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Assam: अपर असम ने लिखी भाजपा की बड़ी जीत की पटकथा, यूपीपीएल की जगह बीपीएफ से गठबंधन से विजयी हैट्रिक
Wed, 06 May 2026 07:03 AM IST
अमन तिवारी
हिमांशु मिश्र/एन. अर्जुन
हिमांशु मिश्र/एन. अर्जुन
Published by: अमन तिवारी
Updated Wed, 06 May 2026 07:03 AM IST
सार
असम विधानसभा चुनाव में भाजपा ने रिकॉर्ड जीत दर्ज करते हुए सत्ता की हैट्रिक लगाई। राजनीतिक विश्लेषण में 2023 के परिसीमन, हिमंत बिस्व सरमा की सामाजिक रणनीति, महिला कल्याण योजनाओं और सूझबूझ भरे गठबंधन को जीत की मुख्य वजह माना जा रहा है। मुस्लिम बहुल सीटों के पुनर्गठन ने चुनावी समीकरण बदल दिए।
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हिमंता बिस्व सरमा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
असम में भाजपा और हिमंत बिस्व सरमा की सरकार की जीत की हैट्रिक के पीछे परिसीमन का सबसे बड़ा हाथ रहा। हालांकि हिमंत सरकार को नारी शक्ति और कल्याणकारी योजनाओं का भी साथ मिला। वहीं, मियां बनाम बहुसंख्यक की हिमंत की रणनीति ने सीटों को शतक के पार पहुंचाने की कुंजी रही। इस प्रचंड जीत का कारण पार्टी का सभी चार क्षेत्रों अपर व लोअर असम, बराक वैली और बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र (बीटीएडी) में प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस व एआईयूडीएफ पर पहली बार बनाई गई निर्विवाद रूप से अब तक की सबसे बड़ी बढ़त है।
वर्ष 2023 में हुए परिसीमन से असम में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 35 से घट कर 22 रह गई और इसी ने भाजपा की प्रचंड जीत में अहम भूमिका निभाई। कांग्रेस और राज्य में मुस्लिम सियासत की पहचान रहे एआईयूडीएफ मुख्य रूप से इन्हीं सीटों में उलझ गए। अपर व लोअर असम में भाजपा का मियां बनाम अन्य का मुद्दा हिट रहा। इस मुद्दे के सहारे पार्टी अपर असम की 35 में से 33 सीटें जीतने में कामयाब रही। बीते दो चुनाव में भी अपर असम ही भाजपा की सत्ता की चाबी थी। लोअर असम की 22 में से 16 सीटें भी पार्टी के हाथ लगी। मियां बनाम बहुसंख्यक का दांव इतना सफल रहा कि एआईयूडीएफ की सीटें 15 से घटकर 2 रह गई। कांग्रेस सिर्फ मुस्लिम प्रभाव वाले क्षेत्रों में ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाई।
परिसीमन बड़ा कारण
2023 में हुए परिसीमन में कई क्षेत्रों की सीमाएं बदली गईं और पुनर्गठन किया गया। कुछ ऐसे क्षेत्र, जहां पहले मुस्लिम बहुल आबादी थी, उन्हें अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। इसका सीधा असर भाजपा और सहयोगियों के पक्ष में दिखा।
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पिछले चुनावों में करीब 35 सीटों पर अल्पसंख्यक वोट बैंक कांग्रेस और एआईयूडीएफ के लिए निर्णायक भूमिका निभाता था। परिसीमन के बाद इसका प्रभाव घटकर 25 सीटों से भी कम रह गया। विपक्ष को जो 24 सीटें मिलीं, उनमें से अधिकांश वह क्षेत्र हैं, जहां परिसीमन का असर नहीं पड़ा। इन सीटों में 22 मुस्लिम उम्मीदवार विजयी रहे, जबकि कांग्रेस और एआईयूडीएफ के पारंपरिक गढ़ों में उनका प्रदर्शन कमजोर हुआ।
परिसीमन में मुस्लिम बहुल सीटों को आदिवासी समुदायों वाले क्षेत्रों के साथ जोड़ा गया। इससे वोट बैंक का प्रभाव कमजोर पड़ गया। विधानसभा सीटों की संख्या 126 ही रखी गई, लेकिन आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाई गई। अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें 16 से बढ़ाकर 19 और अनुसूचित जाति के लिए 8 से बढ़ाकर 9 कर दी गईं।
बरपेटा और गोलपाड़ा (पश्चिम) जैसी सीटें, जहां बंगाली भाषी मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक थी, उन्हें क्रमशः एससी और एसटी के लिए आरक्षित कर दिया गया। दोनों सीटें एनडीए ने कांग्रेस से छीन लीं। बोडोलैंड क्षेत्र में एसटी आरक्षित सीटें 11 से 15 कर दी गई। एनडीए सहयोगी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) ने इनमें से 10 सीटें जीतीं। उसका एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव हार गया।
भाजपा को सूझबूझ भरे गठबंधन का मिला लाभ
बीते चुनाव में एनडीए गठबंधन ने आदिवासी बाहुल्य बीटीएडी और बराक वैली में औसत प्रदर्शन किया था। इस बार अंत समय में यूपीपीएल की जगह बीपीएफ से समझौता किया। पार्टी ने सहयोगी बीपीएफ के साथ आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस का सफाया कर दिया। बीटीएडी में बीपीएफ को 10 सीटों पर जीत मिली। असम गण परिषद के जरिए पार्टी ने लोअर असम और बराक वैली के समीकरण को साधा। भाजपा को पहली बार कांग्रेस का गढ़ रहे बराक वैली की 13 में से 8 सीटों पर जीत हासिल हुई।
हिंदुत्व की लहर
अपर क्षेत्र में पार्टी का हिंदुत्व कार्ड की लहर इतनी तेज थी कि कांग्रेस ने जोरहाट व नजीरा जैसी अपनी परंपरागत सीट भी गंवा दी। गौरव गोगोई जोरहाट से हारे, तो नजीरा सीट से एलओपी देवब्रत सैकिया खेत रहे। इस पूरे क्षेत्र में कांग्रेस और उसकी सहयोगी रायजोर को महज 1-1 सीट ही हाथ लगी।
नारी शक्ति का मिला साथ : भाजपा नकद हस्तांतरण योजना के जरिए नारी शक्ति को तीसरी बार साधने में सफलता मिली। चुनाव से ठीक पहले हिमंत सरकार ने ओरोनदोई योजना का तीसरा संस्करण लागू करते हुए 40 लाख महिलाओं के खाते में 9-9 हजार रुपये डाले। नतीजे बताते हैं कि इस योजना को राज्य की महिलाओं ने हाथों हाथ ले कर पार्टी की झोली वोटों से भर दी।
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वर्ष 2023 में हुए परिसीमन से असम में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 35 से घट कर 22 रह गई और इसी ने भाजपा की प्रचंड जीत में अहम भूमिका निभाई। कांग्रेस और राज्य में मुस्लिम सियासत की पहचान रहे एआईयूडीएफ मुख्य रूप से इन्हीं सीटों में उलझ गए। अपर व लोअर असम में भाजपा का मियां बनाम अन्य का मुद्दा हिट रहा। इस मुद्दे के सहारे पार्टी अपर असम की 35 में से 33 सीटें जीतने में कामयाब रही। बीते दो चुनाव में भी अपर असम ही भाजपा की सत्ता की चाबी थी। लोअर असम की 22 में से 16 सीटें भी पार्टी के हाथ लगी। मियां बनाम बहुसंख्यक का दांव इतना सफल रहा कि एआईयूडीएफ की सीटें 15 से घटकर 2 रह गई। कांग्रेस सिर्फ मुस्लिम प्रभाव वाले क्षेत्रों में ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाई।
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परिसीमन बड़ा कारण
2023 में हुए परिसीमन में कई क्षेत्रों की सीमाएं बदली गईं और पुनर्गठन किया गया। कुछ ऐसे क्षेत्र, जहां पहले मुस्लिम बहुल आबादी थी, उन्हें अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। इसका सीधा असर भाजपा और सहयोगियों के पक्ष में दिखा।
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पिछले चुनावों में करीब 35 सीटों पर अल्पसंख्यक वोट बैंक कांग्रेस और एआईयूडीएफ के लिए निर्णायक भूमिका निभाता था। परिसीमन के बाद इसका प्रभाव घटकर 25 सीटों से भी कम रह गया। विपक्ष को जो 24 सीटें मिलीं, उनमें से अधिकांश वह क्षेत्र हैं, जहां परिसीमन का असर नहीं पड़ा। इन सीटों में 22 मुस्लिम उम्मीदवार विजयी रहे, जबकि कांग्रेस और एआईयूडीएफ के पारंपरिक गढ़ों में उनका प्रदर्शन कमजोर हुआ।
परिसीमन में मुस्लिम बहुल सीटों को आदिवासी समुदायों वाले क्षेत्रों के साथ जोड़ा गया। इससे वोट बैंक का प्रभाव कमजोर पड़ गया। विधानसभा सीटों की संख्या 126 ही रखी गई, लेकिन आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाई गई। अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें 16 से बढ़ाकर 19 और अनुसूचित जाति के लिए 8 से बढ़ाकर 9 कर दी गईं।
बरपेटा और गोलपाड़ा (पश्चिम) जैसी सीटें, जहां बंगाली भाषी मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक थी, उन्हें क्रमशः एससी और एसटी के लिए आरक्षित कर दिया गया। दोनों सीटें एनडीए ने कांग्रेस से छीन लीं। बोडोलैंड क्षेत्र में एसटी आरक्षित सीटें 11 से 15 कर दी गई। एनडीए सहयोगी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) ने इनमें से 10 सीटें जीतीं। उसका एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव हार गया।
भाजपा को सूझबूझ भरे गठबंधन का मिला लाभ
बीते चुनाव में एनडीए गठबंधन ने आदिवासी बाहुल्य बीटीएडी और बराक वैली में औसत प्रदर्शन किया था। इस बार अंत समय में यूपीपीएल की जगह बीपीएफ से समझौता किया। पार्टी ने सहयोगी बीपीएफ के साथ आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस का सफाया कर दिया। बीटीएडी में बीपीएफ को 10 सीटों पर जीत मिली। असम गण परिषद के जरिए पार्टी ने लोअर असम और बराक वैली के समीकरण को साधा। भाजपा को पहली बार कांग्रेस का गढ़ रहे बराक वैली की 13 में से 8 सीटों पर जीत हासिल हुई।
हिंदुत्व की लहर
अपर क्षेत्र में पार्टी का हिंदुत्व कार्ड की लहर इतनी तेज थी कि कांग्रेस ने जोरहाट व नजीरा जैसी अपनी परंपरागत सीट भी गंवा दी। गौरव गोगोई जोरहाट से हारे, तो नजीरा सीट से एलओपी देवब्रत सैकिया खेत रहे। इस पूरे क्षेत्र में कांग्रेस और उसकी सहयोगी रायजोर को महज 1-1 सीट ही हाथ लगी।
नारी शक्ति का मिला साथ : भाजपा नकद हस्तांतरण योजना के जरिए नारी शक्ति को तीसरी बार साधने में सफलता मिली। चुनाव से ठीक पहले हिमंत सरकार ने ओरोनदोई योजना का तीसरा संस्करण लागू करते हुए 40 लाख महिलाओं के खाते में 9-9 हजार रुपये डाले। नतीजे बताते हैं कि इस योजना को राज्य की महिलाओं ने हाथों हाथ ले कर पार्टी की झोली वोटों से भर दी।
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