किसान आंदोलन: 1947 से चला आ रहा 'किस्सा' खत्म होगा, छूट जाएगी राजनीतिक दलों की ये पुरानी आदत!
संयुक्त किसान मोर्चे के वरिष्ठ पदाधिकारी अविक साहा बताते हैं, आजादी के बाद इतने दशकों में राजनीतिक दलों को 'किसान' एक ही दिन तो दिखता रहा है। चुनाव से एक दिन पहले उन्हें किसान की याद आती है और उसके बाद अगले चुनाव तक उन्हें भुला दिया जाता है। अब ऐसा नहीं होगा।
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किसान आंदोलन, नौ माह के बाद अब एक नई राह पर चल पड़ा है। तीनों कृषि कानूनों को रद्द करना, आगे ये तो सबसे प्रमुख मुद्दा बना ही रहेगा। साथ ही, किसान संगठन अब एक ऐसे प्लेटफार्म पर काम कर रहे हैं, जिसके बाद आने वाली पीढ़ियों को उनकी तरह 'आंदोलन' का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। संयुक्त किसान मोर्चे के वरिष्ठ पदाधिकारी अविक साहा बताते हैं, किसानों को लेकर '1947' से चला आ रहा वह किस्सा अब खत्म हो जाएगा। आजादी के बाद इतने दशकों में राजनीतिक दलों को 'किसान' एक ही दिन तो दिखता रहा है। चुनाव से एक दिन पहले उन्हें किसान की याद आती है और उसके बाद अगले चुनाव तक उन्हें भुला दिया जाता है। अब ऐसा नहीं होगा। किसान आंदोलन, ऐसा कुछ करेगा कि सरकार और राजनीतिक दलों को किसान हर वक्त याद आएगा। 27 सितंबर के 'भारत बंद' के अलावा किसान संगठनों के प्रतिनिधि 28 राज्यों में पहुंच रहे हैं। वहां की सरकार को 'एमएसपी' का स्थानीय ड्राफ्ट सौंप कर उसकी लिखित गारंटी देने का आग्रह करेंगे। अगले साल भाजपा को राजनीतिक चोट लग सकती है।
अविक साहा ने कहा, 1947 से किसान अदृश्य है। पहले तो यह हालत थी कि किसान ऐसी जगह रहता था कि जहां पर इंटरनेट और दूसरी संचार सुविधाएं न के बराबर थीं। मुख्यधारा से किसान कटा रहता था। भले ही उसकी संख्या अधिक थी, लेकिन वह सरकार और राजनीतिक दलों के बीच केवल एक 'वोट' बनकर रह गया। चुनाव से एक दिन पहले किसान को याद कर लिया जाता था। उसके बाद जब दोबारा चुनाव आता तो किसान फिर याद आ जाता। राजनीतिक दल जानते थे कि किसान का संगठित होना बहुत मुश्किल है। उनके पास ऐसे संसाधन भी नहीं हैं, जिससे वे एकत्रित हो सकें। गरीबी, जो उस वक्त थी, वह आज भी खत्म नहीं हो सकी। इसके चलते किसानों को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर संगठित करने की चुनौती बनी रही। बहुत कम संख्या में जो बड़े किसान थे, वे ही आंदोलन के बारे में सोच पाते थे।
राजनीतिक दल, चालाक थे। उन्हें मालूम था कि किसान संगठित नहीं हैं। वादा करो और भूल जाओ। अविक साहा के अनुसार, सरकार जानती थी कि ये लोग असंगठित हैं। ये लड़ नहीं सकते। वोट हमें ही देंगे। यह लंबे समय तक चलता रहा। भाजपा सरकार उसी गलतफहमी का शिकार हो गई। यह सोचकर कि किसान बोलेंगे नहीं, तीन काले कृषि कानून बना दिए। कंपनियों के हाथ में कृषि को सौंपने का खाका तैयार कर दिया। इतना ही नहीं, किसानों की जमीन आसानी से हड़प ली जाए, यह राह भी आसान बना दी। खैर कोई बात नहीं, सरकार को पीछे हटना होगा। अब किसानों के बच्चे पढ़ रहे हैं। घर में सोशल मीडिया वाले फोन भी हैं। किसान की समस्या, अब हर कोई जान रहा है, समझ भी रहा है। अब किसान आंदोलन, लोगों के बीच जाकर जो राह तैयार कर रहा है, वह ऐसी है कि वहां कोई भी पार्टी या सरकार झूठा दिलासा नहीं दे सकेगी।
राजनीतिक दल और सरकार, किसानों के साथ धोखा नहीं कर सकेंगे। इस आंदोलन का दूरगामी असर नजर आएगा। केवल किसान का परिवार ही नहीं, बल्कि देश का हर नागरिक इससे जुड़ेगा। अविक साहा ने कहा, किसान आंदोलन, चुनाव नहीं लड़ेगा। उसका मकसद किसान को सिखाना है। हम उसे समझा रहे हैं कि आज 1947 नहीं, 2021 है। बहुत जल्द वह समय देखेंगे, जब राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव में किसान 'केंद्र' में होगा। किसान को अब अपनी संख्या, ताकत और एकजुटता का अहसास हो गया है। हर राज्य में किसानों की टोलियां जा रही हैं। सरकार को हर मोर्चे पर घेरा जाएगा। कोई भी राजनीतिक दल किसानों को धोखा देने की हिम्मत नहीं कर सकेगा। बतौर अविक साहा, किसानों के नए प्लेटफार्म का असर अगले साल होने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में देखने को मिलेगा।