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Hindi News ›   India News ›   Amoebic meningoencephalitis eats the flesh inside the brain, Know how does it enter inside the human being?

Explained: दिमाग के अंदर मांस को खा जाता है ये जीव, इंसान के अंदर कैसे करता है प्रवेश, क्या है ये बीमारी?

Sat, 08 Jul 2023 04:51 PM IST
हिमांशु मिश्रा स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Sat, 08 Jul 2023 04:51 PM IST
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सार
आज हम आपको इस बीमारी के बारे में बताएंगे। कैसे ये बीमारी होती है? इससे कैसे बचा जा सकता है? इसका क्या इलाज है? हमने इसे समझने के लिए न्यूरो सर्जन डॉ. विवेक अग्निहोत्री से बात की। आइए समझते हैं... 
 
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Amoebic meningoencephalitis eats the flesh inside the brain, Know how does it enter inside the human being?
अमीबा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केरल में हुई एक 15 साल के किशोर की मौत पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुकी है। मृतक अलप्पुझा जिले के पनावल्ली के रहने वाला था। किशोर अमीबिक मेनिंगोएन्सेफलाइटिस बीमारी ग्रसित था। इस बीमारी को PAM भी कहा जाता है। इस बीमारी के होने के पांच से दस दिन के अंदर ही इंसान दम तोड़ देता है। ये बीमारी अमीबा नाम के एक जीव से होती है। इंसान के शरीर में पहुंचते ही ये जीव उसके दिमाग पर हमला करता है। दिमाग के अंदर के मांस को पूरी तरह से ये जीव खा जाता है। 


बच्चे की मौत पर केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज का बयान भी सामने आया। उन्होंने बताया कि ये बीमारी नई नहीं है। पहले भी इस तरह के पांच मामले सामने आ चुके हैं। पहली बार 2016 में और उसके बाद 2019, 20 और 22 में ऐसे मामले सामने आए थे। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, इस बीमारी की चपेट में आने वाले सभी मरीजों की मौत हो गई है। 


ऐसे में आज हम आपको इस बीमारी के बारे में बताएंगे। कैसे ये बीमारी होती है? इससे कैसे बचा जा सकता है? इसका क्या इलाज है? हमने इसे समझने के लिए न्यूरो सर्जन डॉ. विवेक अग्निहोत्री से बात की। आइए समझते हैं... 
 

पहले जानिए ये अमीबा है क्या? 
डॉ. अग्निहोत्री ने कहा, 'दिमाग के अंदर घुसकर मांस खा जाने वाले इस जीव का नाम अमीबा है। इसे नेग्लरिया फाउलेरी भी कहते हैं। ये अमीबा धीरे-धीरे दिमाग की टिश्यू को नष्ट कर देता है। संक्रमण फैलने से दिमाग में सूजन आने लगती है।' 

डॉ. अग्निहोत्री के अनुसार, 'अमीबा एक कोशिकीय वाला जीव है, जो खुद से ही अपना आकार बदल सकता है। ये आमतौर पर तालाबों, झीलों और धीमी गति से बहने वाली नदियों में पाए जाते हैं। ये पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे पुराने यानी प्रिमिटिव जीवों में से एक है। ये एक एककोशिकीय जीव बैक्टीरिया, वायरस या फंगस से अलग होता है।' 
 

नाक के जरिए इंसान के शरीर में होता है दाखिल 
डॉ. अग्निहोत्री के अनुसार, 'ये अमीबा आमतौर पर तब इंसान को अपना शिकार बनाता है, जब कोई नदी, तालाब, पोखरा, झील के पानी में गोता लगाता है। अगर कहीं गंदे या जमे पानी का कोई इस्तेमाल होता है तो उससे भी इस संक्रमण के फैलने की संभावना होती है। ज्यादातर ये जीव गर्म पानी में मिलता है।’

‘संपर्क में आने वाले इंसान के नाक रास्ते ये शरीर में घुस जाता है। इसके बाद ओल्फेक्ट्री नर्व से चिपक जाता है। इसी नर्व की मदद से इंसान किसी गंध या खुशबू की पहचान करता है। ओल्फेक्ट्री नर्व दिमाग की सबसे निचली हड्डी यानी क्रिबीफॉर्म प्लेट से जुड़ी होती है। इस रास्ते से अमीबा खुशबू को पहचाने वाली नर्व तक पहुंचता है। इसके बाद ये दिमाग में पहुंचकर चिपक जाता है और धीरे-धीरे ब्रेन टिश्यू को नुकसान पहुंचाने लगता है। दिमाग में अमीबा ट्रोफोजोइट बना लेता है। मतलब की इंसान के दिमाग को चूसकर अमीबा अपना पेट भरता है।' 
 

इसके क्या लक्षण होते हैं?
डॉ. अग्निहोत्री ने बताया कि अमीबा इंसानों के शरीर में घुसते ही इंफेक्शन फैलना शुरू कर देता है। इसके लक्षण एक दिन से लेकर 12 दिनों के भीतर दिखने शुरू हो जाते हैं। शुरुआत में ये मेनिनजाइटिस संक्रमण के समान होते हैं, जिसमें सिरदर्द, उल्टी और बुखार होते हैं। इसके बाद गर्दन में अकड़न, दौरे आने शुरू हो जाते हैं। यहां तक कि इस संक्रमण की वजह से कई लोग कोमा तक में जा सकते हैं। इसके लक्षण नजर आने के बाद एक इंसान औसतन पांच दिनों के अंदर मर जाता है। 
 

क्या ये बीमारी एक से दूसरे शख्स में भी फैलती है? 
नहीं, यह बीमारी एक से दूसरे इंसान में नहीं फैलती। डॉ. अग्निहोत्री के अनुसार, 1965 में पहली बार इसकी पहचान हुई थी। तब से लेकर अब तक 56 सालों में दुनियाभर में 300 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा करीब 150 मामले अमेरिका में आए हैं। इस बीमारी से संक्रमित 98 प्रतिशत लोग दम तोड़ देते हैं। 

 

इससे कैसे बच सकते हैं? इसका क्या इलाज है? 
इसका अभी तक कोई सटीक इलाज नहीं मिल पाया है। ऐसे में इस बीमारी से संक्रमित मरीज का इलाज बैक्टीरियल मेंनिनजाईटिस के जरिए किया जाता है। सतर्कता और बचाव ही इसके लिए सही इलाज है। ये ज्यादातर गर्म पानी वाली नदियों, झीलों, झरनों में मिलते हैं। इसके अलावा इंडस्ट्री वेस्ट वाले गंदे पानी, जमीन के अंदर के गर्म पानी, स्विमिंग पूल, नल के पानी में भी ये जीव मिलता है। इसलिए सभी को साफ पानी का ही इस्तेमाल करना चाहिए। भले ही वह नहाने के लिए ही क्यों न कर रहे हों।
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