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Aditya-L1: सूर्य के वर्तमान के साथ ही अतीत और भविष्य के अध्ययन का वाहक बनेगा सूर्य मिशन; ये राज भी खुलेंगे
Thu, 31 Aug 2023 04:57 PM IST
शिव शरण शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Thu, 31 Aug 2023 04:57 PM IST
सार
वैज्ञानिकों का मामना है कि भारत के पहले सौर मिशन आदित्य-एल1 द्वारा एकत्र किए गए डेटा का विश्लेषण करने के बाद उन्हें सूर्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में नई जानकारी मिलेगी।
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आदित्य एल1
- फोटो : AMAR UJALA
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विस्तार
भारत ने हाल ही में चांद के साउथ पोल पर चंद्रयान-3 की सफल सॉफ्ट लैंडिंग कराई है। इसके बाद अब इसरो सूर्य मिशन के लिए भी तैयार है। कल से शुरू हो रहे सितंबर माह की दो तारीख को श्रीहरिकोटा से आदित्य-एल 1 लॉन्च किया जाएगा। इस मिशन का उद्देश्य सूर्य का अध्ययन करना है। वैज्ञानिकों का मामना है कि भारत के पहले सौर मिशन आदित्य-एल1 द्वारा एकत्र किए गए डेटा का विश्लेषण करने के बाद उन्हें सूर्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में नई जानकारी मिलेगी।
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आदित्य एल1 मिशन (सांकेतिक)
- फोटो : सोशल मीडिया
आने वाले दशकों में पृथ्वी पर संभावित जलवायु परिवर्तन को समझने में मदद मिलेगी
सौर विज्ञानियों का कहना है कि आने वाले दशकों में पृथ्वी पर संभावित जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए यह डेटा बेहद महत्वपूर्ण होगा। इस मिशन के बारे में सौर भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर दीपांकर बनर्जी ने अहम जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मिशन को लैग्रेंजियन बिंदु 1 (एल1) पर भेजा जाना है। पृथ्वी से इस बिंदु की दूरी लगभग 1.5 मिलियन किमी है। वहां से डेटा को इकट्ठा करके यह अंतरिक्ष में स्थित किसी प्लेटफॉर्म (प्वाइंट) से वैज्ञानिकों के पास आएगा। ये वैज्ञानिक उस टीम का हिस्सा हैं, जिन्होंने आज से 10 साल पहले इस मिशन की परिकल्पना की थी।
सूर्य की उर्जा में कमी पर भी होगा अध्ययन
प्रोफेसर दीपांकर बनर्जी ने कहा कि पृथ्वी पर हमारा अस्तित्व या जीवन मूल रूप से सूर्य की उपस्थिति के कारण है जो हमारा निकटतम तारा है। पृथ्वी पर सारी ऊर्जा सूर्य से ही आती है। ऐसे में यह समझना महत्वपूर्ण है कि भविष्य में भी क्या यह वही विकिरण उत्सर्जित करेगा (जैसा कि यह अभी करता है) या इसमें बदलाव हो सकता है। उन्होंने आगे कहा कि अगर भविष्य में सूर्य उतनी मात्रा में ऊर्जा नहीं उत्सर्जित करेगा तो इसका हमारी जलवायु पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आदित्य एल1 से प्राप्त डेटा से हमे यह समझने में आसानी होगी। बता दें कि प्रोफेसर दीपांकर बनर्जी नैनीताल में स्थित आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एआरआईईएस) के निदेशक हैं। यह केंद्र सरकार के अधीन एक स्वायत्त निकाय है।
सौर विज्ञानियों का कहना है कि आने वाले दशकों में पृथ्वी पर संभावित जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए यह डेटा बेहद महत्वपूर्ण होगा। इस मिशन के बारे में सौर भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर दीपांकर बनर्जी ने अहम जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मिशन को लैग्रेंजियन बिंदु 1 (एल1) पर भेजा जाना है। पृथ्वी से इस बिंदु की दूरी लगभग 1.5 मिलियन किमी है। वहां से डेटा को इकट्ठा करके यह अंतरिक्ष में स्थित किसी प्लेटफॉर्म (प्वाइंट) से वैज्ञानिकों के पास आएगा। ये वैज्ञानिक उस टीम का हिस्सा हैं, जिन्होंने आज से 10 साल पहले इस मिशन की परिकल्पना की थी।
सूर्य की उर्जा में कमी पर भी होगा अध्ययन
प्रोफेसर दीपांकर बनर्जी ने कहा कि पृथ्वी पर हमारा अस्तित्व या जीवन मूल रूप से सूर्य की उपस्थिति के कारण है जो हमारा निकटतम तारा है। पृथ्वी पर सारी ऊर्जा सूर्य से ही आती है। ऐसे में यह समझना महत्वपूर्ण है कि भविष्य में भी क्या यह वही विकिरण उत्सर्जित करेगा (जैसा कि यह अभी करता है) या इसमें बदलाव हो सकता है। उन्होंने आगे कहा कि अगर भविष्य में सूर्य उतनी मात्रा में ऊर्जा नहीं उत्सर्जित करेगा तो इसका हमारी जलवायु पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आदित्य एल1 से प्राप्त डेटा से हमे यह समझने में आसानी होगी। बता दें कि प्रोफेसर दीपांकर बनर्जी नैनीताल में स्थित आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एआरआईईएस) के निदेशक हैं। यह केंद्र सरकार के अधीन एक स्वायत्त निकाय है।
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सूर्य
- फोटो : iStock
सूर्य के इतिहास को जानने की कवायद
उन्होंने कहा कि अगर लैग्रैन्जियन बिंदु से सूर्य की लंबी अवधि तक निगरानी की जा सकती है, तो इससे सूर्य के इतिहास को भी समझा जा सकता है, जो कि अब तक मानव जाति के लिए अज्ञात है।
प्रोफेसर बनर्जी ने बताया कि ऐसा देखा गया है कि हर 11 साल में सूर्य की चुंबकीय गतिविधि में बदलाव होता है, जिसे सौर चक्र के नाम से जाना जाता है। सौर वायुमंडल के चुंबकीय क्षेत्र में भी कभी-कभी भीषण परिवर्तन भी होते हैं जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा का भारी विस्फोट होता है जिसे सौर तूफान कहा जाता है।
बता दें कि सूर्य का बाहरी भाग (कोरोना) मजबूत चुंबकीय क्षेत्र वाला है। यह गर्म प्लाज्मा को सीमित करता है। निश्चित समय पर यह गैस और चुंबकीय क्षेत्र के अंतरग्रहीय माध्यम बुलबुले में छोड़ता है जिसे कोरोनल मास इजेक्शन कहा जाता है। ऐसे में कोरोनल मास इजेक्शन अंतरग्रहीय माध्यम में यात्रा करते हैं, तो वे सभी दिशाओं में जा सकते हैं। कोरोनल मास इजेक्शन के प्रभाव से उपग्रह सीधे प्रभावित होते हैं। चंद्रमा सहित अन्य ग्रह पिंड भी सौर तूफानों से प्रभावित होते हैं।
ऐसे में अंतरिक्ष में हमारी संपत्ति की रक्षा के लिए अंतरिक्ष में खगोलीय भविष्यवाणी की आवश्यकता है। आदित्य-एल1 के डेटा की मदद से इन भविष्यवाणियों में सुधार किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इसरो का अंतरिक्ष यान वैज्ञानिकों को पृथ्वी की जलवायु के छिपे इतिहास का पता लगाने में भी मदद कर सकता है क्योंकि सौर गतिविधियों का ग्रह के वायुमंडल पर प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि पूर्व में पृथ्वी पर कई हिमयुग हुए हैं। लोग अभी भी पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं कि ये हिमयुग कैसे बने और क्या सूर्य इनके लिए जिम्मेदार था। ऐसे में आदित्य-एल1 पहली बार किसी अंतरिक्ष प्वाइंट से कोरोना (सूर्य का बाहरी भाग) में चुंबकीय क्षेत्र का अनुमान लगाने की भी कोशिश करेगा। इसके अलावा, सूर्य से निकट पराबैंगनी प्रवाह, सौर हवा के कुछ गुणों (सूर्य के बाहरी वातावरण का विस्तार जो कणों का उत्सर्जन करता है) और कुछ अन्य मुद्दों की निरंतर निगरानी पहली बार की जाएगी।
उन्होंने बताया कि सूर्य की गतिविधियों को समझने के लिए लैग्रेंज 1 बिंदु के सुविधाजनक बिंदु से आदित्य-एल1 के पेलोड के साथ-साथ ग्राउंड-आधारित दूरबीनों का भी उपयोग किया जाएगा। बनर्जी ने कहा कि एक बार जब वैज्ञानिक पेलोड (आदित्य-एल1 के अंदर) परिचालन शुरू कर देंगे, तो हम सत्यापन चरण समाप्त होने के बाद डेटा की तलाश करेंगे। एक दूसरी टीम वैज्ञानिक डेटा विश्लेषण में शामिल होगी।
उन्होंने कहा कि अगर लैग्रैन्जियन बिंदु से सूर्य की लंबी अवधि तक निगरानी की जा सकती है, तो इससे सूर्य के इतिहास को भी समझा जा सकता है, जो कि अब तक मानव जाति के लिए अज्ञात है।
प्रोफेसर बनर्जी ने बताया कि ऐसा देखा गया है कि हर 11 साल में सूर्य की चुंबकीय गतिविधि में बदलाव होता है, जिसे सौर चक्र के नाम से जाना जाता है। सौर वायुमंडल के चुंबकीय क्षेत्र में भी कभी-कभी भीषण परिवर्तन भी होते हैं जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा का भारी विस्फोट होता है जिसे सौर तूफान कहा जाता है।
बता दें कि सूर्य का बाहरी भाग (कोरोना) मजबूत चुंबकीय क्षेत्र वाला है। यह गर्म प्लाज्मा को सीमित करता है। निश्चित समय पर यह गैस और चुंबकीय क्षेत्र के अंतरग्रहीय माध्यम बुलबुले में छोड़ता है जिसे कोरोनल मास इजेक्शन कहा जाता है। ऐसे में कोरोनल मास इजेक्शन अंतरग्रहीय माध्यम में यात्रा करते हैं, तो वे सभी दिशाओं में जा सकते हैं। कोरोनल मास इजेक्शन के प्रभाव से उपग्रह सीधे प्रभावित होते हैं। चंद्रमा सहित अन्य ग्रह पिंड भी सौर तूफानों से प्रभावित होते हैं।
ऐसे में अंतरिक्ष में हमारी संपत्ति की रक्षा के लिए अंतरिक्ष में खगोलीय भविष्यवाणी की आवश्यकता है। आदित्य-एल1 के डेटा की मदद से इन भविष्यवाणियों में सुधार किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इसरो का अंतरिक्ष यान वैज्ञानिकों को पृथ्वी की जलवायु के छिपे इतिहास का पता लगाने में भी मदद कर सकता है क्योंकि सौर गतिविधियों का ग्रह के वायुमंडल पर प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि पूर्व में पृथ्वी पर कई हिमयुग हुए हैं। लोग अभी भी पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं कि ये हिमयुग कैसे बने और क्या सूर्य इनके लिए जिम्मेदार था। ऐसे में आदित्य-एल1 पहली बार किसी अंतरिक्ष प्वाइंट से कोरोना (सूर्य का बाहरी भाग) में चुंबकीय क्षेत्र का अनुमान लगाने की भी कोशिश करेगा। इसके अलावा, सूर्य से निकट पराबैंगनी प्रवाह, सौर हवा के कुछ गुणों (सूर्य के बाहरी वातावरण का विस्तार जो कणों का उत्सर्जन करता है) और कुछ अन्य मुद्दों की निरंतर निगरानी पहली बार की जाएगी।
उन्होंने बताया कि सूर्य की गतिविधियों को समझने के लिए लैग्रेंज 1 बिंदु के सुविधाजनक बिंदु से आदित्य-एल1 के पेलोड के साथ-साथ ग्राउंड-आधारित दूरबीनों का भी उपयोग किया जाएगा। बनर्जी ने कहा कि एक बार जब वैज्ञानिक पेलोड (आदित्य-एल1 के अंदर) परिचालन शुरू कर देंगे, तो हम सत्यापन चरण समाप्त होने के बाद डेटा की तलाश करेंगे। एक दूसरी टीम वैज्ञानिक डेटा विश्लेषण में शामिल होगी।
आदित्य एल-1
- फोटो : SOCIAL MEDIA
जिस लैग्रेंजियन बिंदु पर मिशन भेजा जाना है, वह क्या है?
लैग्रेंजियन बिंदु अंतरिक्ष में वह स्थान होते हैं जहां दो वस्तुओं के बीच कार्य करने वाले सभी गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को निष्प्रभावी कर देते हैं। लैग्रेंजियन बिंदु में एक छोटी वस्तु दो बड़े पिंडों (सूर्य और पृथ्वी) के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के तहत संतुलन में रह सकती है। इस वजह से एल1 बिंदु का उपयोग अंतरिक्ष यान के उड़ने के लिए किया जा सकता है।
अंतरिक्ष में पांच लैग्रेंजियन बिंदु हैं जिन्हें L1, L2, L3, L4 और L5 के रूप में परिभाषित किया गया है। L1, L2 और L3 बिंदु सूर्य और पृथ्वी के केंद्रों को जोड़ने वाली रेखा पर स्थित हैं। वहीं L4 और L5 बिंदु दोनों बड़े पिंडों के केंद्रों के साथ दो समबाहु त्रिभुजों के शीर्ष बनाते हैं।
L1 बिंदु दो बड़े पिंडों के बीच स्थित है, जहां दोनों पिंडों का गुरुत्वाकर्षण बल बराबर और विपरीत है। यही वह बिंदु होगा जहां आदित्य एल1 मिशन को रखा जाएगा। L2 बिंदु छोटे पिंड से परे स्थित है, जहां छोटे पिंड का गुरुत्वाकर्षण बल बड़े पिंड के कुछ बल को निष्प्रभावी कर देता है। L3 बिंदु छोटे पिंड के विपरीत, बड़े पिंड के पीछे स्थित होता है। वहीं, L4 और L5 बिंदु बड़े पिंड के चारों ओर उसकी कक्षा में छोटे पिंड से 60 डिग्री आगे और पीछे स्थित होते हैं।
लैग्रेंजियन बिंदु अंतरिक्ष में वह स्थान होते हैं जहां दो वस्तुओं के बीच कार्य करने वाले सभी गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को निष्प्रभावी कर देते हैं। लैग्रेंजियन बिंदु में एक छोटी वस्तु दो बड़े पिंडों (सूर्य और पृथ्वी) के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के तहत संतुलन में रह सकती है। इस वजह से एल1 बिंदु का उपयोग अंतरिक्ष यान के उड़ने के लिए किया जा सकता है।
अंतरिक्ष में पांच लैग्रेंजियन बिंदु हैं जिन्हें L1, L2, L3, L4 और L5 के रूप में परिभाषित किया गया है। L1, L2 और L3 बिंदु सूर्य और पृथ्वी के केंद्रों को जोड़ने वाली रेखा पर स्थित हैं। वहीं L4 और L5 बिंदु दोनों बड़े पिंडों के केंद्रों के साथ दो समबाहु त्रिभुजों के शीर्ष बनाते हैं।
L1 बिंदु दो बड़े पिंडों के बीच स्थित है, जहां दोनों पिंडों का गुरुत्वाकर्षण बल बराबर और विपरीत है। यही वह बिंदु होगा जहां आदित्य एल1 मिशन को रखा जाएगा। L2 बिंदु छोटे पिंड से परे स्थित है, जहां छोटे पिंड का गुरुत्वाकर्षण बल बड़े पिंड के कुछ बल को निष्प्रभावी कर देता है। L3 बिंदु छोटे पिंड के विपरीत, बड़े पिंड के पीछे स्थित होता है। वहीं, L4 और L5 बिंदु बड़े पिंड के चारों ओर उसकी कक्षा में छोटे पिंड से 60 डिग्री आगे और पीछे स्थित होते हैं।
अंतरिक्ष से सूर्य का अध्ययन क्यों?
सूर्य कई ऊर्जावान कणों और चुंबकीय क्षेत्र के साथ लगभग सभी तरंग दैर्ध्य में विकिरण या प्रकाश छोड़ता है। हमारी पृथ्वी का वायुमंडल और उसका चुंबकीय क्षेत्र एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है। पृथ्वी ही कणों और क्षेत्रों सहित कई हानिकारक तरंग दैर्ध्य विकिरणों को रोकती है।
चूंकि कई विकिरण पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुंच पाते हैं इसलिए पृथ्वी के उपकरण ऐसे विकिरण का पता नहीं लगा पाएंगे। इसी वजह से इन विकिरणों पर आधारित सौर अध्ययन भी नहीं किए जा सकते। हालांकि ऐसे अध्ययन पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर यानी अंतरिक्ष से अवलोकन करके किए जा सकते हैं। इसी प्रकार एक सवाल उठता है कि सूर्य से निकलने वाले वायु के कण और चुंबकीय क्षेत्र ग्रहों के बीच अंतरिक्ष से कैसे यात्रा करते हैं? इसे समझने के लिए एक ऐसे बिंदु से अध्ययन किया जाना चाहिए जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव से बहुत दूर है।
सूर्य कई ऊर्जावान कणों और चुंबकीय क्षेत्र के साथ लगभग सभी तरंग दैर्ध्य में विकिरण या प्रकाश छोड़ता है। हमारी पृथ्वी का वायुमंडल और उसका चुंबकीय क्षेत्र एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है। पृथ्वी ही कणों और क्षेत्रों सहित कई हानिकारक तरंग दैर्ध्य विकिरणों को रोकती है।
चूंकि कई विकिरण पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुंच पाते हैं इसलिए पृथ्वी के उपकरण ऐसे विकिरण का पता नहीं लगा पाएंगे। इसी वजह से इन विकिरणों पर आधारित सौर अध्ययन भी नहीं किए जा सकते। हालांकि ऐसे अध्ययन पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर यानी अंतरिक्ष से अवलोकन करके किए जा सकते हैं। इसी प्रकार एक सवाल उठता है कि सूर्य से निकलने वाले वायु के कण और चुंबकीय क्षेत्र ग्रहों के बीच अंतरिक्ष से कैसे यात्रा करते हैं? इसे समझने के लिए एक ऐसे बिंदु से अध्ययन किया जाना चाहिए जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव से बहुत दूर है।