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केजरीवाल के लिए 'I.N.D.I.A.' में रहना बना मजबूरीः अहम मोर्चों पर विपक्ष के बिना नहीं चल पाएगी आम आदमी पार्टी
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अरविंद केजरीवाल
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अमर उजाला
विस्तार
अमित शाह ने इंडिया गठबंधन को जरूरी नहीं, 'मजबूरी' बताया था। उन्होंने कहा था कि विपक्षी दल इस बिल का विरोध करने पर केवल इस कारण सहमत हुए क्योंकि यदि वे ऐसा न करते तो अरविंद केजरीवाल गठबंधन छोड़कर चले जाते। उन्होंने यह भी दावा किया था कि दिल्ली सेवा विधेयक पास होने के बाद वे गठबंधन को छोड़कर चले जाएंगे। फिलहाल, दिल्ली सेवा विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका है और केजरीवाल न केवल गठबंधन में बने हुए हैं, बल्कि कांग्रेस सहित सभी दलों को विधेयक का विरोध करने के लिए धन्यवाद भी दे रहे हैं। संकेत स्पष्ट हैं कि केजरीवाल गठबंधन में मजबूती के साथ बने रहने वाले हैं। क्या अरविंद केजरीवाल के लिए इंडिया गठबंधन में बने रहना जरूरी ही नहीं, मजबूरी भी बन गया है?दरअसल, दिल्ली सेवा विधेयक प्रकरण ने अरविंद केजरीवाल को विपक्षी दलों की एकता की आवश्यकता का अनुभव करा दिया है। यदि विपक्षी दलों का साथ न मिलता तो केंद्र सरकार इस विधेयक को बहुत आसानी से संसद से पास करा लेती। उस स्थिति में आम आदमी पार्टी के चंद सांसद इस बिल के विरोध में जो भी बात कहते, वह नक्कारखाने में तूती के समान होती। लेकिन कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के अन्य विपक्षी दलों के साथ आने के कारण भाजपा को इस बिल को पास कराने के लिए बेहतर फ्लोर मैनेजमेंट करने के लिए मजबूर होना पड़ा। उसे बीजू जनता दल और वाईएसआरसीपी से भी तालमेल करना पड़ा है।
कई मामलों में केजरीवाल को चाहिए विपक्ष का साथ
अभी अरविंद केजरीवाल की मुसीबतें कम नहीं हुई हैं। अभी भी शराब घोटाले में उनके सहयोगी मनीष सिसोदिया जेल में हैं। मामला आगे बढ़ने पर कुछ और नेताओं पर भी गाज गिर सकती है। सत्येंद्र जैन स्वास्थ्य कारणों से जमानत पाने के बाद बाहर हैं, लेकिन उनका मामला भी विभिन्न अदालतों में चल रहा है। स्वयं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भी अपने आवास में हुए खर्च को लेकर शिकंजा कस सकता है। एंटी करप्शन ब्यूरो के एक अधिकारी के कार्यालय से कुछ फाइलों को गायब करने के मामले में सौरभ भारद्वाज पर भी गाज गिर सकती है।
इन मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाने और केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए भी अरविंद केजरीवाल को विपक्षी दलो की जरूरत है। यदि वे इंडिया गठबंधन में नहीं रहेंगे तो उनकी आवाज को मजबूती से उठाने वाला कोई नहीं होगा। दिल्ली सेवा विधेयक पर चर्चा के दौरान ही उमर अब्दुल्ला जैसे नेताओं ने साफ कह दिया था कि जब केजरीवाल ने अनुच्छेद 370 के मामले पर उनका साथ नहीं दिया तो वे उनका साथ क्यों दें? एक बार तो किसी तरह बात बन गई है, लेकिन यदि केजरीवाल गठबंधन से अलग होने की राह चुनेंगे तो भविष्य में उन्हें अपने लिए सहयोगी दल तलाशना मुश्किल पड़ जाएगा। यही कारण है कि राजनीतिक विश्वेषक मान रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल के लिए इंडिया गठबंधन में मजबूती से बने रहना जरूरी ही नहीं, मजबूरी भी बन गया है।
चुनाव जीतने के लिए भी साथ जरूरी
दरअसल, मामला केवल अदालती प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम भी बता रहे हैं कि यदि आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है तो उन्हें विपक्षी दलों का साथ लेना पड़ेगा। दिल्ली में दो बार प्रचंड बहुमत की सरकार बनाने के बाद भी केजरीवाल मोदी का किला नहीं भेद सके। दोनों ही बार उनकी पार्टी का दिल्ली में कोई खाता नहीं खुला। यानी एकला चलो की नीति कामयाब नहीं साबित हुई।
केजरीवाल के लिए सबसे बड़ा झटका यह था कि दिल्ली में लगातार तीन बार शून्य सीट पर सिमट रही कांग्रेस लोकसभा चुनाव में सभी सातों सीटों पर दूसरे नंबर पर रही, जबकि आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। यानी दिल्ली का मतदाता अभी भी राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहा है।
कुछ इसी तरह की हालत पंजाब में भी रही थी, जहां 2014 में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद भी 2019 में वह केवल एक सीट पर सिमट गई और कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी की। ऐसे में यदि उन्हें लोकसभा में भी अपनी मजबूत उपस्थिति बनानी है तो उन्हें विपक्षी दलों का सहारा लेना पड़ेगा। यानी इंडिया गठबंधन अरविंद केजरीवाल के लिए जरूरत के साथ-साथ मजबूरी भी बनता दिख रहा है।
मजबूरी नहीं, जरूरतः आप
आम आदमी पार्टी नेता प्रियंका कक्कड़ ने अमर उजाला से कहा कि इंडिया गठबंधन इसमें शामिल दलों की मजबूरी नहीं, बल्कि समय की आवश्यकता है। आज समय की आवश्यकता है कि सभी विपक्षी दल एक-साथ एक मोर्चे पर खड़े होकर केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करें। उन्होंने कहा कि पहले दिन से जब से सभी विपक्षी दलों ने एक छतरी के नीचे आकर लड़ने का निर्णय किया है, भाजपा की नींद हराम हो गई है।
उन्होंने कहा कि, तभी से भाजपा नेता लगातार गलत समाचार फैलाकर गठबंधन को कमजोर करना चाहते हैं। कभी नीतीश कुमार के नाम पर तो कभी अरविंद केजरीवाल के नाम पर ऐसी अफवाहें फैलाकर गठबंधन को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इंडिया पूरी तरह मजबूती के साथ खड़ा है और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ेगा।
गठबंधन की नौटंकी क्यों, AAP-कांग्रेस विलय कर लें- भाजपा
दिल्ली भाजपा के मीडिया इंचार्ज प्रवीण शंकर कपूर ने अमर उजाला से कहा कि आम आदमी पार्टी के गठन के पहले दिन से ही वे यह कहते आ रहे हैं कि ये पार्टी कांग्रेस की बी टीम है। दोनों ही पार्टियों के नेता ये कहने लगे हैं कि अब वे दिल्ली-पंजाब सहित विभिन्न राज्यों में मिलकर चुनाव लड़ेंगे। उन्हें गठबंधन की 'नौटंकी' नहीं करनी चाहिए, बल्कि दोनों पार्टियों को आपस में विलय कर लेना चाहिए। इससे हर तरह का संदेह दूर हो जाएगा।
प्रवीण शंकर कपूर ने अमर उजाला से कहा कि जनता की दृष्टि में दोनों दलों में कोई भेद नहीं है। कांग्रेस पहले ही भ्रष्टाचार में डूबी हुई पार्टी थी, उसका विरोध करने के नाम पर बनी आम आदमी पार्टी ने नए-नए तरीकों से भ्रष्टाचार कर नया 'कीर्तिमान' बना दिया है। उन्होंने कहा कि जनता इन सभी दलों के साथ आने की सच्चाई समझ रही है और 2024 के चुनाव में उन्हें भी इसका पता चल जाएगा। भाजपा नेता ने दावा किया कि वे पहले से ज्यादा अंतर के साथ दिल्ली की सभी सातों सीटों पर जीत दर्ज करेंगे।