साइबर ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ अब सीधे होगी सुप्रीम कोर्ट में अपील, होगा संशोधन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आने वाले समय में साइबर धोखाधड़ी और अपराध के मुकदमों का निपटारा तेजी से हो सकेगा। इसके लिए केंद्र सरकार साइबर अपीलेट ट्रिब्यूनल को टीडीसैट में शामिल करने जा रही है। ट्रिब्यूनल को टीडीसैट में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार संसद के आगामी शीत सत्र में सूचना-प्रौद्योगिकी एक्ट में संशोधन करने जा रही है।
सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि सरकार इस एक्ट में अपीलीय नियमों में बदलाव करेगी। इसमें ट्रिब्यूनल प्रक्रिया को गति देने से जुड़े संशोधन में शामिल होंगे। इसके बाद ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में नहीं बल्कि सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील हो सकेगी। टीडीसैट भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण अधिनियम के तहत आता है।
इसलिए लिया गया फैसला
सूचना-प्रौद्योगिकी एक्ट-2000 की धारा 48 (1) के तहत 2004 में गठित ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ वर्तमान में हाईकोर्ट में अपील की जाती है। इस कारण किसी मामले में अंतिम निर्णय आने में कई साल लग जाते हैं। लेकिन, सूचना-प्रौद्योगिकी कानून में संशोधन के बाद वादी या प्रतिवादी ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर सकेंगे। इसमें अंतिम निर्णय आने में कम समय लगेगा और मामलों का तेजी से निपटारा होगा।
मामलों के निस्तारण में आ रहीं अड़चनें
सरकार ने ट्रिब्यूनल को टीडीसैट में शामिल करने का निर्णय विभिन्न ढांचागत और नियुक्ति व्यवस्था के मद्देनजर लिया था। इसे टीडीसैट में औपचारिक रूप से पूरी तरह शामिल भी किया जा चुका है। लेकिन, अब तक नियमों में बदलाव नहीं होने से साइबर अपराध के मामलों को जल्द निपटाने में अड़चनें आ रही हैं। इसी के मद्देनजर सरकार ने सूचना-प्रौद्योगिकी कानून में संशोधन करने के लिए शीत सत्र में विधेयक पेश करने का निर्णय लिया है।
साढ़े सात साल से जज का पद खाली
दरअसल, 2004 में गठन के बाद ट्रिब्यूनल क्रियाशील नहीं हो सका। उसमें कई पद वर्षों से खाली पड़े हैं। खर्च का भार भी अधिक है। इसलिए सरकार ने उसे टीडीसैट में शामिल करने का निर्णय लिया। ट्रिब्यूनल में 30 जून, 2011 के बाद किसी जज (ट्रिब्यूनल के पीठासीन अधिकारी) की नियुक्ति ही नहीं हुई है यानी करीब साढ़े सात साल से यहां कोई जज हैं ही नहीं। इसके आखिरी जज जस्टिस राजेश टंडन थे। यहां 2009 से मामले लंबित हैं। 2011 के बाद ट्रिब्यूनल की ओर से कोई फैसला नहीं आया है।
ऐसे मामले देखता है ट्रिब्यूनल
ट्रिब्यूनल में आईटी एक्ट से संबंधित (किसी व्यक्ति की तस्वीर अनुचित तरीके से इंटरनेट पर प्रचारित किया जाना), बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और अन्य इकाइयों में ग्राहकों के जमा धन में सेंध लगाने जैसे साइबर अपराध के विभिन्न प्रकार के मामले आते हैं। तकनीक सक्षमता और मामलों की समझ के मद्देनजर ही अलग ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था क्योंकि अन्य अदालतों में ऐसे मामलों का निपटारा कठिन हो रहा था।