{"_id":"67cc4a4159d81dc457088ee0","slug":"bihar-election-congress-wants-to-play-a-big-bet-in-bihar-will-rjd-return-to-power-after-20-years-2025-03-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bihar Election: कांग्रेस बिहार में खेलना चाहती है बड़ा दांव, 20 साल बाद क्या जलेगी लालू प्रसाद यादव की लालटेन?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Bihar Election: कांग्रेस बिहार में खेलना चाहती है बड़ा दांव, 20 साल बाद क्या जलेगी लालू प्रसाद यादव की लालटेन?
सार
बिहार की राजनीति में दो बड़े चेहरे हैं। 1990 के दशक से राज्य की राजनीति इनके इर्द-गिर्द ही घूमी। पहले करीब 15 साल तक लालू प्रसाद यादव की सत्ता रही और उसके बाद 2005 से लगातार नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं। बेशक नीतीश बिहार में चेहरा हैं, लेकिन उनका स्वास्थ्य कमजोर रहने लगा है।
विज्ञापन
लालू प्रसाद यादव और राहुल गांधी
- फोटो : एएनआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
इस साल बिहार में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। जदयू प्रमुख और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का स्वास्थ्य कमजोर रहता है। भाजपा के पास नेतृत्व वाला मजबूत चेहरा नहीं है। मुख्यमंत्री की कुर्सी से 2005 से दूर राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बारीक नजर है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि बिहार में क्या इस बार लालू प्रसाद यादव की लालटेन जल पाएगी? यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि कांग्रेस बिहार को लेकर बड़ा दांव खेलने जा रही है। लालू प्रसाद यादव और राजद के सहयोगियों में कहें तो कांग्रेस सबसे बड़ा राजनीतिक दल है।
राजनीति के पंडित कांग्रेस के नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के मूड पर निगाह गड़ाए हैं। कांग्रेस के पार्टी के एक बड़े नेता को उम्मीद थी दिल्ली में कांग्रेस भाजपा को रोकने के लिए चुनाव करीब आने पर आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का विकल्प चुन लेगी। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के निर्णय ने उन्हें हैरान कर दिया था। इससे सबक लेकर इस बार वह बिहार पर बोलने से बच रहे हैं। बिहार कांग्रेस अशोक चौधरी के पार्टी छोड़ने के बाद नया सबक लेकर आगे बढ़ रही है। जमीनी स्तर पर सर्वे करने के मामले में सुनील कानूगोलू राहुल गांधी का विश्वास जीत चुके हैं और वह बिहार में सभी 240 विधानसभा सीटों को ध्यान में रखकर साढे़ तीन दर्जन लोगों के दल बल के साथ खंगाल रहे हैं। कांग्रेस ने कृष्णा अल्लावरु को बिहार का प्रभार दिया है। अल्लावरु को भी कुछ नया करके दिखाना है। वह पार्टी को मजबूती देने वाले समीकरण जोड़ने में लगे हैं।
किसके पास है बिहार में चेहरा?
बिहार की राजनीति में दो बड़े चेहरे हैं। 1990 के दशक से राज्य की राजनीति इनके इर्द-गिर्द ही घूमी। पहले करीब 15 साल तक लालू प्रसाद यादव की सत्ता रही और उसके बाद 2005 से लगातार नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं। बेशक नीतीश बिहार में चेहरा हैं, लेकिन उनका स्वास्थ्य कमजोर रहने लगा है। शिवानंद तिवारी जैसे नेता तो चाहते हैं कि नीतीश को संन्यास ले लेना चाहिए। नीतीश के बाद बिहार में जातिवाद की राजनीति को देखते हुए सबसे बड़ा चेहरा पूर्व मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव हैं। लेकिन राजद का चेहरा बने तेजस्वी यादव का राजनीतिक खेमा खड़ा नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस की तरफ से कोई सकारात्मक संदेश की शुरुआत नहीं हो रही है। कांग्रेस के बड़े नेता तारिक अनवर ने भी कहा है कि जिसके विधायक अधिक होंगे, उसी का मुख्यमंत्री होगा। दूसरी तरफ कृष्णा अल्लावरु ने अभी तक लालू प्रसाद यादव से भेंट नहीं की है। जनाधार के मामले में बिहार की राजनीति के सभी चेहरे इन दोनों (नीतीश और तेजस्वी) चेहरों के बाद आते हैं, लेकिन सत्ता पक्ष के सबसे बड़े घटक दल के रणनीतिकारों की नजर इस बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिकी है।
विज्ञापन
इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते तेजस्वी
तेजस्वी का पास अपनी टीम है। उनके करीबी और राज्यसभा सदस्य संजय यादव भी बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर काफी संवेदनशील हैं। तेजस्वी की टीम का कहना है कि नीतीश कुमार 20 साल से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। भाजपा सहयोगी दल है और राज्य की सरकार के खिलाफ इस बार सरकार विरोधी लहर है। संजय यादव तेजस्वी के अच्छे रणनीतिकार हैं, लेकिन उनकी और तेजस्वी की पूरी तैयारी बिहार में कांग्रेस के फैसले पर निर्भर करेगी। हालांकि राजद के नेता कहते हैं कि बिहार में उनकी पार्टी, कांग्रेस और अन्य का गठबंधन होगा। इसका फैसला कांग्रेस के दिल्ली से भेजे गए प्रभारी नहीं करते। यह निर्णय यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव करेंगे। इसमें अभी समय है। इस बारे में राहुल गांधी के करीबी और बिहार के युवा नेता ने भी कहा कि अभी से कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल दोनों ने बिहार में अपनी तैयारी को तेज कर दिया है। तैयारी भाजपा और जदयू भी कर रहे हैं। भाजपा सांसद रवि शंकर प्रसाद के पटना साहिब आवास पर होली मिलन समारोह में भी इसका रंग दिखाई दिया।
क्या लालटेन जलेगी?
बिहार में विधानसभा चुनाव भले ही विकास के मुद्दे से शुरू हो, लेकिन अंतत: जातिवाद का मुद्दा हावी हो जाता है। लोजपा के नेता पशुपति कुमार पारस को भी इसके चलते स्वयं के राजनीति में बने रहने की पूरी उम्मीद है। राजद ने पशुपति से रिश्ते को ठीक कर रखा है। हालांकि जदयू के प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं और चुनाव बाद भी यही होना है, लेकिन जिस तरह से तेजस्वी यादव की टीम बिहार को कई हिस्सों में बांटकर योजना बना रही है और जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर भी अपने लिए संभावना देख रहे हैं। इसके साथ-साथ नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर चर्चा बढ़ती जा रही है, तेजस्वी की टीम को इससे काफी उम्मीदें हैं।
विज्ञापन
राजनीति के पंडित कांग्रेस के नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के मूड पर निगाह गड़ाए हैं। कांग्रेस के पार्टी के एक बड़े नेता को उम्मीद थी दिल्ली में कांग्रेस भाजपा को रोकने के लिए चुनाव करीब आने पर आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का विकल्प चुन लेगी। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के निर्णय ने उन्हें हैरान कर दिया था। इससे सबक लेकर इस बार वह बिहार पर बोलने से बच रहे हैं। बिहार कांग्रेस अशोक चौधरी के पार्टी छोड़ने के बाद नया सबक लेकर आगे बढ़ रही है। जमीनी स्तर पर सर्वे करने के मामले में सुनील कानूगोलू राहुल गांधी का विश्वास जीत चुके हैं और वह बिहार में सभी 240 विधानसभा सीटों को ध्यान में रखकर साढे़ तीन दर्जन लोगों के दल बल के साथ खंगाल रहे हैं। कांग्रेस ने कृष्णा अल्लावरु को बिहार का प्रभार दिया है। अल्लावरु को भी कुछ नया करके दिखाना है। वह पार्टी को मजबूती देने वाले समीकरण जोड़ने में लगे हैं।
विज्ञापन
किसके पास है बिहार में चेहरा?
बिहार की राजनीति में दो बड़े चेहरे हैं। 1990 के दशक से राज्य की राजनीति इनके इर्द-गिर्द ही घूमी। पहले करीब 15 साल तक लालू प्रसाद यादव की सत्ता रही और उसके बाद 2005 से लगातार नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं। बेशक नीतीश बिहार में चेहरा हैं, लेकिन उनका स्वास्थ्य कमजोर रहने लगा है। शिवानंद तिवारी जैसे नेता तो चाहते हैं कि नीतीश को संन्यास ले लेना चाहिए। नीतीश के बाद बिहार में जातिवाद की राजनीति को देखते हुए सबसे बड़ा चेहरा पूर्व मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव हैं। लेकिन राजद का चेहरा बने तेजस्वी यादव का राजनीतिक खेमा खड़ा नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस की तरफ से कोई सकारात्मक संदेश की शुरुआत नहीं हो रही है। कांग्रेस के बड़े नेता तारिक अनवर ने भी कहा है कि जिसके विधायक अधिक होंगे, उसी का मुख्यमंत्री होगा। दूसरी तरफ कृष्णा अल्लावरु ने अभी तक लालू प्रसाद यादव से भेंट नहीं की है। जनाधार के मामले में बिहार की राजनीति के सभी चेहरे इन दोनों (नीतीश और तेजस्वी) चेहरों के बाद आते हैं, लेकिन सत्ता पक्ष के सबसे बड़े घटक दल के रणनीतिकारों की नजर इस बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिकी है।
विज्ञापन
इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते तेजस्वी
तेजस्वी का पास अपनी टीम है। उनके करीबी और राज्यसभा सदस्य संजय यादव भी बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर काफी संवेदनशील हैं। तेजस्वी की टीम का कहना है कि नीतीश कुमार 20 साल से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। भाजपा सहयोगी दल है और राज्य की सरकार के खिलाफ इस बार सरकार विरोधी लहर है। संजय यादव तेजस्वी के अच्छे रणनीतिकार हैं, लेकिन उनकी और तेजस्वी की पूरी तैयारी बिहार में कांग्रेस के फैसले पर निर्भर करेगी। हालांकि राजद के नेता कहते हैं कि बिहार में उनकी पार्टी, कांग्रेस और अन्य का गठबंधन होगा। इसका फैसला कांग्रेस के दिल्ली से भेजे गए प्रभारी नहीं करते। यह निर्णय यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव करेंगे। इसमें अभी समय है। इस बारे में राहुल गांधी के करीबी और बिहार के युवा नेता ने भी कहा कि अभी से कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल दोनों ने बिहार में अपनी तैयारी को तेज कर दिया है। तैयारी भाजपा और जदयू भी कर रहे हैं। भाजपा सांसद रवि शंकर प्रसाद के पटना साहिब आवास पर होली मिलन समारोह में भी इसका रंग दिखाई दिया।
क्या लालटेन जलेगी?
बिहार में विधानसभा चुनाव भले ही विकास के मुद्दे से शुरू हो, लेकिन अंतत: जातिवाद का मुद्दा हावी हो जाता है। लोजपा के नेता पशुपति कुमार पारस को भी इसके चलते स्वयं के राजनीति में बने रहने की पूरी उम्मीद है। राजद ने पशुपति से रिश्ते को ठीक कर रखा है। हालांकि जदयू के प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं और चुनाव बाद भी यही होना है, लेकिन जिस तरह से तेजस्वी यादव की टीम बिहार को कई हिस्सों में बांटकर योजना बना रही है और जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर भी अपने लिए संभावना देख रहे हैं। इसके साथ-साथ नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर चर्चा बढ़ती जा रही है, तेजस्वी की टीम को इससे काफी उम्मीदें हैं।