Ladakh: चीन को उसी की भाषा में जवाब देने की बड़ी तैयारी, पैंगोंग से सटी इन जगहों में शुरू किया ये खास 'ऑपरेशन'
भारत सरकार अब अपने वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम को “विश्वास” और “श्रद्धा” के साथ जोड़ रही है। इस कार्यक्रम के तहत पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटे दो हॉटस्पॉट-लुकुंग और चुशुल में भगवान बुद्ध की मूर्तियां स्थापित की गई हैं।
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हाल ही में अमेरिकी प्रतिनिधी नैंसी पेलोसी धर्मशाला में दलाई लामा से मिलना और भारत का वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) सटे इलाकों में नए गांव बनाने का फैसला लेना भारत की चीन के प्रति बदलती रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। चीन के अरूणाचल प्रदेश के कई इलाकों के नाम बदलने के फैसले के बाद भारत ने भी अरुणाचल प्रदेश में एलएसी के करीब नए गांव या बस्तियां बसाने का फैसला किया है। इसी रणनीति के तहत भारत ने चीन के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन (साइकोप) या साइकोलॉजिकल ऑपरेशन शुरू किया है। जिसके तहत, पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटे दो हॉटस्पॉट-लुकुंग और चुशुल में भगवान बुद्ध की मूर्तियां स्थापित की जा रही हैं।
पैंगोंग त्सो में 'फिंगर 4' के पास है लुकुंग
भारत सरकार अब अपने वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम को “विश्वास” और “श्रद्धा” के साथ जोड़ रही है। इस कार्यक्रम के तहत पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटे दो हॉटस्पॉट-लुकुंग और चुशुल में भगवान बुद्ध की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। वहीं ये दोनों जगहें बेहद खास भी हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान लुकुंग और चुशुल, इन दोनों ही जगहों पर भीषण जंग हुई थी। भारतीय सैनिकों ने इन दोनों जगहों पर चीनियों को रोके रखा था। एक जुलाई को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास लुकुंग और चुशुल इलाकों में भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की मूर्तियों का अनावरण किया गया। लुकुंग पैंगोंग त्सो के उत्तर-पश्चिमी किनारे 'फिंगर 4' के पास है, जबकि चुशुल में मूर्ति स्पैंगगुर गैप के सामने है, जो दोनों सेनाओं का सीमा मीटिंग प्वॉइंट है। मोल्डो में चीनी गैरिसन वहां से लगभग 8 किमी दूर है।
डेमचोक में भी प्रतिमा लगाने की तैयारी
सूत्रों ने बताया कि इसी तरह की दो और प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी। इनमें से एक डेमचोक में स्थापित की जाएगी, जबकि दूसरी प्रतिमा के लिए अभी जगह का चयन नहीं किया गया है। इनमें से डेमचोक वह इलाका है, जहां चीन अभी भी बाज नहीं आ रहा है। एलएसी से सटे देमचोक में चीनी सैनिकों ने भारतीय चरवाहों को अपने चरागाहों तक पहुंचने से रोक दिया है। साल 2018 में चीनी सैनिक डेमचोक में 300-400 मीटर अंदर तक घुस गए थे। उन्होंने कुछ टेंट भी उखाड़ फैंके थे। जिसके बाद दोनों देशों के बीच हुई सैन्य बातचीत में मामले को कंट्रोल किया गया था। यहां अभी भी दोनों देशों के बीच गतिरोध बरकरार है।
भगवान बुद्ध की मूर्तियों को "भूमिस्पर्श मुद्रा" में दिखाया
एक जुलाई को लेह में तैनात इंडियम आर्मी की फायर एंड फ्यूरी यानी 14 कोर ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट डाली थी। जिसमें मूर्तियों के एक वीडियो भी था। पोस्ट में लिखा गया था, "फायर एंड फ्यूरी कोर ने सीमावर्ती क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने, सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उन्नत करने और प्रमुख सीमावर्ती गांवों के आध्यात्मिक मूल्यों को सुदृढ़ करने के लिए लद्दाख के लोगों के साथ भारतीय सेना के लंबे सहयोग की स्मृति में लुकुंग और चुशुल के सीमावर्ती गांवों में ध्यान कॉर्नर्स को समर्पित किया है। यह पूर्वी लद्दाख के अग्रिम क्षेत्रों में एकजुटता को बढ़ावा देने, आध्यात्मिक मूल्यों और शाश्वत शांति को बनाए रखने के लिए वसुधैव कुटुम्बकम (दुनिया एक परिवार है) के सार को कायम रखने की पहल है।"
वहीं 14 कोर ने जो वीडियो जारी किया गया है, उसमें भगवान बुद्ध की मूर्तियों को "भूमिस्पर्श मुद्रा" में दिखाया गया है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूज़लेटर "महान बुद्ध की मुद्राएं: प्रतीकात्मक इशारे और मुद्राएं" में "भूमिस्पर्श मुद्रा" को "पृथ्वी को छूना" बताया गया है। इसमें आगे कहा गया है, "यह बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध के ज्ञानोदय का प्रतीक है, जब उन्होंने पृथ्वी देवी स्थावरा को अपने ज्ञानोदय की गवाही देने के लिए बुलाया था।"
नहीं हटेंगे बंदूकें, टैंक, मिसाइल
सूत्रों ने बताया कि बंदूकें, टैंक, मिसाइल और सैनिक सभी अपने मौजूदा जगहों पर ही रहेंगे। वहीं अहिंसा के पुजारी बुद्ध की मूर्तियां हमारे सैन्य और कूटनीतिक रुख में किसी बदलाव का संकेत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि ये मूर्तियां सदियों से यहां रह रहे लद्दाखी बौद्धों का मनोबल बढ़ाने की भी एक कोशिश है।
वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम से मिला फायदा
इससे पहले भारत ने अरुणाचल प्रदेश में एलएसी के करीब नए गांव और बस्तियां बसाने का फैसला लिया है। सूत्रों ने बताया कि अरुणाचल प्रदेश में मौजूदा भारतीय गांवों को वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम से बहुत फायदा मिला है। वहां इंफ्रास्ट्रचर तेजी से डेवलप हुआ है। इन गावों की दूरी एलएसी से 50 से 60 किलोमीटर है। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर के केरन सेक्टर में इसी तरह के पर्यटन-आधारित कार्यक्रमों ने अच्छे परिणाम दिखाए हैं, जहां पर्यटक किशनगंगा नदी के तट तक जा रहे हैं। नदी के दूसरे किनारे पर पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) है। सरकार ने इस कार्यक्रम के अंतर्गत 2,963 गांवों की पहचान की है, जिन्हें अगले 10 वर्षों में डेवलप किया जाएगा।