अरविंद पनगढ़िया का इस्तीफा: काम आया संघ का दबाव, छाप छोडने में नाकाम रहा आयोग
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नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफे के वजहों के रूप में अरविंद पनगढ़िया ने बेशक कोलंबिया विश्वविद्यालय से अवकाश की अवधी न बढ़ने को बहाना बनाया है। लेकिन उनके इस्तीफे के पीछे मुख्य वजह संघ का दबाव माना जा रहा है। नियुक्ति के समय से ही वे भगवा विचारकों के निशाने पर रहे हैं।
पनगढ़िया के नेतृत्व में आयोग के तीन साल गुजर जाने के बावजूद जब आयोग अपनी अलग छाप छोडने में नाकाम रहा है। तो सरकार को भी संघ का दबाव मानना पडा है। सूत्र बताते हैं कि संघ के दबाव के असर में सरकार के शीर्ष स्तर ने ही पनगढ़िया को इस्तीफे की राह दिखाई है। उनके इस्तीफे के साथ ही नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष के चयन को लेकर कवायद शुरू हो गई है। उम्मीद जताई जा रही है कि नीति आयोग का अगला उपाध्यक्ष बेशक कोई भगवाधारी न हो मगर वह संघ की अपेक्षाओं के अनुरूप होगा।
हालांकि पनगढ़िया के इस्तीफे पर संघ के संगठनों ने कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है। जबकि बीते एक साल से स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ सरीखे संघ के संगठनों ने नीति आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ खुला मोर्चा खोल रखा था।
पनगढ़िया के इस्तीफे प्रकरण पर अमर उजाला से बातचीत में स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक अश्वनी महाजन ने कहा कि यह सरकार और पनगढ़िया के बीच का मामला है। उन्होंने कहा कि लंबे अरसे से उनकी मांग थी कि नीति आयोग के कामकाज की समीक्षा होनी चाहिए। पीएम मोदी की नीति और अपेक्षाओं के अनुरूप नीति आयोग कार्य नहीं कर पा रहा था। महाजन का कहना है कि महज व्यक्ति के बदलने से कुछ नहीं होता है। नीति आयोग को अपने पूरी कार्यप्रणाली में सुधार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि स्वदेशी जागरण मंच हमेसा से इस बात की वकालत करता रहा है कि विदेश या विश्व बैंक में कार्य करने वालों के बजाय सरकार को ऐसे लोगों को नीति निर्धारण में शामिल करना चाहिए जोकि देश की मिट्टी में पले बडे हों और इसकी मिट्टी को पूरी तरह समझते हों। स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि देश के अनुरूप ही कृषि एवं उद्योग नीति बननी चाहिए। नीति आयोग अब तक इसमें नाकाम रहना है।
पनगढ़िया के बाद नीति आयोग के खिलाफ उठाए सवालों की समीक्षा करेगा बीएमएस
संघ के एक अन्य संगठन भारतीय मजदूर संघ ने बकायदा प्रस्ताव पारित कर नीति आयोग के क्रियाकलापों के खिलाफ हमला बोला था। अब पनगढ़िया के इस्तीफे के बाद बीएमएस अपने सवालों की दोबारा समीक्षा करेगा। पनगढ़िया के इस्तीफे पर भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय महासचिव बृजेश उपाध्याय का कहना है कि आयोग के कामकाज में सुधार आना चाहिए।
व्यक्ति कौन हो यह मायने नहीं रखता। मगर काम का तरीका ठीक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सलाह देना बेहद आसान कार्य है लेकिन उसका व्यवहारिक आंकलन करना कठीन है। बताया जा रहा है कि 11 से 13 अगस्त के बीच रांची में होने वाली अपनी कार्यसमिति की बैठक में भारतीय मजदूर संघ नीति आयोग के खिलाफ उठाए गए सवालों की समीक्षा करेगा।
क्या रही संघ की चिंता
योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग का गठन पीएम मोदी का पहला साहसिक कदम था। मगर तीन वर्ष बीत जाने के बावजूद भी नीति आयोग अपनी कोई अलग छाप छोडने में नाकाम रहा है। बल्कि उल्टा उसने कई मौकों पर केंद्र सरकार की मुश्किलें ही बढाई हैं। दवाई सस्ती करने और कॉरपोरेट फेडरलिज्म के मामले में उसकी राय सरकार के विपरित रही है। यही वजह रही कि संघ के संगठनों को खुलेआम उस नीति आयोग के खिलाफ मोर्चा खोलने को मजबूर होना पडा जिसके अध्यक्ष खुद पीएम मोदी हैं।
बताया जा रहा है कि पनगढ़िया के इस्तीफे के जरिए सरकार ने अपनी भूल सुधार की है। हालांकि सरकार के शीर्ष अधिकारियों की मानें तो पनगढ़िया ने तीन माह पहले ही पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी थी। उनके उत्तराधिकारी की तलाश भी कर ली गई है। बावजूद उसके नाम अभी बाहर नहीं खोला जा रहा है।
मगर संघ सूत्रों का कहना है कि पनगढ़िया का इस्तीफा उसके दबाव का नतीजा है। स्वदेशी और बीएमएस सरीखे उसके संगठनों के अलावा सांसद सुब्रहमण्यम स्वामी और एस गुरूमूर्ति सरीखे भगवा विचारकों ने भी पनगढ़िया की कार्यप्रणाली के खिलाफ खुला बयान दिया था। नीति आयोग पर विदेशी कंपनियों के हितों को लाभ पहुंचाने के आरोप मढे गए थे।
पीएम मोदी की स्पवनिल संस्थान है नीति आयोग
नीति आयोग को पीएम मोदी की पसंदीदा संस्थाओं में एक माना जाता है। 15 अगस्त, 2014 को लालकिले से अपने पहले संबोधन में पीएम मोदी ने योजना आयोग को समाप्त करके उसके स्थान पर नीति आयोग स्थापित करने की घोषणा की थी। नीति आयोग का पूरा नाम नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रान्सफॉर्मिंग इंडिया है। इस संस्था को बड़े थिंक टैंक के तौर पर माना जाता है। इस संस्था में 8 सदस्य होते हैं। आठ सदस्यीय थिंक टैंक में एक अध्यक्ष और सात सदस्य होते हैं। लेकिन लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रहे नीति आयोग में बदलाव के लिए सरकार को मजबूर होना पडा है।