अयोध्या : गैर विवादित जमीन कितनी है ये भी स्पष्ट नहीं, जानें किस शर्त पर मिली थी न्यास को जमीन
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अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग एक बार फिर खड़ी हो गई है। प्रयाग कुंभ में बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने अयोध्या में 21 फरवरी को राम मंदिर का शिलान्यास करने का ऐलान किया है। वहीं विश्व हिंदू परिषद ने भी गंगा पूजन कर मंदिर निर्माण का संकल्प लिया है। लेकिन हैरानी की बात को ये है कि गैर विवादित जमीन आखिर कितनी है ये भी स्पष्ट नहीं है। इस बारे में अलग-अलग बातें कही जा रही है।
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केंद्र ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
हाल ही में केंद्र सरकार अयोध्या की गैर विवादित जमीन को उसके असल मालिकों को लौटाने की अर्जी लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। आज से करीब 26 साल पहले अयोध्या में विवादित स्थल के आसपास की 67.703 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी।
सरकार का कहना है कि केवल 0.313 एकड़ जमीन ही विवादित है। इसलिए बाकी की जमीन उसके असल मालिकों को मिलनी चाहिए। अर्जी में 42 एकड़ भूमि के हिस्से के मालिक के रूप में विश्व हिंदू परिषद के ट्रस्ट राम जन्मभूमि न्यास का जिक्र किया गया है। लेकिन न्यास को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
किस शर्त पर मिली थी न्यास को जमीन
साल 1980 के अंत में उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग ने राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के आसापास की जमीन अधिग्रहित कर ली थी। इसके अलग-अलग हिस्सों के मालिक 20 ज्यादा परिवार थे। इन्हें जमीन के बदले मुआवजा दिया गया। इसके बाद राम जन्मभूमि न्यास को रामकथा पार्क के निर्माण के लिए 42 एकड़ जमीन दी गई। न्यास ने प्रस्ताव रखा था कि वह अपने संसाधनों से इस पार्क को विकसित करेगा। इसी शर्त पर उसे सरकार ने 1 रु. सालाना लीज पर जमीन दे दी।
इसके बाद बाबरी मस्जिद ढहा दी गई और केंद्र में बैठी नरसिम्हा राव सरकार ने उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया। फिर केंद्र ने 'सर्टन एरियाज अॉफ अयोध्या एक्ट-1993' बनाकर 67.703 एकड़ जमीन अपने कब्जे में ले ली। जिसमें न्यास को दी गई 42 एकड़ जमीन भी शामिल है। ऐसे में क्या न्यास का इस 42 एकड़ पर अधिकार माना जाएगा। या फिर ये जमीन भी सरकार की मानी जाएगी।
केंद्र के फैसले को चुनौती
केंद्र के जमीन अधिग्रहण करने के बाद करीब 26 साल पहले मोहम्मद इस्माइल फारूकी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। जो अभी केंद्र ने अर्जी दाखिल की है वो भी इसी जमीन को लेकर है। कोर्ट ने फारूकी की चुनौती को खारिज कर दिया और कहा कि केंद्र सिर्फ जमीन का संग्रहक है। जब मालिकाना हक का फैसला होगा तब मालिकों को जमीन लौटा दी जाएगी।
न्यास की मांग भी हुई खारिज
साल 1993 में न्यास ने केंद्र सरकार से जमीन मांगी थी लेकिन उसकी मांग ठुकरा दी गई। इसके बाद उसने हाई कोर्ट से गुहार लगाई, लेकिन वहां भी 1997 में मांग खारिज हो गई। 1996 में गैर विवादित जमीन पर गतिविधियों को लेकर असलम भूरे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी। जिसपर 2002 में सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि अधिग्रहित जमीन पर यथास्थिति बनाए रखना जरूरी है। साथ ही कोर्ट ने कहा कि विवादित और गैर विवादित जमीन को अलग करके नहीं देखा जा सकता।
आखिर कितनी है गैर विवादित जमीन
सरकार की ओर से जो अर्जी दाखिल की गई है, उसके अनुसार विवादित क्षेत्र 0.313 एकड़ है। बाकी की जमीन गैर विवादित है। जिसे उसके मूल मालिकों को लौटाने की बात कही गई है। वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में 16 अपीलें लंबित हैं, जहां 2.77 एकड़ जमीन का विवाद है। ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि गैर विवादित जमीन 67 एकड़ है या 65 एकड़।
सरकार ने 29 जनवरी को गैर विवादित जमीन की वापसी को लेकर कोर्ट में अर्जी लगाई। ये वही दिन है जब राम मंदिर मामले की सुनवाई होनी थी। लेकिन पांच में से एक जज मौजूद नहीं थे, जिसके कारण सुनवाई टल गई।
तीन पक्षों में बंटी थी जमीन
साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था। एक हिस्सा रामलला के पक्षकारों को मिला। दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को और तीसरा हिस्सा सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को मिला। लेकिन 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी।
अब आगे क्या हो सकता है
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की अर्जी के बाद इस्माइल फारुकी और असलम भूरे जैसे मामलों पर बहस शुरू हो सकती है। इसके अलावा अगर सरकार की अर्जी स्वीकार कर ली जाती हो तो भी उस जमीन के कई पक्षकार होंगे। ऐसे में सहमति न बनने से भी समस्या पैदा हो सकती है।
सरकार की है जमीन?
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि अनुच्छेद 300ए के तहत अब यह जमीन केंद्र सरकार की है। इसे मंदिर निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। उनका कहना है कि रोक इस बात की थी कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की सुनवाई पूरी होने तक इस जमीन पर यथास्थिति बनी रहे। लेकिन कोर्ट का फैसला 9 साल पहले आ चुका है। ऐसे में अब अतिरिक्त जमीन को लेकर विवाद नहीं है।