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Asha Bhosle: 'गायकी की सदाबहार ऋतु और भावनाओं का सुरमयी सागर थीं आशा भोसले'
Mon, 13 Apr 2026 04:09 AM IST
Nitin Gautam
उस्ताद शुजात हुसैन खान, मशहूर सितार वादक
उस्ताद शुजात हुसैन खान, मशहूर सितार वादक
Published by: Nitin Gautam
Updated Mon, 13 Apr 2026 04:09 AM IST
सार
महान गायिका आशा भोसले का रविवार को निधन हो गया और देश के अलग-अलग विधा के दिग्गज लोग आशा भोसले को याद कर रहे हैं। मशहूर सितारवादक उस्ताद शुजात खान का कहना है कि आशा भोसले गायकी की सदाबहार ऋतु थीं।
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आशा भोसले
- फोटो : एक्स
विस्तार
आशा भोसले का जाना भारतीय संगीत के लिए बहुत बड़ा धक्का है। खास तौर से मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति है। बचपन में मैंने उनके साथ बहुत वक्त गुजारा। उनके और आरडी बर्मन साहब के साथ रात-रात भर की बैठकें होती थीं। हमने साथ में एलबम निकाली- 'नैना लगाई के', कई संगीत कार्यक्रमों के लिए विदेशी दौरे किए।
ब्रिटेन के रॉयल फेस्टिवल हॉल के साथ ही कई जगहों पर साथ में म्यूजिक कॉन्सर्ट किए। उन्होंने कई शैलियों में गाकर संगीत को समृद्ध किया। 'नया दौर' से 'रंगीला' तक फिल्मी संगीत का पूरा दौर बदला, पीढ़ियां बदलीं, पर उनकी आवाज हमेशा जवान बनी रही। 'तीसरी मंजिल' में उनका काम अलग तरह का था, लेकिन 'हरे रामा हरे कृष्णा' में वह 'वेस्टर्न वाइब' के तौर पर सामने आईं। बर्मन साहब ने उनकी आवाज के विस्तार को पहचाना, उसे पूरी तरह निखारा। उनकी आवाज में सजा फिल्म 'इजाजत' का 'खाली हाथ शाम आई है' सुनिए, आपको पता लगेगा कि कविता के दर्द को कितनी खामोशी से बयां किया जा सकता है।
'मेरा कुछ सामान' गद्य-नुमा कविता को उन्होंने जिस रूहानियत के साथ गाया, वह तो अद्भुत है। 'उमराव जान' की गजलें सुनें, तो लगता है, जैसे उनकी आवाज गजलों के लिए ही बनी हो। वास्तव में, वह गायकी की सदाबहार ऋतु थीं और भावनाओं का सुरमयी सागर भी। उनका स्वभाव इतना कमाल का था कि हम सबको बहुत याद आएंगी।
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ब्रिटेन के रॉयल फेस्टिवल हॉल के साथ ही कई जगहों पर साथ में म्यूजिक कॉन्सर्ट किए। उन्होंने कई शैलियों में गाकर संगीत को समृद्ध किया। 'नया दौर' से 'रंगीला' तक फिल्मी संगीत का पूरा दौर बदला, पीढ़ियां बदलीं, पर उनकी आवाज हमेशा जवान बनी रही। 'तीसरी मंजिल' में उनका काम अलग तरह का था, लेकिन 'हरे रामा हरे कृष्णा' में वह 'वेस्टर्न वाइब' के तौर पर सामने आईं। बर्मन साहब ने उनकी आवाज के विस्तार को पहचाना, उसे पूरी तरह निखारा। उनकी आवाज में सजा फिल्म 'इजाजत' का 'खाली हाथ शाम आई है' सुनिए, आपको पता लगेगा कि कविता के दर्द को कितनी खामोशी से बयां किया जा सकता है।
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'मेरा कुछ सामान' गद्य-नुमा कविता को उन्होंने जिस रूहानियत के साथ गाया, वह तो अद्भुत है। 'उमराव जान' की गजलें सुनें, तो लगता है, जैसे उनकी आवाज गजलों के लिए ही बनी हो। वास्तव में, वह गायकी की सदाबहार ऋतु थीं और भावनाओं का सुरमयी सागर भी। उनका स्वभाव इतना कमाल का था कि हम सबको बहुत याद आएंगी।
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