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Bhawanipure byelection: यह सीट जीतकर कोई पीएम नहीं बन सकता, लेकिन फिर भी पेगासस से लेकर कृषि कानून तक के मुद्दे यहां छाने का मतलब क्या
Thu, 30 Sep 2021 07:50 PM IST
प्रतिभा ज्योति
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Thu, 30 Sep 2021 07:50 PM IST
सार
कहने को तो दक्षिणी कोलकता की भवानीपुर सीट पर विधानसभा का उपचुनाव हो रहा था लेकिन पेगासस "स्नूपगेट", पीएम-केयर्स फंड का स्वामित्व, खतरे में लोकतंत्र, विमुद्रीकरण, भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति, विवादास्पद कृषि कानून, भाजपा शासित राज्यों में कानून व्यवस्था से लेकर भगवा खेमे का कथित "विभाजनकारी" एजेंडा यह सब मुद्दे यहां हावी रहे।
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ममता बनर्जी
- फोटो : Twitter : @@AITCofficial
विस्तार
राष्ट्रीय मुद्दों की यह लंबी सूची 2024 के लोकसभा चुनाव में होती तो इसे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला करने के विपक्ष के प्रमुख मुद्दों में गिना जा सकता था। लेकिन ये मुद्दे छाए रहे पश्चिम बंगाल की भवानीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में, क्योंकि ये ममता बनर्जी और तृणमूल के प्रचार अभियान के प्रमुख बिंदु थे। आमतौर पर किसी भी विधानसभा सीट पर होने वाले चुनाव में राज्य स्तरीय और स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती है लेकिन बताया जाता है कि ममता बनर्जी ने इस चुनाव को भाजपा के खिलाफ आक्रमक लड़ाई में तब्दील कर दिया था इसलिए चुन-चुन कर राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को इस चुनाव में उतारा गया।
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि बंगाल की मुख्यमंत्री ने विधानसभा के इस उपचुनाव को 2024 के चुनाव से पहले ही भाजपा के खिलाफ एक जंग की तरह लिया। यह चुनाव उनके लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया था इसलिए ममता ने भवानीपुर उपचुनाव में भाजपा के खिलाफ हिंदुत्व से लेकर राष्ट्रवाद के सारे सियासी हथियार निकाल लिए। मुख्यमंत्री ने कुछ दिनों पहले चुनाव प्रचार के दौरान "बी फॉर भवानीपुर, बी फॉर भारतवर्ष, बी फॉर भारत माता कहकर चुनाव में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का तड़का लगाकर मतदाताओं को खींचने की अपील की। पार्टी की रणनीति के तहत बार-बार ऐसे मुद्दों को उछाला गया। जबकि अभी लोकसभा चुनाव में करीब ढ़ाई से ज्यादा का समय बचा है।
सूत्रों के मुताबिक ममता की स्पष्ट मंशा स्थानीय उपचुनाव को राष्ट्रीय परिणाम के चुनाव में बदलने की है। हालांकि सीपीआई (एम) की ओर से श्रीजिब विश्वास ने मीडिया से हाल ही में कहा था "भवानीपुर जीतकर कोई प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। हम प्रासंगिक और स्थानीय मुद्दों को लेकर मतदाताओं के पास गए।"
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ममता के लिए कितना अहम था यह चुनाव
बंगाल की मुख्यमंत्री के लिए यह चुनाव कितना अहम था इसे इस बात से समझिए कि तृममूल कांग्रेस के सारे वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ताओं की पूरी फौज इस चुनाव में उतार दी गई थी। ममता के भरोसेमंद सहयोगियों, जैसे सुब्रत बख्शी, फिरहाद हकीम, सुब्रत मुखर्जी, पार्थ चटर्जी, शोभंदेव चट्टोपाध्याय, देबाशीष कुमार, अरूप बिस्वास और मदन मित्रा के साथ-साथ उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने हफ्तों तक एक व्यापक अभियान चलाया।
इसलिए मुख्यमंत्री बार-बार इस बात को जाहिर करती रहीं कि भवानीपुर उपचुनाव का मतलब किसी विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव से कहीं ज्यादा है। जानकारी के मुताबिक राष्ट्रीय राजनीति करने की अपनी महात्वकांक्षा के साथ, ममता ने हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और जैनियों के पूजा स्थलों का दौरा करने के अलावा, 10 सार्वजनिक सभाओं या चर्चाओं में भाग लिया।
पांच बजे तक करीब 53 फीसदी मतदान
पश्चिम बंगाल की इस हाईप्रोफाइल भवानीपुर सीट पर मतदान पूरा हो गया है। यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल के बीच कड़ी टक्कर है। सीपीआई (एम) की ओर से श्रीजिब विश्वास मैदान में थे। शाम पांच बजे तक यहां 53 फीसदी मतदान होने की खबर है।
ममता बनर्जी ने इस साल की शुरुआत में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान नंदीग्राम से चुनाव लड़ा था, लेकिन शुभेंदु अधिकारी से हार गईं, जो भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे। शुभेंदु अधिकारी से हारने के बावजूद, पार्टी की एकमात्र नेता होने के नाते उनकी पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में चुना था। उन्होंने पांच मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन संविधान के मुताबिक उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के छह महीने के भीतर पांच नवंबर तक एक विधानसभा सीट पर जीत हासिल करनी है।
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राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि बंगाल की मुख्यमंत्री ने विधानसभा के इस उपचुनाव को 2024 के चुनाव से पहले ही भाजपा के खिलाफ एक जंग की तरह लिया। यह चुनाव उनके लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया था इसलिए ममता ने भवानीपुर उपचुनाव में भाजपा के खिलाफ हिंदुत्व से लेकर राष्ट्रवाद के सारे सियासी हथियार निकाल लिए। मुख्यमंत्री ने कुछ दिनों पहले चुनाव प्रचार के दौरान "बी फॉर भवानीपुर, बी फॉर भारतवर्ष, बी फॉर भारत माता कहकर चुनाव में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का तड़का लगाकर मतदाताओं को खींचने की अपील की। पार्टी की रणनीति के तहत बार-बार ऐसे मुद्दों को उछाला गया। जबकि अभी लोकसभा चुनाव में करीब ढ़ाई से ज्यादा का समय बचा है।
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सूत्रों के मुताबिक ममता की स्पष्ट मंशा स्थानीय उपचुनाव को राष्ट्रीय परिणाम के चुनाव में बदलने की है। हालांकि सीपीआई (एम) की ओर से श्रीजिब विश्वास ने मीडिया से हाल ही में कहा था "भवानीपुर जीतकर कोई प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। हम प्रासंगिक और स्थानीय मुद्दों को लेकर मतदाताओं के पास गए।"
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ममता के लिए कितना अहम था यह चुनाव
बंगाल की मुख्यमंत्री के लिए यह चुनाव कितना अहम था इसे इस बात से समझिए कि तृममूल कांग्रेस के सारे वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ताओं की पूरी फौज इस चुनाव में उतार दी गई थी। ममता के भरोसेमंद सहयोगियों, जैसे सुब्रत बख्शी, फिरहाद हकीम, सुब्रत मुखर्जी, पार्थ चटर्जी, शोभंदेव चट्टोपाध्याय, देबाशीष कुमार, अरूप बिस्वास और मदन मित्रा के साथ-साथ उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने हफ्तों तक एक व्यापक अभियान चलाया।
इसलिए मुख्यमंत्री बार-बार इस बात को जाहिर करती रहीं कि भवानीपुर उपचुनाव का मतलब किसी विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव से कहीं ज्यादा है। जानकारी के मुताबिक राष्ट्रीय राजनीति करने की अपनी महात्वकांक्षा के साथ, ममता ने हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और जैनियों के पूजा स्थलों का दौरा करने के अलावा, 10 सार्वजनिक सभाओं या चर्चाओं में भाग लिया।
पांच बजे तक करीब 53 फीसदी मतदान
पश्चिम बंगाल की इस हाईप्रोफाइल भवानीपुर सीट पर मतदान पूरा हो गया है। यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल के बीच कड़ी टक्कर है। सीपीआई (एम) की ओर से श्रीजिब विश्वास मैदान में थे। शाम पांच बजे तक यहां 53 फीसदी मतदान होने की खबर है।
ममता बनर्जी ने इस साल की शुरुआत में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान नंदीग्राम से चुनाव लड़ा था, लेकिन शुभेंदु अधिकारी से हार गईं, जो भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे। शुभेंदु अधिकारी से हारने के बावजूद, पार्टी की एकमात्र नेता होने के नाते उनकी पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में चुना था। उन्होंने पांच मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन संविधान के मुताबिक उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के छह महीने के भीतर पांच नवंबर तक एक विधानसभा सीट पर जीत हासिल करनी है।