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कोरोना से लड़ाई: कोई भी जंग रोकर नहीं, हंसकर जीती जाती है

Sun, 02 May 2021 06:48 AM IST
Kuldeep Singh अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: Kuldeep Singh Updated Sun, 02 May 2021 06:48 AM IST
सार

  • भोपाल की 85 वर्षीय सुनीता अत्रे ने कहा कि उन्होंने कोरोना से हंसते-हंसते जंग जीती
  • कोरोना में भी डॉक्टर की दवाओं के साथ घरेलू उपचार जारी रखा, यही वजह है कि कोरोना ने ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाया

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Bhopal A 85 year old lady defeated cancer 5 years ago and today won the battle with Corona
85 वर्षीय सुनीता अत्रे अपने परिवार के साथ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना... यह पंक्तियां इन दो प्रेरणादायक कहानियों पर सटीक बैठती है। यहां एक मां है जिसने पांच साल पहले कैंसर को मात दी और आज कोरोना को भी उन्होंने अपने हौसले के दम पर हराया, वहीं एक बेटी है जिसकी मां आईसीयू में भर्ती हैं लेकिन वह अपनी दोनों ही जिम्मेदारी को बखूबी अंजाम दे रही हैं... मां की सेवा के साथ ही वह मरीजों की भी सेवा में भी कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं...

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भोपाल: आज भी कायम है हौसला
कोरोना बुजुर्गों के लिए ज्यादा बड़ा काल साबित हुआ है लेकिन इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने इसे हंसते-हंसते हराया है। भोपाल में 85 वर्षीय सुनीता अत्रे ऐसा ही एक नाम है। वह बताती हैं कि बेटे को पहले से कोरोना था। शिवरात्रि के बाद उनकी भी तबीयत बिगड़ी थी। जांच पॉजिटिव आई। बेटी, नाती और नातिन भी संक्रमित हो गए। 57 वर्षीय बेटे की तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। दो दिन बाद मैं भी ज्यादा बीमार हुई तो बेटे के साथ उसी कमरे में भर्ती हो गई। परिवारजन और रिश्तेदार सब बेहद चिंतित हो गए। लेकिन मैंने एक ही बात कही कि जब पांच साल में मैंने दूसरी स्टेज के कैंसर को मात दे दी तो कोरोना उसके सामने क्या है। तब भी मुझे न ऑपरेशन की जरूरत न कीमोथेरेपी की। डॉक्टर आश्चर्य करते थे।
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लेकिन हमने स्वास्थ्य का पहले से ख्याल रखा है। हमारा परिवार शायद ही कभी बाहर का भोजन करता है। हर दिन घर का बना ताजा भोजन करते हैं। तांबे के बर्तन में पानी पीते हैं। कोरोना में भी डॉक्टर की दवाओं के साथ घरेलू उपचार जारी रखा। यही वजह है कि कोरोना ने ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाया। अस्पताल में जब ठीक लगने लगा तो बेटे को कहा कि घर चलते हैं ताकि दूसरों को बेड मिल जाए। घर आए तो लोगों ने पूछा कैसे ठीक हुए। मैं तो कहती हूं कि 'कोई भी जंग रोकर नहीं, हंसकर जीती जाती है।'
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उदयपुर : मां आईसीयू में पर खुद दूसरे मरीजों की सेवा में जुटी नर्स
कोरोना ने इतना बेबस कर दिया है कि हममें से कई लोग चाहते हुए भी निजी जिम्मेदारियां नहीं निभा पा रहे हैं। उदयपुर के अस्पताल में मरीजों की सेवा में जुटी नर्स शिल्पी इसका बड़ा उदाहरण हैं। खुद उनकी मां इन दिनों आईसीयू में भर्ती हैं। लेकिन वह दूसरे गंभीर मरीजों की देखभाल में जी-जान से जुटी हैं। एमबी अस्पताल में कार्यरत 29 साल की शिल्पी को मां का दर्द मालूम है। लेकिन इसे भुलाकर अपना कर्तव्य निभाने में लगी हैं।


वह कहती हैं अगर इस आपदा और मुश्किल वक्त में हम काम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। शिल्पी के मुताबिक, वह अजीब विडंबना से गुजर रही हैं। मां का ख्याल रखना जरूरी है तो अन्य मरीज भी इस समय प्राथमिकता हैं। इसके चलते मैं संतुलन बिठाने की कोशिश करती हूं। अपनी शिफ्ट के बाद में मां की देखभाल के लिए जाती हूं। शिल्पी ने बताया इस समय अस्पताल से छुट्टी नहीं ले सकती थी। इसलिए दिल्ली में रह रही मां को उदयपुर बुला लिया है, ताकि अपना काम करते हुए मां को भी संभाल सकूं।

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