कानों देखीः जेटली की स्थिति राम जैसी, पीयूष गोयल से मांग रहे खड़ाऊं
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रामचंद्र जी यानी अपने वित्त मंत्री अरुण जेटली जी घर पर हैं। वह अयोध्या आकर राजगद्दी संभालना चाहते हैं, वह भरत यानी पीयूष गोयल से अपनी खड़ाऊं भी मांग रहे हैं, लेकिन संयोग नहीं बन पा रहा है। वित्त मंत्री इन वेटिंग अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने को बेताब हैं, लेकिन सरकार चाहती है कि अभी उन्होंने अपनी किडनी ट्रांसप्लांट करवाई है, ऐसे में संक्रमण का खतरा बना रहता है, इसलिए चिकित्सकों की सलाह का पूर्ण पालन करते हुए अभी उन्हें आराम करना चाहिए। वहीं उनके अनुज भ्राता भरत (पीयूष) बेचारे भी क्या करें। बड़े भइया की मौजूदगी में कंधे पर आए पहाड़ से बोझ को खुशी-खुशी निबटा रहे हैं। भरत को भी लग रहा है कि चलो जब तक ही सही खड़ाऊं सिंहासन पर तो है। तब तक राजकाज की क्षमता दिखा दी जाए। आगे जाने कब फिर ऐसा अवसर हाथ लगे। अयोध्या प्रशासन और भरत जी के इस रुख से आस पास के मंत्री जन, दरबारियों और राज्य की जनता में एक अजीब सी प्रसन्नता का वातावरण छाया हुआ है। अब ऐसे में कोई भी राम जी की मन: स्थिति का अंदाजा तो लगा ही सकता है।
नीतीश की मुट्ठी में क्या है?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश दिल्ली आए, लौटते समय अपना पावर दिखा गए। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पटना जाकर उनका नमक भी खा आए। लौटते समय ऐसा मंत्र दे आए हैं कि नीतीश कुमार उसकी महिमा में घूम रहे हैं। उनकी हालत भी अजीब हो गई है। जब मोदी जी सत्ता में आए नीतीश कुमार छत्तीस का आंकड़ा लेकर बैठे थे। मुख्यमंत्री पद पर लौटे तो कांग्रेस और राजद के कंधे के सहारे। जब तक साथ रहे, केंद्र सरकार से सहायता के नाम पर फूटी कौड़ी भी दस बार गिनकर मिली। बाद में कंधा बदल लिए तो मौसम थोड़ा बदल सा गया, लेकिन इस दरम्यान विकास पुरुष की इमेज भी हवा हो गई है। लालू प्रसाद यादव ने पलटू राम का ताना भी कस दिया है। भाजपा भी सीटों के बंटवारे में कुर्सी की बजाय स्टूल पर बिठा रही है। अब नीतीश कुमार करें भी तो क्या। उनकी पार्टी के एक रणनीतिकार का कहना है कि हमारे नेता पाकिस्तान के सैन्य कमांडर जनरल नियाजी (बांग्लादेश की आजादी) से भी बड़ा सरेंडर कर दिया है। वहीं भाजपा के नेता मजे ले रहे हैं। पार्टी के महासचिव तो बुझैव्वल पर उतर आए हैं। वह साफ कहते हैं कि बताओ जरा अब नीतीश कुमार की मुट्ठी......में क्या......है?
ये सरकार बदलनी है
ये राज बदलना है, ये सरकार बदलनी है। यह हम नहीं कांग्रेस के रणनीतिकार कर रहे हैं। मोदी सरकार को बदलने के लिए उनके पास इससे अच्छी लाइन नहीं है। अपनी योजना को अंजाम तक पहुंचाने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम से बड़ा उनके पास हथियार नहीं है। सहयोगी दलों की संख्या बढ़ाने के लिए चार साल के मोदी सरकार और भाजपा के कामकाज के जरिए क्षेत्रीय दलों की नस काटने का संदर्भ बताने से बड़ा कोई उदाहरण नहीं है। बताते हैं ये तीनों मंत्र यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को खूब भा रहे हैं। कांग्रेस इस पर भी काफी खुश है कि क्षेत्रीय दल इसे बखूबी समझ भी रहे हैं। यही समझ कर आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस से दिल्ली में तालमेल की इच्छुक दिखाई दे रही है। ममता सॉफ्ट हैं, कुमारस्वामी भरोसा जता रहे हैं, शरद पवार वकालत कर रहे हैं। यह खुशी तब और बढ़ जा रही है, जब भाजपा द्वारा लॉलीपॉप के ऑफर पर भी राजनीतिक दलों को विश्वास नहीं हो रहा है। कांग्रेस पार्टी को इसी से बड़ी उम्मीद है। इसी आधार पर उसे उत्तर प्रदेश में भी समाजवादीपार्टी, बहुजन समाज पार्टी के साथ समझौता होने का भरोसा है। बताते हैं मध्यप्रदेश में सपा साथ आ गई है, बसपा भी पत्ते खोलने वाली है। इसी को कहते हैं कि आज करो और कल भरो की उम्मीद पर दुनिया कायम है।
अमित शाह के एक तीर से दो निशाने
राजनीतिक गलियारे में लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ज्यादा शार्प अमित शाह को मानने लगे हैं। कहते हैं अमित भाई का एक तीर कई निशाने पर फिट बैठता है। उन्हें निशाना लगाने की जल्दी या उतावलापन भी नहीं रहता। समय को भांपकर भर धीरे से तीर छोड़ देते हैं। बाकी तो जहां निशाना लगाया है, उसके भाग्य का मामला है। सरकार के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव के मामले में भी ऐसा ही रहा। कांग्रेस का नोटिस धरा का धरा रह गया। साफ्ट कार्नर वाली टीडीपी का नोटिस मंजूर हो गया। 48 सांसदों वाली कांग्रेस को 11 सांसदों वाली टीडीपी ने पछाड़ दिया। यह वही टीडीपी है जो सत्ता पक्ष के इशारे पर आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्ज दिलाने के लिए गुजरात चुनाव तक सदन में हंगामा करके कांग्रेस की रणनीति की हवा निकाल रही थी और अब सत्ता पक्ष से समर्थन वापस लेकर विपक्षी दलों का साथ चाह रही है। बात यहीं खत्म नहीं हुई। विपक्ष दस दिन के भीतर अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा चाहता था और अमित भाई के इशारे ने इसे ठीक दो दिन बाद तय करा दिया। 18 जुलाई को प्रस्ताव मंजूर हुआ, 20 जुलाई को चर्चा हो गई। बात यहीं खत्म नहीं हुई। जहां भी अमित भाई ने फोन घुमाया, सहयोग लेकर लौटे। खुशी का ठिकाना तब न रहा जब जनता दल (बीजू) ने चर्चा के बाद मत विभाजन में भाग न लेने की रणनीति बना ली।
एएनआई : अमर सिंह न्यूज इंटरनेशनल
एएनआई एक न्यूज एजेंसी है। देश के समाचार चैनलों को न्यूज और विजुअल्स उपलब्ध कराती है। इसका पूरा नाम अमर सिंह न्यूज इंटरनेशनल है। यही नाम बताकर समाजवादी से अलग हुए राज्यसभा सदस्य अमर सिंह ने फिल्म अभिनेता नवाजुद्दीन को भी हड़काया था। खुद अमर सिंह का कहना है कि उन्होंने नवाजुद्दीन को सावधान कर दिया है। साफ कह दिया है कि उन्हें एएनआई के विरुद्ध कुछ नहीं सुनना। बताते हैं अमर सिंह के इतना कहने के बाद नवाजुद्दीन ठंडे पड़ गए हैं। इन दिनों अमर सिंह न्यूज एजेंसी का यह नाम बड़े चाव से बताते हैं। खैर हो कुछ भी अमर सिंह को मीडिया में बने रहना आता है। इतना ही नहीं उनके बारे में कोई कुछ भी कहे लेकिन वह जो बोलना चाहते हैं, उसे सार्वजनिक तौर पर बोल भी लेते हैं। कहते भी हैं कि उन्हें तो पत्थर भी वही मार सकता है जिसके मकान शीशे के न हों।
सर, योगी जी सुनते ही नहीं
संघ से भाजपा का कैडर तक परेशान है। भाजपा के जिलाध्यक्ष तक की यूपी में योगी मंत्रिमंडल के मंत्री नहीं सुन रहे हैं। शिकायत ऊपर तक पहुंच रही है। शिकायत के दो भाग हैं। पहला तो यह कि योगी सरकार ठकुरई पर उतर आई है। जेल में मुन्ना बजरंगी की हत्या के बाद यह वकालत और तेज हो गई है। इसका डर दिखाया जा रहा है कि प्रदेश के बाभन (भाजपा) से नाराज हैं, साथ छोड़ सकते हैं। दूसरा, बाहरियों की फौज कर रही है मौज। जो नेता स्वामी प्रसाद मौर्य, बृजेश पाठक की तरह से बाहर से आएं हैं, उनकी और उनके सेना की पूरी मौज है। लेकिन जिन भाजपाइयों, संघाई बंधुओं ने जान लड़ाकर राज्य में सरकार बनवाई, लोकसभा चुनाव 2014 में बिछ गए, वे मारे-मारे फिर रहे हैं। इतना ही नहीं जिन कल के लड़कों को पार्टी ने सोशल मीडिया, चुनाव प्रचार आदि के लिए हायर किया है, उनकी भी मौज है। जबकि न वे शाखा जाते हैं और न ही पार्टी का झंडा उठाते हैं। और तो और योगी जी भी इस तरह की शिकायतों पर कान नहीं देते। बताते हैं पार्टी की इन शिकायतों ने भाजपा आलाकमान को भी परेशान कर दिया है। वहीं योगी सरकार एक्शन में है।
कांग्रेसियों को आने लगा है कुर्ता सिलवाने का सपना
राजनीति मे गुरु ऐसा सोचने लगे तो चेले का सुंदर भविष्य बन सकता है। एनसीपी के शरद पवार अब इसी लाइन पर आगे बढ़ रहे हैं। राहुल गांधी, शरद पवार के पास राजनीतिक चर्चा के लिए अक्सर जाते रहते हैं। पवार की सलाह पर राहुल अमल भी कर रहे हैं। पवार राजनीति के मंझे हुए सरदार हैं। हर राजनीतिक दल में उनकी पैठ हैं। प्रधानमंत्री मोदी से भी करीबी है। राहुल की खुशी तब और बढ़ गई जब डीएमके के स्टालिन भी अब साथ देने लगे हैं। ममता बनर्जी भी तालमेल का सुर फिर मिलाने लगी हैं। राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव का भरोसा बढ़ने लगा है। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव सॉफ्ट हो रहे हैं। इतना ही नहीं राजनीति की धुरी बनने की तरफ बढ़ रही मायावती भी कांग्रेस के साथ तालमेल की संभावना को लगातार ऑक्सीजन दे रही हैं। खबर है कि इस आखिरी लाइन से भाजपाई भी खासे परेशान हैं। उनको भी लगने लगा है कि यदि ऐसा हो गया तो कांग्रेस अध्यक्ष की राह रोकना मुश्किल है। वहीं कांग्रेसी नेता नए कुर्ते सिलवाने के सपने देखने लगे हैं।