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बशीर बद्र: मुसाफिर हूं, किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी

deo prakash  choudhary देव प्रकाश चौधरी
Updated Fri, 29 May 2026 05:05 AM IST
सार

वैसे, किसी के जाने से क्या जाता है दुनिया से? लेकिन जाने वाला अगर बशीर बद्र जैसा शायर हो तो निश्चित रूप से मन में थोड़ी सी बारिश कम हो जाती है।

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Bashir Badr Obituary Urdu Poetry Ghazal Shayari Literary Loss Cultural Icon
बशीर बद्र - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

उर्दू की दुनिया का एक दरवाजा आज बहुत धीरे से बंद हो गया और लगा कि उस दरवाजे से जाते हुए किसी ने आखिरी बार मुड़कर कहा हो, उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो। बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन सच तो यह है कि कुछ लोग कभी जाते नहीं, वे भाषा की नमी में घुल जाते हैं। दीवारों पर टिके पुराने कैलेंडरों, आधी रात की तन्हाई, बिछड़न की तहों और प्रेम के संकोची क्षणों में धीरे-धीरे बोलते रहते हैं। उनके शेर मंच से उतरकर सीधे दिल में आ बैठते थे। उनमें कोई शोर नहीं था, कोई बौद्धिक अकड़ नहीं। वे चाय की भाप की तरह आते थे और धीरे-धीरे मन के भीतर जमी उदासी को छू लेते थे।
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वैसे, किसी के जाने से क्या जाता है दुनिया से? लेकिन जाने वाला अगर बशीर बद्र जैसा शायर हो तो निश्चित रूप से मन में थोड़ी सी बारिश कम हो जाती है। थोड़ी जगह खाली हो जाती है, उन बेंचों पर, जहां प्रेम में पड़े लड़के अपने नाम के आगे किसी और का नाम लिखते हैं। थोड़ी कम हो जाती है रात की वह नरमी, जिसमें आदमी अपना दुख धीरे से खोलकर रख देता है। उन्होंने गजल को महफिलों की ऊंची दीवारों से उतारकर आम आदमी की जेब में रख दिया। उनके शेर किताबों से ज्यादा लोगों की जिंदगी में मिले। किसी छात्र की कॉपी के आखिरी पन्ने पर। किसी बूढ़े आदमी की धुंधली स्मृतियों में। किसी रूठी हुई स्त्री की चुप्पी में। किसी अधूरी मोहब्बत के मोबाइल स्टेटस में।
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...और अब जब वे चले गए हैं, तो लगता है भाषा के आंगन में उर्दू की धूप थोड़ी कम हो गई है। फिर भी उनके शेर हमारे साथ रहेंगे हमेशा। किसी अकेले आदमी के कमरे में। किसी प्रेमिका की आंखों में। किसी ट्रेन की खिड़की के पास बैठे यात्री के साथ और शायद तभी कहीं दूर से फिर वही आवाज आएगी-“मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी/किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी...। ”
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लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...अगर उनकी शायरी को देखें तो उनके यहां टूटे हुए घर हैं, बिखरे रिश्ते हैं, शहरों की वीरानी है, लेकिन इन सबके बीच आदमी बने रहने की जिद भी है, “ लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...। ”उनका एक शेर कई बार किसी पूरे उपन्यास से अधिक देर तक मन में ठहर जाता है। यह ठहराव ही उनकी असली ताकत थी-"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से/ ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से  मिला करो।"
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