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बाहुबली बिहार के: आईएएस की हत्या में फांसी की सजा पाने वाला बाहुबली, जिसके लिए सरकार पर है नियम बदलने का आरोप

Wed, 13 Aug 2025 07:20 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 13 Aug 2025 07:20 AM IST
सार

अमर उजाला ने अपनी सीरीज 'बिहार के बाहुबली' के पहले अंक में अनंत कुमार सिंह की बात की थी। आज बात नीतीश से मिलने पहुंचे दूसरे बाहुबली नेता आनंद मोहन की।

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Bahubali Bihar Ke Anand Mohan Singh leader first Death Sentence Lovely Anand JDU RJD Samata Party Sheohar
बाहुबली बिहार के-2: आनंद मोहन सिंह। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

बिहार की राजनीति में बाहुबलियों का दबदबा काफी पुराना है। बीते दिनों मोकामा के पूर्व विधायक अनंत कुमार सिंह नीतीश कुमार से मिलने पहुंचे तो एक बार फिर सियासत और बाहुबल के कनेक्शन को लेकर चर्चा का बाजार गर्म हो गया। अनंत सिंह के निकलने के कुछ ही देर बाद पूर्व सांसद आनंद मोहन भी शिवहर की मौजूदा सांसद और अपनी पत्नी लवली आनंद और बेटे चेतन आनंद के साथ नीतीश से मिलने पहुंच गए। 
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इनके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि अनंत सिंह और आनंद मोहन की मुलाकातें बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से जुड़ी हैं। अमर उजाला ने अपनी सीरीज 'बिहार के बाहुबली' के पहले अंक में अनंत कुमार सिंह की बात की थी। आज बात नीतीश से मिलने पहुंचे दूसरे बाहुबली नेता आनंद मोहन की।
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ये भी पढ़ें: बिहार के बाहुबली: छोटे सरकार की अपराध कथाएं 'अनंत', आठ की उम्र में हुआ पहला मुकदमा; सियासी हनक की है ऐसी कहानी
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कौन हैं आनंद मोहन?
बिहार के सहरसा जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर पूर्व में एक गांव है। नाम है- पंचगाछिया। इस गांव ने शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में देश को कई अहम चेहरे दिए हैं। इस इलाके को पारंपरिक तौर पर संगीत प्रेमियों के क्षेत्र के तौर पर भी जाना जाता है। हालांकि, बीते पांच दशक से पंचगाछिया एक और कारण से सुर्खियों में रहा है। यह कारण है 'आनंद मोहन'। स्वतंत्रता सेनानी परिवार में जन्मे आनंद की बिहार की राजनीति में आगे बढ़ने की कहानी उतनी ही दिलचस्प है, जितनी उनकी अपने परिवार की छांव से बाहुबली बनने तक की कहानी है। 

65 साल के आनंद मोहन फिलहाल भले ही राजनीतिक गलियारों में किसी पद पर न हों, लेकिन उनकी सियासी हनक आज भी कायम है। इसका अंदाजा इससे लगा है कि उनकी पत्नी लवली आंनद शिवहर लोकसभा सीट से जदयू की सांसद हैं, उनके बेटे चेतन आनंद 2020 में राजद के टिकट पर शिवहर विधानसभा सीट से जीते थे। हालांकि, चेतन अब जदयू में हैं। 

वापस आनंद मोहन की कहानी पर लौटते हैं। आनंद मोहन की राजनीति से जुड़ने की कहानी शुरू होती है साल 1974 से। उस वक्त जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार में छात्र आंदोलन चल रहा था। जेपी का यह आंदोलन बाद में इतना बड़ा बना कि देश में आपातकाल तक लगा। आनंद मोहन इसी आंदोलन में शामिल होने के लिए पढ़ाई-लिखाई छोड़ बैठे और सरकार के खिलाफ प्रदर्शनों में उतर गए। जानकारों की मानें तो आपातकाल के तीन वर्षों ने आनंद मोहन की छवि को बाहुबली के तौर पर गढ़ने में अहम भूमिका निभाई। 



1977 में जब आपातकाल खत्म हुआ तो आनंद मोहन पूरी तरह बाहुबली नेता बनने की ओर अग्रसर हो गए। इस कड़ी में उन्होंने युवाओं को अपने साथ लिया और समाजवादी क्रांति सेना नाम के एक दल का गठन किया। इस संगठन की बदौलत आनंद मोहन ने पूरे सहरसा में न सिर्फ अपना वर्चस्व कायम किया, बल्कि कुछ साल बाद उनके बाहुबल का अंदाजा सियासी दलों को भी हो गया।

1977 से 1990 के दौर को बिहार में किसानों और मजदूरों के ऊंची जाति के भूमि मालिकों के खिलाफ संघर्ष के दौर के तौर पर भी याद रखा जाता है। जहां किसानों-मजदूरों का नेतृत्व वामपंथी संगठन कर रहे थे, वहीं कुछ अन्य पार्टियां जमींदारों के साथ थीं। दो वर्गों के बीच इस पूरे संघर्ष का बड़ा प्रभाव बिहार के कोसी और पूर्णिया संभाग पर पड़ा। इसी दौर में बिहार में राजीव रंजन उर्फ पप्पू यादव जैसे चेहरे भी उभरे, जिन्होंने खुद को पिछड़ी जातियों के नेता के तौर पर पेश किया। धीरे-धीरे किसानों और मजदूरों का जमींदारों से संघर्ष जातीय संघर्ष में बदल गया। बताया जाता है कि आनंद मोहन इसी दौरान पूरे कोसी क्षेत्र में राजपूत नेता के तौर पर प्रोजेक्ट हुए और उन्हें अगड़ी जातियों के पैरोकार के तौर पर पहचान मिली। धीरे-धीरे वे क्षेत्र में बाहुबली और रॉबिनहुड के शीर्षक से भी पहचाने जाने लगे। 

...और फिर हुई चुनावी राजनीति में एंट्री
1990 आते-आते आनंद मोहन पर राजनीतिक दलों की निगाहें टिक गईं। उन्हें लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले जनता दल की तरफ से टिकट मिला और सहरसा जिले की महिशी सीट से आनंद मोहन विधायक बन गए। दावा किया जाता है कि आनंद मोहन को 1980-1990 के बीच बिहार के शिवहर से कद्दावर नेता रघुनाथ झा का जबरदस्त समर्थन हासिल था और वे ही आनंद को राजनीति में लेकर आए। रघुनाथ झा विधायक के अलावा सांसद और बिहार सरकार में मंत्री की भूमिका भी निभा चुके थे। 

1990 में विधायक बनने के एक साल बाद ही आनंद मोहन का विवाह हो गया। उनकी पत्नी बनीं बिहार के जाने-माने राजनीतिक परिवार से आने वाली लवली आनंद, जिनकी मौसी माधुरी सिंह कांग्रेस की तरफ से 1980 में सांसद रही थीं। यही लवली आनंद बाद में विधायक से लेकर सांसद तक बनी।

लौटते हैं आनंद मोहन के राजनीतिक सफर पर। 1990 का दौर वह समय था, जब न सिर्फ किसान-मजदूरों की उच्च जाति के जमींदारों से टक्कर थी, बल्कि केंद्रीय राजनीति में यह दौर मंडल (पिछड़ी जातियों के आरक्षण) और कमंडल (अयोध्या के राम मंदिर के आंदोलन) की राजनीति का था।  

ऐसे में जब वीपी सिंह ने मंडल आयोग की पिछड़ों को आरक्षण देने की सिफारिशों को लागू किया तो जनता दल में ही कई धड़े बन गए। एक धड़ा लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और राम विलास पासवान जैसे नेताओं का था, जो कि आरक्षण के फैसले के समर्थन में थे तो वहीं एक धड़ा आरक्षण विरोधियों का था। राजपूत नेता आनंद मोहन का जनता दल में अलग धड़ा बन चुका था।

जहां केंद्र में भाजपा ने कुछ समय बाद जनता दल सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे गिरा दिया, तो वहीं बिहार में भी जनता दल से नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस की जोड़ी और आनंद मोहन जैसे नेता नाराज हो गए। जहां नीतीश-फर्नांडिस ने बाद में अपनी अलग समता पार्टी बना ली, तो वहीं आनंद मोहन ने 1993 में अपनी अलग- बिहार पीपुल्स पार्टी बना ली। लेकिन बिहार में आनंद मोहन और कुछ नेताओं के जनता दल से नाता तोड़ने के बावजूद लालू यादव की जनता दल सरकार के पास सत्ता में बने रहने लायक पर्याप्त समर्थन रहा।

आनंद मोहन के सियासी जीवन में अगला अहम पड़ाव 1994 में आया, जब उन्होंने अपनी पत्नी लवली आनंद को वैशाली लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उतारा। लवली ने इस चुनाव में एक और राजपूत नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा को हरा दिया। यह जीत दो कारणों से अहम रही। पहला- लवली आनंद इस चुनाव में नीतीश कुमार की समता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर जीती थीं। ऐसे में यह जीत बिहार में समता पार्टी के बढ़ते प्रभाव को दर्शाने में अहम रही। दूसरा सत्येंद्र नारायण की पत्नी की हार के बाद राजपूत वर्ग से आने वाले आनंद मोहन अब उनकी जगह लेने के लिए तैयार दिखने लगे।    



 

आनंद मोहन ने इसके बाद अपनी बिहार पीपुल्स पार्टी के बैनर तले 100 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे। खुद आनंद मोहन तीन सीटों से खड़े हुए। लेकिन तीनों पर ही उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उनकी पार्टी भी चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाई। इसके बाद आनंद मोहन को समता पार्टी के जरिए एनडीए में जाना पड़ा। इस बदलाव के बाद उनकी किस्मत ने एक बार फिर पलटी खाई और 1996 और 1998 में वे दो बार समता पार्टी के टिकट पर शिवहर से सांसद बने। 

आनंद मोहन बाद में कुछ आपराधिक मामलों में घिरने की वजह से खुद चुनाव नहीं लड़े। हालांकि, उनकी पत्नी लवली आनंद न सिर्फ चुनाव लड़ीं, बल्कि बिहार विधानसभा में बाढ़ और नबीनगर सीट से दो बार विधायक रहीं। 2024 में उन्होंने शिवहर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और इसमें भी जीत दर्ज की। लवली आनंद की हर जीत के पीछे उनके पति आनंद मोहन का प्रभाव और हाथ माना जाता है। 

आपराधिक जीवन की कहानी: पहले नेता, जिन्हें मिली फांसी की सजा
तहलका मैगजीन की एक रिपोर्ट में दावा किया जा चुका है कि 1977 में जब मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री थे, तब उनके किसी फैसले पर आनंद मोहन इतने नाराज थे कि उन्होंने अपने साथियों के साथ पीएम के काफिले को काले झंडे दिखाए। इतना ही नहीं सहरसा-सुपौल बेल्ट में आनंद मोहन ने अपराधियों का एक गुट तक बनाया था, जो अलग-अलग तरह के अपराधों में शामिल रहा। देखते ही देखते इस गुट को अमीर और ताकतवर व्यापारियों से छीनने वाला और गरीबों को देने वाला गिरोह करार दिया जाने लगा। आनंद मोहन पर अलग-अलग जिलों में केस भी दायर हुए, लेकिन जनता के बीच उनकी छवि रॉबिनहुड की बनती चली गई। 1983 में पहली बार पुलिस की पकड़ में आने के बाद उन्हें तीन महीने की जेल की सजा भी काटनी पड़ी। 

बिहार में आनंद मोहन पर एक समय 30 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे। हालांकि, उनके खिलाफ जो सबसे बड़ा केस था, वह था गोपालगंज के जिलाधिकारी- जी. कृष्णय्या की हत्या का। दरअसल, हुआ कुछ यूं था कि 1994 में जिस चुनाव में लवली आनंद जीती थीं, उस चुनाव में वैशाली सीट से उनके प्रचार का जिम्मा संभाल रहा था गैंगस्टर छोटन शुक्ला, जो कि आनंद मोहन का काफी करीबी था। 4 दिसंबर 1994 को कुछ अज्ञात लोगों ने छोटन शुक्ला पर गोलीबारी कर दी और उसकी मौत हो गई। 

अगले दिन यानी पांच दिसंबर को जब छोटन के शव के साथ भीड़ वैशाली से लालगंज प्रदर्शन करते हुए जा रही थी, तब आनंद मोहन और उसके समर्थक भी प्रदर्शनकारियों के साथ जुड़ गए। इसी दौरान गोपालगंज डीएम का काफिला प्रदर्शनकारियों के सामने आ गया। बताया जाता है कि आनंद मोहन के भड़काने के बाद भीड़ ने डीएम पर हमला बोला। 2007 में निचली अदालत ने इस मामले में आनंद मोहन को दोषी पाने के साथ मौत की सजा सुनाई। तब फैसले में कहा गया था कि भीड़ के हमले के दौरान ही आनंद मोहन भीड़ के बीच से आगे आया और छोटन शुक्ला के भाई भुटकुन शुक्ला को डीएम को गोली मारने के लिए बोला। इस उकसावे के बाद ही भुटकुन ने कृष्णय्या को गोली मार दी। 

पुलिस ने इस केस में कुल 36 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था। आनंद मोहन के साथ उनकी पत्नी लवली आनंद और भुटकुन भी मामले में आरोपी बनाए गए।  

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