
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Mokama Murder Case: दुलारचंद हत्याकांड में अब तक अनंत सिंह समेत 80 गिरफ्तार, तनाव के बीच सबूत खंगाल रही CID
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कौन हैं बिहार के छोटे सरकार- अनंत कुमार सिंह?
अनंत कुमार सिंह का जन्म 1961 में पटना जिले के बाढ़ प्रखंड में आने वाले नदावां गांव में एक भूमिहार परिवार में हुआ। चार भाइयों में वे सबसे छोटे थे। अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह 1985 में मोकामा सीट से निर्दलीय मैदान में उतरे। इस चुनाव में उन्हें कांग्रेस के श्याम सुंदर सिंह ‘धीरज’ से हार मिली। धीरज इससे पहले 1980 में भी मोकामा से जीते थे। 1990 का विधानसभा चुनाव आया तो दिलीप सिंह को जनता दल से टिकट मिल गया। जनता दल से चुनाव लड़े दिलीप सिंह ने इस चुनाव में जीत दर्ज की। 1995 में वे फिर मोकामा सीट से विधायक चुने गए।
साल 2000 में दिलीप सिंह ने जनता दल से अलग होकर बने लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें एक और बाहुबली सूरजभान सिंह के हाथों हार मिली। दिलीप सिंह तो इसके बाद पटना से एमएलसी बनकर विधान परिषद चले गए। 2005 में जब विधानसभा चुनाव हुए तो मोकामा से अनंत सिंह पहली बार चुनाव मैदान में उतरे।
अनंत कुमार सिंह का जन्म 1961 में पटना जिले के बाढ़ प्रखंड में आने वाले नदावां गांव में एक भूमिहार परिवार में हुआ। चार भाइयों में वे सबसे छोटे थे। अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह 1985 में मोकामा सीट से निर्दलीय मैदान में उतरे। इस चुनाव में उन्हें कांग्रेस के श्याम सुंदर सिंह ‘धीरज’ से हार मिली। धीरज इससे पहले 1980 में भी मोकामा से जीते थे। 1990 का विधानसभा चुनाव आया तो दिलीप सिंह को जनता दल से टिकट मिल गया। जनता दल से चुनाव लड़े दिलीप सिंह ने इस चुनाव में जीत दर्ज की। 1995 में वे फिर मोकामा सीट से विधायक चुने गए।
साल 2000 में दिलीप सिंह ने जनता दल से अलग होकर बने लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें एक और बाहुबली सूरजभान सिंह के हाथों हार मिली। दिलीप सिंह तो इसके बाद पटना से एमएलसी बनकर विधान परिषद चले गए। 2005 में जब विधानसभा चुनाव हुए तो मोकामा से अनंत सिंह पहली बार चुनाव मैदान में उतरे।
आपराधिक इतिहास: आठ साल की उम्र में हुआ पहला केस
अनंत सिंह की कहानी उनके चुनावी राजनीति में आने से शुरू नहीं होती। मोकामा में बाहुबली अनंत सिंह की धमक बहुत पहले से थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में दिए गए हलफनामे के मुताबिक, उन पर पहले केस की तारीख है 13 मई 1979। यानी 18 साल की उम्र में। केस दर्ज हुआ था हत्या की धाराओं में। हालांकि, कई स्थानीय हलकों में दावा किया जाता है कि अनंत कुमार सिंह पहली बार नौ साल की उम्र में जेल गए थे और बाद में रिहा कर दिए गए।
एक रिपोर्ट की मानें तो अनंत सिंह का पहला केस हत्या से जुड़ा था और यह स्थानीय कहानी जैसा है। अनंत के सबसे बड़े भाई बिराची उस वक्त गांव के बड़े जमींदार और मुखिया हुआ करते थे, जब पूरे राज्य में नक्सली जमींदारों के खिलाफ जंग छेड़ रहे थे। नक्सलियों के समर्थक इस आंदोलन से प्रभावित होकर जमींदारों की हत्या कर रहे थे, उन्होंने बिराची को भी मार दिया था। इसके बाद वे गंगा नदी से नाव के रास्ते भाग निकले थे। अनंत सिंह ने इन हत्यारों को कई महीनों तक ढूंढा। कहानी है कि जब अनंत को इन हत्यारों की जानकारी मिली तो उन्होंने तैरकर नदी पार की और हत्यारे को जान से मार दिया। हालांकि, यह कहानी कितनी सच है और कितनी किवदंती, ये या तो अनंत सिंह जानते हैं या गांव के लोग।
अनंत सिंह की कहानी उनके चुनावी राजनीति में आने से शुरू नहीं होती। मोकामा में बाहुबली अनंत सिंह की धमक बहुत पहले से थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में दिए गए हलफनामे के मुताबिक, उन पर पहले केस की तारीख है 13 मई 1979। यानी 18 साल की उम्र में। केस दर्ज हुआ था हत्या की धाराओं में। हालांकि, कई स्थानीय हलकों में दावा किया जाता है कि अनंत कुमार सिंह पहली बार नौ साल की उम्र में जेल गए थे और बाद में रिहा कर दिए गए।
एक रिपोर्ट की मानें तो अनंत सिंह का पहला केस हत्या से जुड़ा था और यह स्थानीय कहानी जैसा है। अनंत के सबसे बड़े भाई बिराची उस वक्त गांव के बड़े जमींदार और मुखिया हुआ करते थे, जब पूरे राज्य में नक्सली जमींदारों के खिलाफ जंग छेड़ रहे थे। नक्सलियों के समर्थक इस आंदोलन से प्रभावित होकर जमींदारों की हत्या कर रहे थे, उन्होंने बिराची को भी मार दिया था। इसके बाद वे गंगा नदी से नाव के रास्ते भाग निकले थे। अनंत सिंह ने इन हत्यारों को कई महीनों तक ढूंढा। कहानी है कि जब अनंत को इन हत्यारों की जानकारी मिली तो उन्होंने तैरकर नदी पार की और हत्यारे को जान से मार दिया। हालांकि, यह कहानी कितनी सच है और कितनी किवदंती, ये या तो अनंत सिंह जानते हैं या गांव के लोग।
अनंत सिंह के चुनावी हलफनामे पर नजर डालने पर ही उनके ऊपर लगे केसों की आगे की जानकारी मिलती है। इसके मुताबिक, उन पर 2020 विधानसभा चुनाव से पहले तक कुल 38 मामले दर्ज थे। हालांकि, एक मीडिया समूह ने कुछ समय पहले ही पटना हाईकोर्ट के दस्तावेजों के हवाले से दावा किया था कि अनंत सिंह पर 50 से ज्यादा केस दर्ज हैं। 2015 और 2019 में उन्हें दो मामलों में दोषी भी पाया जा चुका है।
2015 में एक मामले में पटना पुलिस ने अनंत सिंह के घर पर छापेमारी की थी। यह रेड 17 जून को चार युवाओं के अपहरण के मामले के बाद डाली गई थी। इसमें अनंत सिंह के घर से इंसास राइफल, बुलेटप्रूफ जैकेट और खून से सने कपड़े मिले थे। अगले दिन पुतुष यादव नाम के एक अपह्रत का शव अनंत सिंह के पैतृक गांव नदवां से मिला था। इस मामले में बाद में अनंत सिंह इस कदर घिरे कि भाजपा और राजद दोनों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनकी गिरफ्तारी की मांग कर दी। बाद में उन पर केस भी चला। चौंकाने वाली बात यह है कि एक साल पहले यानी 2014 में अनंत सिंह पर बिहटा इलाके में एक बिल्डर के अपहरण का मामला दर्ज हुआ था और वे बाद में जेल भेजे गए थे।
2015 में एक मामले में पटना पुलिस ने अनंत सिंह के घर पर छापेमारी की थी। यह रेड 17 जून को चार युवाओं के अपहरण के मामले के बाद डाली गई थी। इसमें अनंत सिंह के घर से इंसास राइफल, बुलेटप्रूफ जैकेट और खून से सने कपड़े मिले थे। अगले दिन पुतुष यादव नाम के एक अपह्रत का शव अनंत सिंह के पैतृक गांव नदवां से मिला था। इस मामले में बाद में अनंत सिंह इस कदर घिरे कि भाजपा और राजद दोनों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनकी गिरफ्तारी की मांग कर दी। बाद में उन पर केस भी चला। चौंकाने वाली बात यह है कि एक साल पहले यानी 2014 में अनंत सिंह पर बिहटा इलाके में एक बिल्डर के अपहरण का मामला दर्ज हुआ था और वे बाद में जेल भेजे गए थे।
ऐसा ही एक केस है 2019 का। जब अगस्त में पुलिस ने एक बार फिर अनंत सिंह के घर पर छापा मारा। यहां पुलिस को उनके घर से हैंड ग्रेनेड मिले। हालांकि, अनंत सिंह खुद गिरफ्तारी से बच निकले और एक हफ्ते बाद नाटकीय ढंग से दिल्ली की एक स्थानीय अदालत में सरेंडर करने में सफल रहे। इस केस में अनंत सिंह को 22 महीने बाद जमानत मिली।
2015 और 2019 के मामलों में अनंत सिंह को सजा हुई। हालांकि, जहां 2015 के मामले में उनके घर से अवैध हथियार मिलने के मामले में 10 साल की सजा हुई,वहीं 2019 के मामले में उनके घर से एके-47 मिलने के केस में उन्हें दोषी पाया गया। हालांकि, चार्जशीट में उन पर से यूएपीए की धारओं को हटा लिया गया था।
2015 और 2019 के मामलों में अनंत सिंह को सजा हुई। हालांकि, जहां 2015 के मामले में उनके घर से अवैध हथियार मिलने के मामले में 10 साल की सजा हुई,वहीं 2019 के मामले में उनके घर से एके-47 मिलने के केस में उन्हें दोषी पाया गया। हालांकि, चार्जशीट में उन पर से यूएपीए की धारओं को हटा लिया गया था।
अनंत सिंह के राजनीति में उतरने की क्या कहानी?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, भले ही ही दिलीप सिंह राजनीति में एक बड़ा चेहरा थे, लेकिन पर्दे के पीछे अनंत सिंह ही उनकी राजनीतिक गतिविधियों और समर्थन जुटाने से जुड़े फैसले लेते थे। ऐसे में जब राजद से चुनाव लड़ रहे दिलीप सिंह को लोजपा के सूरजभान सिंह, जो कि उस वक्त खुद बड़े बाहुबली थे, से हार मिली तो अनंत सिंह ने खुद राजनीति में उतरने की ठानी। उन्होंने मोकामा से ही अपना काम जारी रखा। एक किस्सा यह है कि जब 2004 का लोकसभा चुनाव होने वाला था, तब नीतीश कुमार ने दिलीप सिंह और अनंत सिंह से मुलाकात की थी। दरअसल, नीतीश यहां की बाढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, जो कि भूमिहारों का गढ़ मानी जाती है। इसलिए नीतीश कुमार, सिंह भाइयों का समर्थन जुटाने के लिए उनसे मिले। नीतीश बाढ़ सीट से जीत दर्ज करने में तो नाकाम रहे, लेकिन अनंत सिंह से मुलाकात के बाद उन्हें अंदाजा हो गया कि आगे भी सवर्ण वोटों को जदयू के पाले में लाने में वे अहम भूमिका निभाते रहेंगे। इस साल नीतीश नालंदा सीट से सांसद बने थे।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, भले ही ही दिलीप सिंह राजनीति में एक बड़ा चेहरा थे, लेकिन पर्दे के पीछे अनंत सिंह ही उनकी राजनीतिक गतिविधियों और समर्थन जुटाने से जुड़े फैसले लेते थे। ऐसे में जब राजद से चुनाव लड़ रहे दिलीप सिंह को लोजपा के सूरजभान सिंह, जो कि उस वक्त खुद बड़े बाहुबली थे, से हार मिली तो अनंत सिंह ने खुद राजनीति में उतरने की ठानी। उन्होंने मोकामा से ही अपना काम जारी रखा। एक किस्सा यह है कि जब 2004 का लोकसभा चुनाव होने वाला था, तब नीतीश कुमार ने दिलीप सिंह और अनंत सिंह से मुलाकात की थी। दरअसल, नीतीश यहां की बाढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, जो कि भूमिहारों का गढ़ मानी जाती है। इसलिए नीतीश कुमार, सिंह भाइयों का समर्थन जुटाने के लिए उनसे मिले। नीतीश बाढ़ सीट से जीत दर्ज करने में तो नाकाम रहे, लेकिन अनंत सिंह से मुलाकात के बाद उन्हें अंदाजा हो गया कि आगे भी सवर्ण वोटों को जदयू के पाले में लाने में वे अहम भूमिका निभाते रहेंगे। इस साल नीतीश नालंदा सीट से सांसद बने थे।
फिर साल आया 2005, जब बिहार में दो बार विधानसभा चुनाव हुए। फरवरी और अक्तूबर में। अनंत सिंह को इस दौर तक अंदाजा हो चुका था कि लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व को नीतीश कुमार चुनौती दे सकते हैं। ऐसे में उन्होंने न सिर्फ 2004 के लोकसभा चुनाव में जदयू को जिताने के लिए जोर लगाया, बल्कि अक्तूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में जदयू के टिकट पर उतरे और जीत हासिल की। राजनीतिक हलकों में इससे जुड़ी एक घटना की चर्चा होती है कि जब अनंत सिंह चुनाव में जीते थे, तब वे नए-नए मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार को अपने विधानसभा क्षेत्र में लाए और उन्हें चांदी से तौल दिया। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जाता है कि अनंत ने नीतीश को चांदी नहीं, बल्कि सोने से तौला था।
2015 का चुनाव, जब निर्दलीय उतरकर लगाया 'अनंत दांव'
अनंत सिंह की जीत का सिलसिला 2010 में भी जारी रहा। हालांकि, 2015 में अपहरण और हत्या के केस में गिरफ्तारी के बाद जदयू ने उन्हें टिकट नहीं दिया। कहा जाता है कि तब एनडीए छोड़कर राजद-कांग्रेस के साथ महागठबंधन में गए नीतीश आपराधिक छवि के नेता के साथ नहीं दिखना चाहते थे। ऐसे में उन्होंने अनंत सिंह से दूरी बना ली। हालांकि, अनंत को इससे फर्क नहीं पड़ा और उन्होंने यह चुनाव जेल से ही निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर लड़ा। इस चुनाव में उनकी तरफ से अभियान उनकी पत्नी नीलम ने चलाया। प्रचार अभियान में एक भी बार उतरे बिना ही अनंत सिंह ने जदयू के नीरज सिंह को शिकस्त दे दी।
अनंत सिंह की जीत का सिलसिला 2010 में भी जारी रहा। हालांकि, 2015 में अपहरण और हत्या के केस में गिरफ्तारी के बाद जदयू ने उन्हें टिकट नहीं दिया। कहा जाता है कि तब एनडीए छोड़कर राजद-कांग्रेस के साथ महागठबंधन में गए नीतीश आपराधिक छवि के नेता के साथ नहीं दिखना चाहते थे। ऐसे में उन्होंने अनंत सिंह से दूरी बना ली। हालांकि, अनंत को इससे फर्क नहीं पड़ा और उन्होंने यह चुनाव जेल से ही निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर लड़ा। इस चुनाव में उनकी तरफ से अभियान उनकी पत्नी नीलम ने चलाया। प्रचार अभियान में एक भी बार उतरे बिना ही अनंत सिंह ने जदयू के नीरज सिंह को शिकस्त दे दी।
2020 का चुनाव: ललन सिंह से नाराज, राजद से हासिल किया ताज
2020 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह ने लालू प्रसाद यादव की राजद का हाथ थाम लिया। इसकी वजह 2015 के चुनाव में जदयू से टिकट न मिलना और नीतीश के करीबी नेता और तत्कालीन जदयू अध्यक्ष ललन सिंह से अनबन मानी जाती है। अनंत सिंह ने राजद के टिकट पर भी यह चुनाव जीता भी। तब मोकामा में नारे थे- बिहार में भले ही हो नीतीश सरकार लेकिन मोकामा के पास हैं 'छोटे सरकार'।
हालांकि, इस बार उनकी विधायकी लंबी नहीं चल पाई। 2022 में उन्हें दो मामलों- 2015 के इंसास राइफल और अन्य हथियार मिलने के मामले में और 2019 के एके-47 राइफल मिलने के केस में उन्हें दोषी पाया गया और सजा हुई। इसके चलते उनकी विधायकी चली गई। इसके बाद हुए उपचुनाव में अनंत सिंह ने अपनी पत्नी नीलम देवी को राजद से टिकट दिलाया। नीलम ने अनंत सिंह के बल पर यह चुनाव जीत भी लिया, लेकिन 2024 में जब नीतीश कुमार राजद का साथ छोड़कर फिर एनडीए में शामिल होकर मुख्यमंत्री बने तो विधानसभा में हुए विश्वास मत में उनकी पत्नी नीलम देवी ने एनडीए के पक्ष में ही वोट दिया। ऐसे में माना जा रहा है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर जदयू-राजद के बीच मोकामा सीट को लेकर होड़ रहेगी।
2020 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह ने लालू प्रसाद यादव की राजद का हाथ थाम लिया। इसकी वजह 2015 के चुनाव में जदयू से टिकट न मिलना और नीतीश के करीबी नेता और तत्कालीन जदयू अध्यक्ष ललन सिंह से अनबन मानी जाती है। अनंत सिंह ने राजद के टिकट पर भी यह चुनाव जीता भी। तब मोकामा में नारे थे- बिहार में भले ही हो नीतीश सरकार लेकिन मोकामा के पास हैं 'छोटे सरकार'।
हालांकि, इस बार उनकी विधायकी लंबी नहीं चल पाई। 2022 में उन्हें दो मामलों- 2015 के इंसास राइफल और अन्य हथियार मिलने के मामले में और 2019 के एके-47 राइफल मिलने के केस में उन्हें दोषी पाया गया और सजा हुई। इसके चलते उनकी विधायकी चली गई। इसके बाद हुए उपचुनाव में अनंत सिंह ने अपनी पत्नी नीलम देवी को राजद से टिकट दिलाया। नीलम ने अनंत सिंह के बल पर यह चुनाव जीत भी लिया, लेकिन 2024 में जब नीतीश कुमार राजद का साथ छोड़कर फिर एनडीए में शामिल होकर मुख्यमंत्री बने तो विधानसभा में हुए विश्वास मत में उनकी पत्नी नीलम देवी ने एनडीए के पक्ष में ही वोट दिया। ऐसे में माना जा रहा है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर जदयू-राजद के बीच मोकामा सीट को लेकर होड़ रहेगी।