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Assembly Election 2022: रैलियां रद्द करने की तैयारी में चुनाव आयोग, क्या है सिंगापुर मॉडल जिससे पार्टियां रैलियां कर सकती हैं

Fri, 07 Jan 2022 11:15 AM IST
प्रतिभा ज्योति प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Fri, 07 Jan 2022 11:15 AM IST
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सार
इस बार नामांकन दाखिल करने से लेकर घर-घर प्रचार, मतदान केंद्रों पर और मतगणना के समय भी महामारी दिशानिर्देशों का 'बहुत सख्ती से' पालन कराया जाएगा।
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देहरादून में पीएम मोदी की रैली - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चुनाव आयोग आदर्श आचार संहिता के लागू होते ही राजनीतिक रैलियों को तत्काल रद्द करने की तैयारी में है। साथ ही कोरोना दिशानिर्देश उल्लंघन के मामले में जिलाधिकारियों को निलंबित करने की तैयारी कर रहा है। बताया जा रहा है कि गृह मंत्रालय के साथ गुरुवार को एक बैठक में चुनाव आयोग ने यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि राष्ट्रीय और राज्य आपदा प्रबंधन अधिनियम के प्रावधानों के तहत जिम्मेदारी तय की जाए ताकि मतदान वाले राज्यों में कोरोना दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू किया जा सके। चुनाव के दौरान कोरना गाइडलाइन के उल्लंघन के सबसे ज्यादा मामले नामांकन और चुनाव प्रचार के दौरान आते हैं, क्योंकि राजनीतिक दल अधिक से अधिक भीड़ जुटाकर अपना शक्ति प्रदर्शन करना चाहते हैं।


कई देशों में हुआ कोरोना गाइडलाइन का उल्लंघन
कोरोना गाइडलाइन के उल्लंघन का मामला केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर के कई देशों में देखने को मिला। 2020 में करीब 51 देशों में राष्ट्रीय चुनाव हुए। इन देशों में हुए चुनावों पर एक शोध के मुताबिक कई देशों ने लोगों की संख्या 100, 50 या बेहद कम 20 तक भी सीमित कर दी थी। मोंटेनेग्रो में, सार्वजनिक सभा 100 लोगों तक सीमित थी और अगस्त 2020 के संसदीय चुनावों से पहले रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।


जमैका में, अगस्त 2020 के आम चुनाव में  बैठकों में केवल 20 लोगों को इजाजत थी और प्रचार में केवल पांच लोगों को साथ रहने की मंजूरी मिली। जॉर्डन में सभाएं 20 लोगों तक सीमित थीं और नवंबर 2020 के आम चुनाव से पहले रैलियों पर पूरी तरह प्रतिबंध था। लेकिन फिर भी कोरोना उल्लंघन के मामले कई देशों में सामने आए।

 

प्रियंका गांधी की प्रतिज्ञा रैली में महिलाओं की भीड़ (फाइल फोटो)
प्रियंका गांधी की प्रतिज्ञा रैली में महिलाओं की भीड़ (फाइल फोटो) - फोटो : Twitter :@priyankagandhi
तो क्या राजनीतिक दल प्रचार ना करें? 
बढ़ते कोरोना मामलों को देखते हुए कई पार्टियों ने अपनी बड़ी रैलियां और भीड़-भाड़ वाले कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं। लेकिन यह सवाल तमाम सियासी दलों के मन में है कि क्या बिना रैली या प्रचार किए बिना ही उन्हें चुनाव में उतरना होगा। 

चुनाव आयोग के एक अधिकारी का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर में हमने भयंकर त्रासदी देखी है इसलिए चुनाव की शुरुआत सख्ती से की जाएगी। दिशानिर्देशों का उल्लंघन होने की स्थिति में सभी राजनीतिक दलों को एक स्पष्ट संदेश भेजने के लिए हम रैलियों को रद्द करने में संकोच नहीं करेगें। रैलियों को प्रतिबंधित करने के सिवा कोई और चारा भी नहीं है।

आयोग को पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट, फिर  उत्तराखंड हाईकोर्ट और उसके बाद नीति आयोग ने भी रैलियां रोकने का सुझाव दिया है, जिस पर आयोग ने गौर किया है। इसके अलावा स्वास्थ्य और गृह मंत्रालय की इस संबंध में रिपोर्ट मिली है।

सिंगापुर मॉडल देखना चाहिए
हालांकि विशेषज्ञ कहते हैं कि चुनाव होंगे तो प्रचार भी होगा और सियासी पार्टियों को जनता तक अपनी बात भी पहुंचानी है, इसके लिए कोई ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे प्रचार भी हो और संक्रमण भी न फैले। विशेषज्ञों की राय है कि इस मामले में सिंगापुर मॉडल को देखना चाहिए, जहां बिना शोर-शराबे, हो-हंगामे और भीड़ के बिना ही सुरक्षित चुनाव हो गए।
 

Chinatown street in Singapore
Chinatown street in Singapore - फोटो : iStock
क्या है सिंगापुर मॉडल 
कोरोना महामारी की पहली लहर के बीच 10 जुलाई 2020 में सिंगापुर में 13वीं संसदीय चुनाव हुए। चुनाव विभाग ने महामारी के साथ किसी भी राजनीतिक दल को पंरपरागत तरीके से चुनाव प्रचार करने और शारीरिक रैलियों को करने की अनुमति नहीं दी। चुनाव को ध्यान में रखकर कोरोना गाइडलाइन के कई नए नियम बनाए गए, लेकिन सिंगापुर में वोट पाने की लड़ाई ऑनलाइन जारी रही।

समझिए सियासी पार्टियों ने कैसी लड़ी चुनावी लड़ाई

चुनावी सभाओं की मंजूरी नहीं मिली।

सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

हर शहर में ई रैलियों का एक दिन तय किया गया।

प्रत्येक पार्टियों और उम्मीदवारों की रैलियों के लिए स्लॉट बुक किया  गया।

राजनीतिक दलों ने रैली के परंपरागत तरीके को छोड़कर अपनी ई-रैली शुरू कर दी। 

Singapore
Singapore - फोटो : BBC
प्रमुख स्थानों पर बड़े-बड़े वीडियो स्क्रीन लगाए गए। लोगों ने अपने घर के टीवी स्क्रीन और लैपटॉप पर इन रैलियों को देखा।

सभी पार्टियों को नेशनल टीवी पर अपनी बात रखने का बराबर समय मिला। उम्मीदवारों के लिए अधिक मीडिया एयरटाइम निकाला गया।

टीवी पर राजनीतिक प्रसारण रिकॉर्ड करने से पहले राजनीतिक दलों को अपनी स्क्रिप्ट जमा कराना अनिवार्य था। 

ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी के बारे में ऐसे अपमानजनक बयान नहीं हों  जो नस्लीय या धार्मिक तनाव का कारण बन सकते हैं।

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singapore
कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर प्रचार करने की अनुमति थी, लेकिन शर्त यह थी कि प्रति समूह में पांच से अधिक लोग साथ नहीं हों। 

प्रत्येक समूह को अन्य समूहों से एक मीटर की दूरी बनाए रखने, मास्क पहनने, अपनी बातचीत को संक्षिप्त रखने और हाथ मिलाने से बचने के सख्त निर्देश थे।

चुनाव प्रचार के परंपरागत तरीके में भावनात्मक प्रभाव होता है। जनता का उत्साह, जुनून, नेताओं के भाषण सुनने के लिए एकत्रित लोगों के शोर, हो-हल्ला, नारे और तालियां माहौल में चुनावी रंग घोल देते हैं, जिसकी कमी इस चुनाव में जरूर खली, लेकिन डिजिटल मीडिया की वजह से चुनाव सुरक्षित हुए। 
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