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Tushar Mehta: 'राम मंदिर भूमि विवाद के फैसले में देरी हो, इसके लिए हुईं कई कोशिशें...' सॉलिसिटर जनरल का बयान
Fri, 07 Nov 2025 10:28 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 07 Nov 2025 10:28 PM IST
सार
Tushar Mehta: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद की सुनवाई रोकने की कई कोशिशें की गई थीं। उन्होंने बताया कि जब देरी के सभी प्रयास असफल हुए, तो दो वरिष्ठ वकीलों ने कोर्ट से वॉकआउट तक कर दिया था। मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने न्यायिक दूरदर्शिता दिखाते हुए इस ऐतिहासिक मामले को सही दिशा में आगे बढ़ाया।
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तुषार मेहता
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शुक्रवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले की प्रभावी सुनवाई न हो सके, इसके लिए कई कोशिशें की गई थीं। उन्होंने यह बात यहां इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम में कही, जहां 'केस फॉर राम- द अनटोल्ड इनसाइडर्स स्टोरी' नाम की किताब का विमोचन किया गया।
पांच जजों की संविधान पीठ ने दिया था सर्वसम्मति से फैसला
साल 2019 में आए ऐतिहासिक फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अयोध्या के विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण की अनुमति दी थी। कोर्ट ने पूरे 2.77 एकड़ भूमि मंदिर निर्माण के लिए दी, जबकि मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ की जमीन अलग से देने का आदेश दिया था।
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'जब देरी के प्रयास विफल हुए, तो दो वकीलों ने किया वॉकआउट'
तुषार मेहता ने कहा, ऐसी कोशिशें हुईं... कभी छिपकर तो कभी खुलकर ताकि इस मामले की सुनवाई आगे न बढ़ सके।उन्होंने बताया, एक घटना जिसने मेरे मन में बहुत कड़वाहट छोड़ दी, वह यह थी कि जब सभी देरी के प्रयास असफल हो गए, तब दो वरिष्ठ वकीलों ने कोर्ट से वॉकआउट कर दिया, ऐसा आमतौर पर हम संसद में देखते हैं, कोर्ट में नहीं।
'जजों ने पेश की न्यायिक दूरदर्शिता की मिसाल'
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इन अड़चनों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के जजों ने 'न्यायिक दूरदर्शिता और नेतृत्व' का शानदार उदाहरण पेश किया, जिससे मामला सही दिशा में आगे बढ़ सका। मेहता ने कहा कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद कई मायनों में देश के इतिहास का एक बड़ा मोड़ था। किताब को वरिष्ठ वकीलों अनिरुद्ध शर्मा और श्रीधर पोटाराजू ने लिखा है, जिसमें इस पूरे घटनाक्रम को क्रमवार और दिलचस्प तरीके से बताया गया है।
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'कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था मामला'
उन्होंने कहा, यह किताब केवल तथ्यों की सूची नहीं है, बल्कि एक कहानी की तरह पूरे घटनाक्रम का वर्णन करती है। यह इतिहास नहीं, बल्कि इतिहास बनने की प्रक्रिया का विवरण है। यह मामला कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कई दृष्टिकोणों से एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसमें यह बताया गया है कि हमारे देश की न्याय प्रणाली कैसे विकसित हुई, यह मुकदमा कैसे चला और कैसे आगे बढ़ा। इस कार्यक्रम में भारतीय पुरातत्वविद् केके मुहम्मद और वरिष्ठ वकील गुरु कृष्ण कुमार भी मौजूद थे।
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पांच जजों की संविधान पीठ ने दिया था सर्वसम्मति से फैसला
साल 2019 में आए ऐतिहासिक फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अयोध्या के विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण की अनुमति दी थी। कोर्ट ने पूरे 2.77 एकड़ भूमि मंदिर निर्माण के लिए दी, जबकि मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ की जमीन अलग से देने का आदेश दिया था।
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'जब देरी के प्रयास विफल हुए, तो दो वकीलों ने किया वॉकआउट'
तुषार मेहता ने कहा, ऐसी कोशिशें हुईं... कभी छिपकर तो कभी खुलकर ताकि इस मामले की सुनवाई आगे न बढ़ सके।उन्होंने बताया, एक घटना जिसने मेरे मन में बहुत कड़वाहट छोड़ दी, वह यह थी कि जब सभी देरी के प्रयास असफल हो गए, तब दो वरिष्ठ वकीलों ने कोर्ट से वॉकआउट कर दिया, ऐसा आमतौर पर हम संसद में देखते हैं, कोर्ट में नहीं।
'जजों ने पेश की न्यायिक दूरदर्शिता की मिसाल'
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इन अड़चनों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के जजों ने 'न्यायिक दूरदर्शिता और नेतृत्व' का शानदार उदाहरण पेश किया, जिससे मामला सही दिशा में आगे बढ़ सका। मेहता ने कहा कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद कई मायनों में देश के इतिहास का एक बड़ा मोड़ था। किताब को वरिष्ठ वकीलों अनिरुद्ध शर्मा और श्रीधर पोटाराजू ने लिखा है, जिसमें इस पूरे घटनाक्रम को क्रमवार और दिलचस्प तरीके से बताया गया है।
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'कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था मामला'
उन्होंने कहा, यह किताब केवल तथ्यों की सूची नहीं है, बल्कि एक कहानी की तरह पूरे घटनाक्रम का वर्णन करती है। यह इतिहास नहीं, बल्कि इतिहास बनने की प्रक्रिया का विवरण है। यह मामला कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कई दृष्टिकोणों से एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसमें यह बताया गया है कि हमारे देश की न्याय प्रणाली कैसे विकसित हुई, यह मुकदमा कैसे चला और कैसे आगे बढ़ा। इस कार्यक्रम में भारतीय पुरातत्वविद् केके मुहम्मद और वरिष्ठ वकील गुरु कृष्ण कुमार भी मौजूद थे।
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