Bharat Jodo Nyay Yatra: 10 दिन बीत जाने के बाद भी आखिर भारत जोड़ो न्याय यात्रा रफ्तार क्यों नहीं पकड़ पा रही?
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विस्तार
कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी 14 जनवरी से भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर हैं। 10 दिन हो चुके हैं और अभी असम में हैं। सोमवार को कांग्रेस महासचिव और संचार विभाग के पूर्व प्रमुख रणदीप सुरजेवाला बुलाए गए हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस मुख्यालय 24, अकबर रोड में कई काम ठप पड़े हैं। इंडिया गठबंधन को लेकर भी काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है। चाहे तेजस्वी यादव हों या अखिलेश यादव या फिर इंडिया गठबंधन के दूसरे नेता, वह मुकुल वासनिक समेत अन्य नेताओं को बहुत अहमियत नहीं दे रहे हैं। समस्या यहीं नहीं है। असली समस्या यह भी है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा पहले चरण की भारत जोड़ो यात्रा की तरह अभी रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है।
राहुल गांधी की पहले चरण की भारत यात्रा के रणनीतिकारों में सुनील कानूगोलू थे। इस बार सुनील कानूगोलू अभी पिछली बार की तरह नहीं जुड़ पाए हैं। रणदीप सुरजेवाला भी सोमवार 22 जनवरी तक पूरी सक्रियता से नहीं जुड़े थे। अगर भारत जोड़ो यात्रा की बात करें तो पार्टी के सचिव संजीव सिंह समेत दूसरे कांग्रेसी राहुल गांधी की पहली भारत जोड़ो यात्रा के प्रचार प्रसार के लिए जरूरी प्रयासों में लगे थे। जयराम रमेश तो काफी मेहनत कर रही रहे थे, मनोज त्यागी जैसे नेता भी यात्रा को सफल बनाने की कोशिशों में काफी मशक्कत कर रहे थे। इसके अलावा बीच-बीच में दूसरे बड़े नेता भारत जोड़ो यात्रा से जुड़ रहे थे। सोशल मीडिया आदि के माध्यम से इसके प्रचार प्रसार को और महत्वपूर्ण बनाने में लगे थे। लेकिन बताते हैं कि इस बार आपसी तालमेल कहीं ठहरा सा हुआ है। मेहनत का बड़ा जिम्मा जयराम रमेश, केसी वेणुगोपाल के कंधे पर है। पवन खेड़ा, सचिव विनीत पुनिया संचार व्यवस्था में सहायक की तरह हैं। इसके बाद भी अभी तक भारत जोड़ो न्याय यात्रा राजनीतिक हलचल नहीं पैदा कर पा रही है।
क्या कांग्रेस की दुविधा नहीं समझ पाते राहुल गांधी?कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरग़े समेत तमाम नेता अभी भारत जोड़ो न्याय यात्रा से सहमत नहीं थे। वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि लोकसभा चुनाव 2024 सिर पर हैं। विपक्षी दलों का गठबंधन खड़ा करना है। सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप दिया जाना है। सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि 2014 के बाद से कांग्रेस पार्टी का लोगों से मिलने वाला चंदा (फंड) घटा है। ऊपर से लगभग 250 करोड़ रुपये का भारत जोड़ो न्याय यात्रा खर्च और लोकसभा चुनाव 2024 का प्रचार-प्रसार, राजनीतिक गतिविधियों का खर्च दोनों भला कैसे हो पाएगा। आखिर इसे कांग्रेस कैसे पूरा कर पाएगी? पार्टी के रणनीतिकारों को एक उम्मीद और थी। वह यह कि कांग्रेस महासचिव मुकुल वासनिक समेत अन्य नेता इंडिया गठबंधन के नेताओं से तालमेल बनाकर सीटों का बंटवारा समेत अन्य चुनौतियों को साध लेंगे। लेकिन पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव हों या तेजस्वी यादव समेत अन्य दूसरे नेताओं को बहुत भाव नहीं दे रहे हैं। इतना ही नहीं राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल होने को लेकर भी नीतीश कुमार समेत तमाम नेताओं को लेकर संशय बरकरार है।
'टीवी चैनल कम दिखा रहे हों, पर यात्रा सफल है'मनोज त्यागी कांग्रेस के सचिव हैं। कहते हैं कि यात्रा की सफलता देखनी है, तो मणिपुर आइए। जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, लोगों का जुड़ाव बढ़ रहा है। 29 जनवरी तक बिहार के किशनगंज में प्रवेश करेंगे। मीडिया को सामग्री उपलब्ध कराने और भारत जोड़ो न्याय यात्रा में प्रमुख भूमिका निभा रहे विनीत पूनिया के मुताबिक राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा न्याय दिल्ली में भले कम असर दिखा रही हो, लेकिन इधर इसके असर से असम की सरकार डरी हुई है। विनीत पूनिया कहते हैं कि राष्ट्रीय टीवी मीडिया केंद्र सरकार के प्रभाव के कारण इस यात्रा पर कम ध्यान दे रहा है। लेकिन जनता के बीच में यात्रा अपनी छाप छोड़ रही है।
'अकेले अध्यक्ष जी क्या क्या कर लेंगे?'मनोज त्यागी कहते हैं कि कांग्रेस अध्ययक्ष मल्लिकार्जुन खरगे 81 साल के हैं। अब बताइए भला ऐसे में अकेले पार्टी अध्यक्ष क्या कर लेंगे? पार्टी अपने कुछ दशकों में सबसे लचर प्रदर्शन के दौर से गुजर रही है। कांग्रेस के ही एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान में केवल ठोस निर्णय न लिए जाने के कारण पार्टी हार गई। इन राज्यों में हार का असर अब राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ रहा है। इंडिया गठबंधन के दलों की भी साझे में सीटों की मांग काफी बढ़ गई है। सूत्र का कहना है कि जो निर्णय पार्टी ने तीनों राज्यों में हार के बाद लिए, यदि थोड़ा पहले यही स्टैंड लिया होता, तो हालात बदले हुए होते। एक पूर्व महासचिव का कहना है कि पार्टी के पास अध्यक्ष के रूप में मल्लिकार्जुन खरगे जैसा अनुभवी नेता है, लेकिन हमारा अनुभवी नेता अध्यक्ष के तौर पर पार्टी के लिए जरूरी निर्णय लेने में हिचक रहा है। इसके कारण मुख्य विपक्षी पार्टी अपना एजेंडा नहीं खड़ा कर पा रही है।