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कृषि कानून : रिपोर्ट मिलने के पांच माह बाद भी सुनवाई न होने से किसान नेता हैरान
Wed, 08 Sep 2021 03:20 AM IST
Jeet Kumar
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: Jeet Kumar
Updated Wed, 08 Sep 2021 03:20 AM IST
सार
घनवट ने पत्र में लिखा, यह दुख का विषय है कि रिपोर्ट पेश होने के पांच महीने बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान नहीं लिया। इसी कारण कृषि कानूनों से जुड़ा विवाद खत्म नहीं हो पाया।
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सांकेतिक तस्वीर....
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
कृषि कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट पेश होने के पांच माह बाद भी सुनवाई न होने से हैरान किसान नेता अनिल घनवट ने मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण को पत्र लिखा है। कमेटी से जुड़े घनवट ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है।
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घनवट ने पत्र में लिखा कि बतौर कमेटी सदस्य और किसान प्रतिनिधि मुझे इससे पीड़ा हुई है। कमेटी ने सभी पक्षों से दो महीने में ईमानदारी से बात कर रिपोर्ट तैयार की है। अब इसके शांतिपूर्ण समाधान के लिए कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
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गौरतलब है कि कृषि कानूनों के खिलाफ कई याचिकाओं के दाखिल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीन यह कमेटी बना कर उसे दो माह में रिपोर्ट देने को कहा था। कमेटी ने इस साल 31 मार्च को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। कमेटी में घनवट के अलावा अशोक गुलाटी और प्रमोद जोशी शामिल थे।
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मेरे लिए चुप रहना मुश्किल
घनवट ने अमर उजाला को बताया कि कमेटी के बाकी दोनों सदस्यों की भी यही राय है। दोनों सदस्य किसान प्रतिनिधि नहीं हैं, जबकि किसान प्रतिनिधि होने के नाते मैं चुप नहीं बैठ सकता। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट और सरकार के रुख से मुझे दुख पहुंचा है। मन में सवाल उठता है कि क्या ये भी विवाद का हल नहीं चाहते। अगर कमेटी की रिपोर्ट पर सुनवाई नहीं होनी थी तो इसका गठन ही क्यों किया गया था? अगर रिपोर्ट संतोषजनक नहीं है तो उसे खारिज कर दिया जाए। रिपोर्ट सार्वजनिक होगी तभी इस पर चर्चा होगी।
ज्यादातर किसानों को कृषि कानूनों की जानकारी नहीं
घनवट ने कहा कि आंदोलनरत ज्यादातर किसानों को नए कृषि कानूनों की पूरी जानकारी नहीं है। सच्चाई तभी सामने आएगी जब रिपोर्ट सार्वजनिक होगी। मैं नहीं कहता कि कमेटी की रिपोर्ट को तत्काल लागू किया जाए। मगर रिपोर्ट सामने आने के बाद ही पता चलेगा कि कानून में वास्तव में क्या है। मेरी समझ से परे है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट और सरकार दोनों रिपोर्ट पर चुप क्यों हैं?