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Explainer: क्या है अयोध्या के राम मंदिर चढ़ावे के गबन का पूरा मामला, कब-कैसे हुआ घटनाक्रम, कौन था शामिल?

Thu, 25 Jun 2026 09:46 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 25 Jun 2026 09:46 PM IST
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सार
अयोध्या राम मंदिर इस बार चर्चा में है। चर्चा की वजह है कथित तौर पर मंदिर परिसर के दानपात्रों से 'गबन' के आरोप। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की तरफ से गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने राम मंदिर के इस कथित गबन की जांच की और 15 और 16 जून को कई बड़े चेहरों से पूछताछ की गई थी। 
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Ayodha Ram Mandir Donation Scam Row claimed to be multi Crore know SIT Probe Ram Mandir Trust Accussed explain
राम मंदिर में दान की राशि के गबन की जांच जारी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अयोध्या में स्थित राम मंदिर इस वक्त चर्चाओं में है। मंदिर परिसर के दानपात्रों से 'गबन' का आरोप इस चर्चा की वजह है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था, जिसकी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी गई। इस मामले में कुल आठ लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। 


आखिर यह पूरा मामला क्या है? यह किस दौर में हुआ? कैसे राम मंदिर के दानपात्रों से कथित तौर पर करोड़ों रुपये की राशि गायब की जाती रही? इस मामले का खुलासा कैसे हुआ? किस-किस पर इस घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे हैं? आइए जानते हैं...


पहले जानें- कब से कब तक हुआ राम मंदिर में दान राशि का गबन?
आरोप है कि राम मंदिर के दान की राशि में गबन का यह सिलसिला करीब सवा साल तक बेरोकटोक चल रहा था। दान की रकम पार करने वाले संदिग्ध नियमित रूप से दानपात्रों से इकट्ठा रकम इधर से उधर कर रहे थे। कुछ मौकों पर ये हेरफेर अपने चरम पर रही...

महाकुंभ और माघ मेले के दौरान: पिछले साल हुए महाकुंभ और इस साल माघ मेले के समय जब प्रयागराज से करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु अयोध्या दर्शन के लिए भी पहुंचे, तो चढ़ावे की राशि में बेशुमार बढ़ोतरी हुई। कथित गबन करने वालों के लिए यह समय बहुत सुनहरा साबित हुआ और गिनती करने वाले लोगों ने इसका फायदा उठाते हुए एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक चंदे की राशि से पार किए।

आखिरी के महीनों में ज्यादा गबन: यह बात भी सामने आई कि पकड़े जाने से ठीक पहले, यानी आखिरी के कुछ महीनों में इन कर्मचारियों द्वारा बहुत बड़ी-बड़ी रकम पार की गई थी। इस तरह महाकुंभ से शुरू हुई यह चंदा चोरी लगातार सवा साल तक चलती रही और अधिकारियों, सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद किसी को इसकी भनक तक नहीं लग पाई। सोशल मीडिया पर गबन की गई राशि 200 करोड़ से लेकर 1400 करोड़ रुपये तक बताई जा रही है।  

अब जानें- कैसे हुआ राम मंदिर से इतना बड़ा गबन?

राम मंदिर से दान राशि का इतना बड़ा गबन किसी एक व्यक्ति का काम नहीं था, बल्कि यह नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद, सुरक्षा में भारी चूक और गिनती की प्रक्रिया में मौजूद खामियों का फायदा उठाकर किया गया एक सुनियोजित खेल था।

1. नियुक्तियों में खेल और 'टिन्नू' का नेटवर्क

मंदिर को हर दिन मिलने वाले चढ़ावे की गिनती की जिम्मेदारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को मिली थी। हालांकि, बैंक ने चंदा गिनने वाले कर्मचारियों को एक आउटसोर्सिंग कंपनी के माध्यम से रखा था। इसमें खेल यह किया गया कि कंपनी में वही लोग चंदा गिनने के लिए रखे गए, जिन्हें ट्रस्ट ने तय किया था। ये लोग ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों के रिश्तेदार या परिचित थे। इसमें 'टिन्नू' नाम के व्यक्ति की मुख्य भूमिका सामने आई है, जिसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए करीब 35 से 40 अपने ही लोगों को नौकरी पर रखवा लिया था।



ये भी पढ़ें: राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी: बेहिसाब चढ़ावा, असीमित गबन, भाग रहे जिम्मेदार; अब 200 करोड़ के घपले की चर्चा

2. गिनती के दौरान ही पार होती थी रकम
चोरी का तरीका बेहद शातिराना था। गिनती शुरू करने से पहले सभी दानपात्रों को खोलकर पूरी रकम एक जगह इकट्ठा कर ली जाती थी, जिससे पहले से यह पता नहीं रहता था कि कुल कितनी रकम है। इसी का फायदा उठाकर कर्मचारी गिनती के दौरान ही रकम पार कर देते थे। अंत में जोड़-घटाकर जो रकम बचती, उसी का विवरण दर्ज कर दिया जाता था, जिससे चोरी पकड़ में नहीं आती थी।

3. बिना तलाशी के कर्मियों की आवाजाही 
मंदिर परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम होने के बावजूद ट्रस्ट की तरफ से रखे गए ये कर्मचारी गले में आईकार्ड पहनकर मंदिर के कोने-कोने तक बेखौफ आते-जाते थे। सबसे बड़ी चूक यह रही कि ट्रस्ट के अपने लोग होने के कारण इन कर्मचारियों की न तो कोई तलाशी ली जाती थी और न ही इनका सत्यापन किया गया था। आरोप है कि महाकुंभ और माघ मेले के दौरान जब चढ़ावा कई गुना बढ़ गया था, तो इसका फायदा उठाकर इन चोरों ने लंबी गिनती का फायदा उठाया और एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक पार कर दिए।

4. कम वेतन की आड़ में बड़ा खेल
पकड़े गए कर्मचारी मात्र 12 से 18 हजार रुपये के मासिक वेतन पर काम कर रहे थे। इतने कम वेतन के बावजूद वे दिन-रात मंदिर में लंबी ड्यूटी करते थे, क्योंकि उन्हें वेतन से कोई फर्क नहीं पड़ता था, वे चढ़ावे की करोड़ों की रकम पार कर रहे थे। चूंकि ये कर्मचारी ट्रस्ट की सिफारिश पर रखे गए थे, इसलिए बैंक अधिकारियों ने भी इनकी कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए। इस पूरे मामले में बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

5. सीसीटीवी और निगरानी तंत्र की विफलता 
भले ही परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगे थे, लेकिन निगरानी व्यवस्था और ऑडिट पूरी तरह से अप्रभावी रहे। वास्तव में सीसीटीवी कैमरों ने घटनाओं को रिकॉर्ड किया था, लेकिन रियल-टाइम मॉनिटरिंग न होने के कारण चोरी का तुरंत पता नहीं चला। अब एसआईटी की जांच शुरू होने के बाद इन सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के रूप में कब्जे में लिया गया है, जिनसे मामले में कई अहम खुलासे होने के अनुमान हैं। हालांकि, ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी महिपाल सिंह ने आरोप लगाया था कि आठ महीने के सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दिए गए थे।

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राम मंदिर में गबन के मामले का खुलासा कैसे हुआ?

राम मंदिर में चल रहे गबन के इस बड़े मामले का खुलासा मुख्य रूप से दो चरणों में हुआ। बताया जाता है कि चढ़ावे की राशि में हेरफेर की भनक लगी, तो व्यवस्था की निगरानी की गई और तब जाकर इस पूरे खेल का उजागर हुआ। हालांकि, प्रकरण के सामने आने के बाद शुरुआत में ट्रस्ट ने इस मामले को बेहद गोपनीयता के साथ दबाए रखा था।

इस विवाद ने सार्वजनिक रूप से तब तूल पकड़ा जब समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दान के करोड़ों रुपये गायब होने का खुला आरोप लगाया। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर पोस्ट करते हुए कहा था कि चढ़ावे की करोड़ों की रकम गायब पाई गई है, जो बेहद शर्मनाक है। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने की मांग भी की।

अखिलेश यादव के आरोपों के बाद यह मामला धीरे-धीरे उजागर होना शुरू हुआ। इसके बाद अयोध्या से लेकर पूरे देश में राम मंदिर में सवा साल तक चले इस गबन को लेकर हड़कंप मच गया। ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने शुरुआत में चुप्पी साध ली। मामले के बाहर आने पर ट्रस्ट ने खुद ही गोपनीय स्तर पर संदिग्ध कर्मचारियों को पकड़ा और उनसे पूछताछ की। विवाद बढ़ने लगा तो ट्रस्ट ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जांच की मांग की। इसके बाद राज्य सरकार की तरफ से विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया, जिसने इस मामले की जांच कर पहली रिपोर्ट सौंप दी है।

ये हैं चढ़ावा चोरी के आरोपी

 राम मंदिर में दान की रकम के गबन से जुड़े आरोपों को लेकर गुरुवार को यहां आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।  इससे दो दिन पहले मामले की जांच कर रहे विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपी थी।

ट्रस्टी कृष्ण मोहन की तहरीर पर अयोध्या के कोतवाली रामजन्मभूमि में मुकदमा दर्ज किया गया। एफआईआर में ट्रस्ट सदस्य अनिल मिश्रा के रिश्तेदार अनुकल्प मिश्रा और लवकुश मिश्रा, महासचिव चंपत राय के चालक रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू, गणना कर्मी मनीष यादव, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, रमाशंकर मिश्र और गणना प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव को नामजद किया गया है। इसके अलावा कई अज्ञात लोगों को भी आरोपी बनाया गया है।

एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने सुनियोजित तरीके से साजिश रचकर चढ़ावा राशि के साथ धोखाधड़ी की और धनराशि का गबन किया। पुलिस ने कुछ नामजद आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। मामले में आगे और लोगों की भूमिका सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

चंदा गिनने वाले पांच मुख्य कर्मचारी: इस गबन को सीधे तौर पर अंजाम देने में मुख्य रूप से रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू, गणना कर्मी मनीष यादव, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, रमाशंकर मिश्र और गणना प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव पर आरोप लगे हैं। इन्होंने चोरी कुबूल की है और इन्हीं की निशानदेही पर अब तक करोड़ों रुपये की रिकवरी की जा चुकी है। लवकुश के घर से करीब 10-12 लाख रुपये और अवनीश के बैंक खाते से 5 लाख रुपये बरामद किए गए हैं।

'टिन्नू' और उसकी तिकड़ी: इस पूरे खेल के मुख्य सूत्रधार के रूप में टिन्नू, उसके बेटे और भतीजे की तिकड़ी की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। टिन्नू ट्रस्ट के एक बड़े पदाधिकारी का बेहद करीबी है और उसने अपने इसी प्रभाव का इस्तेमाल करके करीब 35-40 अपने परिचितों को चंदा गिनने के काम पर रखवाया था। पकड़े गए पांच कर्मचारियों में शामिल रमाशंकर भी टिन्नू का ही रिश्तेदार है। टिन्नू का भतीजा तो मामले के पहले ही दिन पकड़ लिया गया था। 

जांच में पता चला है कि टिन्नू के पास अयोध्या और लखनऊ में करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी संपत्तियां हैं। वह कभी ऑटो रिक्शा चलाता था। अयोध्या अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास उसका एक 70 कमरों वाला छात्र छात्रावास भी है। एसआईटी जल्द ही इस छात्रावास की भी जांच कर सकती है।

पदाधिकारियों के रिश्तेदार और मध्यस्थ: जांच में यह भी सामने आया है कि हेरफेर में ट्रस्ट के एक बड़े पदाधिकारी के भतीजे की भी शुरुआती भूमिका थी, जिसकी शह पर अन्य लोग चोरी को अंजाम दे रहे थे, हालांकि बाद में टिन्नू ने उसे किनारे करवा दिया था।

सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर सोमेश आनंद भी आया था। वह मंदिर निर्माण के मुख्य प्रभारी गोपाल राव का कथित भतीजा बताया जा रहा है। सोमेश ने एक साल में देश के विभिन्न राज्यों की 50 से अधिक संदिग्ध यात्राएं की हैं। वह अयोध्या रेलवे स्टेशन से बोरों में भारी सामान भरकर ट्रेन से दक्षिण भारत जाता था। वापसी में वह हवाई जहाज से खाली हाथ अयोध्या लौटता था। फिलहाल सोमेश के बैंक खातों और हवाई टिकटों की बारीकी से जांच की जा रही है।

इस मामले में केडी तिवारी का नाम भी सामने आया है। उनके पास रामलला के आभूषणों को संभालने की मुख्य प्रशासनिक जिम्मेदारी थी। सुरक्षा अधिकारियों ने उनके आवास पर भी छापेमारी की थी। केडी तिवारी द्वारा हाल ही में खरीदी गई डेढ़ करोड़ रुपये की जमीन का सौदा जांच के दायरे में है। उन्होंने मीडिया से कहा, "मेरी ड्यूटी महज श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए आभूषणों को तौलकर उन्हें रसीद देने तक सीमित थी, उसके बाद मैं उसे ट्रस्ट के वरिष्ठों को सौंप देता था; आगे गहनों के साथ क्या खेल होता था, मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है।

ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारी: सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कई बड़े पदाधिकारी भी शक और जांच के घेरे में हैं। मंदिर की व्यवस्थाओं और चढ़ावे की गिनती के लिए मुख्य रूप से चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे पदाधिकारी जिम्मेदार हैं। इसके बावजूद चढ़ावे की रकम का गबन होना कई सवाल खड़े कर रहा है। ये सभी जिम्मेदार घटना के उजागर होने के बाद से खामोश हैं। एक भी पदाधिकारी की तरफ से इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया।। एसआईटी यह जांच कर रही है कि क्या इस गबन में शीर्ष स्तर से कोई संरक्षण या मिलीभगत तो नहीं थी।

बैंक अधिकारी और कर्मचारी: इस पूरी हेराफेरी में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है। बैंक ने जिस आउटसोर्सिंग कंपनी के जरिए कर्मचारियों को रखा, उसमें वही लोग भर्ती किए गए जिन्हें ट्रस्ट ने तय किया था। बैंक अधिकारियों ने इन सिफारिशी कर्मचारियों के काम और ऑडिट पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया, जिससे उनकी मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता।


कितनी राशि के गबन की हो रही बात?

राम मंदिर से गबन की गई राशि का कोई एक सटीक और आधिकारिक आंकड़ा अब तक सामने नहीं आया है, क्योंकि चंदा चोरों ने बहुत ही शातिराना तरीके से गिनती होने से पहले ही रकम पार कर दी थी। गिनती के बाद जो रकम बचती थी, केवल उसी का रिकॉर्ड दर्ज किया जाता था, इसलिए कुल कितने रुपये चोरी हुए, इसका सटीक अंदाजा लगाना जांच एजेंसियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। 

हालांकि, शुरुआती जांच और पकड़े गए संदिग्धों से पूछताछ के आधार पर आठ करोड़ रुपये से अधिक के हेरफेर के सीधे संकेत मिले हैं। दूसरी तरफ सोशल मीडिया और आम चर्चाओं में यह आंकड़ा सैकड़ों करोड़ (लगभग 200 करोड़ रुपये) तक पहुंचने की बात कही जा रही है। हालांकि, इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

चौंकाने वाली बात यह है कि चोरी केवल नकदी तक सीमित नहीं थी। दान में आए करोड़ों रुपये के सोने-चांदी के जेवरात भी गायब किए जाने के आरोप लगे हैं। चर्चा तो यह भी है कि असली सोने के आभूषणों को हटाकर उनकी जगह नकली जेवरात रख दिए गए और यहां तक कि दान में मिली दो किलो की सोने की गदा भी गायब बताई जा रही है। 

अब कैसे चल रही इस कथित गबन की जांच?

मामले में अब उच्च स्तरीय जांच की जा रही है। इसके लिए एसआईटी का गठन हुआ। इस दल में लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी रेंज लखनऊ किरन एस और विशेष वित्त सचिव नील रतन शामिल हैं। सरकार ने एसआईटी को सात दिन के भीतर अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और 15 दिन में अंतिम (फाइनल) रिपोर्ट सौंपने का सख्त निर्देश दिया है।



अभी कहां तक पहुंची एसआईटी की जांच
  • टीम ने मंदिर परिसर स्थित ट्रस्ट के कार्यालय पहुंचकर दान राशि से जुड़े महत्वपूर्ण रिकॉर्ड, दस्तावेज और वित्तीय अभिलेख अपने कब्जे में ले लिए हैं।
  • एसआईटी ने घटना से जुड़े अहम सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के तौर पर कब्जे में लिया है। 
  • टीम ने इस बात की भी बारीकी से जांच की है कि दानपात्र कहां रखे जाते हैं, गिनती से पहले उन्हें किस कमरे में ले जाया जाता है और वहां निगरानी की क्या व्यवस्था है।
  • एसआईटी ने पकड़े गए संदिग्ध कर्मचारियों से पूछताछ करने के साथ-साथ बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों को भी तलब किया है।

  • बैंक कर्मियों से विशेष रूप से यह पूछा जा रहा है कि गिनती करने वाले कर्मचारियों की भर्ती किस तरह और किसकी सिफारिश पर की गई थी।
  • यह जांच केवल वित्तीय हेरफेर तक सीमित नहीं है। एसआईटी यह भी गहराई से खंगाल रही है कि क्या इस गबन के पीछे किसी बड़े पदाधिकारी, ट्रस्टी या शक्तिशाली व्यक्ति का संरक्षण, मिलीभगत या लापरवाही थी। 
  • बताया गया है कि किसी ट्रस्टी की संलिप्तता या गंभीर प्रशासनिक चूक पाई जाती है, तो उनके अधिकार सीमित किए जा सकते हैं। 
  • राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा के मुताबिक, इस जांच के दो मुख्य पहलू हैं- पहला इस आपराधिक कृत्य की तह तक जाना और दूसरा भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तंत्र स्थापित करना।
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