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Space: अंतरिक्ष में जाने से चार साल ही शुरू हो जाती है बेहद कठिन ट्रेनिंग; कई चुनौतियों का करना पड़ता है सामना

Sat, 28 Jun 2025 05:57 AM IST
शिव शुक्ला अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Sat, 28 Jun 2025 05:57 AM IST
सार

नासा, ईएसए, इसरो या स्पेस एक्स जैसे संस्थानों में चुने जाने के बाद अंतरिक्ष यात्री को तीन से चार वर्षों तक कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है।  एस्ट्रोनॉट्स को विशेष वर्कआउट, स्पिन सेंटर ट्रेंनिंग, और जीरो ग्रैविटी फ्लाइट में संतुलन परीक्षण कराया जाता है। इसके बाद अंडरवॉटर ट्रेनिंग दी जाती है।

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Astronauts are prepared after three-four years of rigorous training
अंतरिक्ष में जाने के लिए करना पड़ता है कठिन प्रशिक्षण। - फोटो : freepic

विस्तार

अनंत अंतरिक्ष का सफर केवल रॉकेट की सवारी नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक और तकनीकी तैयारियों का चरम होता है। वहीं, उनके जीवन की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कवच स्पेस सूट तकनीकी चमत्कार से कम नहीं होता। अंतरिक्ष विशेषज्ञों के अनुसार नासा, ईएसए, इसरो या स्पेस एक्स जैसे संस्थानों में चुने जाने के बाद अंतरिक्ष यात्री को तीन से चार वर्षों तक कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें सबसे पहले होता है फिजिकल फिटनेस टेस्ट। अंतरिक्ष की सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण स्थिति में मांसपेशियों और हड्डियों की मजबूती बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। इसके लिए एस्ट्रोनॉट्स को विशेष वर्कआउट, स्पिन सेंटर ट्रेंनिंग, और जीरो ग्रैविटी फ्लाइट में संतुलन परीक्षण कराया जाता है। इसके बाद अंडरवॉटर ट्रेनिंग दी जाती है।

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समुद्र के भीतर बनाए गए विशेष अंतरिक्ष जैसे वातावरण में एस्ट्रोनॉट्स को ईवीए ( एक्स्ट्रा वेहिक्युलर एक्टिविटीज) यानी स्पेस वॉक की रिहर्सल कराई जाती है। नासा एस्ट्रोनॉट के ट्रेनिंग हेड स्पेस एक्सपर्ट डॉ. डेविड लॉन्ग कहते हैं, अंतरिक्ष में सफलता वहीं मिलती है जहां पृथ्वी पर तैयारी शत-प्रतिशत होती है।
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कवच व एक छोटे अंतरिक्ष यान जैसा है स्पेस सूट
स्पेस सूट एक तरह का छोटा अंतरिक्ष यान होता है। स्पेस सूट यानी ईवीए सूट केवल पहनावा नहीं, एक संपूर्ण जीवन रक्षा प्रणाली होता है। नासा के मौजूदा एक्स्ट्रा वेहिक्युलर मोबिलिटी यूनिट (ईएमयू) और स्पेस एक्स के इनोवेटिव सूट, दोनों ही हजारों घटकों से मिलकर बनते हैं। स्पेस सूट की प्रमुख विशेषताओं में इसका थर्मल रेगुलेशन सिस्टम है। अंतरिक्ष में तापमान -250 डिग्री +120 डिग्री तक हो सकता है। सूट में एक लिक्विड कूलिंग और वेंटीलेशन गारमेंट (एलसीवीजी) होता है, जो शरीर का तापमान स्थिर रखता है। 100% ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए सूट में प्राइमरी लाइफ सपोर्ट सिस्टम होता है।
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कई लेयर की संरचना, सुरक्षा की बहुस्तरीय दीवार
 स्पेस सूट की बाहरी बनावट जितनी साधारण दिखती है, उसकी भीतरी संरचना उतनी ही जटिल और वैज्ञानिक होती है। एक आधुनिक स्पेस सूट सामान्यतः 14 से अधिक लेयर्स से बना होता है, जिसमें हर परत की अपनी अलग भूमिका होती है। चाहे वह सूक्ष्म उल्कापिंडों से रक्षा हो या तापमान संतुलन बनाए रखना। यह बहुस्तरीय ढांचा अंतरिक्ष में इंसान की प्राकृतिक कमजोरियों की भरपाई करता है।  सबसे अंदर की परत को एलसीवीजी कहा जाता है। यह एक जालीदार कपड़ा होता है जिसमें पतली-पतली ट्यूब्स लगी होती हैं। इसके जरिए शीतल जल बहता है, जो शरीर की गर्मी को बाहर निकालता है। इसके ऊपर की परतें नमी नियंत्रण, त्वचा सुरक्षा और दबाव नियंत्रण के लिए बनाई जाती हैं। मध्य भाग में डाफ्लॉन  और नियोप्रीन जैसी सामग्री का प्रयोग होता है, जो सूट को वायुरुद्ध और लचीला बनाए रखती हैं। अंतिम सतह पर परावर्तक कोटिंग होती है, जो सूर्य की तीव्र गर्मी को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है। ह्यूमन सिस्टम लैब से जुड़े स्पेस टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. पॉल हैमंड के अनुसार हर लेयर सूट में एक जान डालती है।


रेडिएशन से मिलती है सुरक्षा
स्पेस सूट में केव्लार और नीलॉन जैसी उच्च शक्ति सामग्री होती है, जो सूक्ष्म उल्कापिंडों और रेडिएशन से सुरक्षा देती है। हेल्मेट और एचयूडी(हेड्स अप डिस्प्ले एस्ट्रोनॉट्स के लिए बेहद उपयोगी होते हैं। हेल्मेट में कम्युनिकेशन सिस्टम, एंटी-फॉग कोटिंग, और एलईडी लाइट होती है, जो कम रोशनी में कार्य में मदद करती है।

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