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खगोल विज्ञान: बृहस्पति कभी 50 गुना ताकतवर व 2000 पृथ्वी के बराबर था, ग्रह के संबंध में नई खोज

Thu, 29 May 2025 07:45 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Thu, 29 May 2025 07:45 AM IST
सार

मिशिगन यूनिवर्सिटी के ताजा अध्ययन के अनुसार जब सूर्य के चारों ओर घूमने वाली गैस और धूल की विशाल डिस्क जिसे ‘प्रोटोप्लेनेटरी नेबुला’ कहा जाता है, लगभग 45 करोड़ साल पहले बिखरने लगी थी, उसी दौर में बृहस्पति का स्वरूप अद्भुत था। यह ग्रह न केवल अपने वर्तमान आकार से करीब दोगुना बड़ा था, बल्कि उसका चुंबकीय क्षेत्र आज की तुलना में 50 गुना अधिक शक्तिशाली था। यही नहीं इसका आयतन 2,000 पृथ्वी के बराबर था। 

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American astronomers have made new discovery about planet Jupiter
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला / एजेंसी

विस्तार

अमेरिकी खगोलविदों ने बृहस्पति ग्रह को लेकर एक चौंकाने वाली जानकारी साझा की है, जिससे सौरमंडल की उत्पत्ति और उसकी अद्वितीय संरचना को समझने के लिए एक नया दरवाजा खुल गया है।

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मिशिगन यूनिवर्सिटी के ताजा अध्ययन के अनुसार जब सूर्य के चारों ओर घूमने वाली गैस और धूल की विशाल डिस्क जिसे ‘प्रोटोप्लेनेटरी नेबुला’ कहा जाता है, लगभग 45 करोड़ साल पहले बिखरने लगी थी, उसी दौर में बृहस्पति का स्वरूप अद्भुत था। यह ग्रह न केवल अपने वर्तमान आकार से करीब दोगुना बड़ा था, बल्कि उसका चुंबकीय क्षेत्र आज की तुलना में 50 गुना अधिक शक्तिशाली था। यही नहीं इसका आयतन 2,000 पृथ्वी के बराबर था। बृहस्पति को सौरमंडल का ‘वास्तुकार’ भी कहा जाता है। एक ऐसा गुरुत्वाकर्षणीय दिग्गज, जिसने ग्रहों की कक्षाओं को स्थिर किया और निर्माण के समय उभर रहे अन्य ग्रहों की दिशा तय की। यदि यह ग्रह इतना शक्तिशाली न होता तो आज का सौरमंडल शायद वैसा न होता जैसा हम जानते हैं। मिशिगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज सिर्फ बृहस्पति के बारे में नहीं बल्कि पूरे सौरमंडल की विकास प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझने की कुंजी हो सकती है।
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ऐसे मिले अंतरिक्ष से गहरे सुराग
वैज्ञानिकों ने बृहस्पति के दो छोटे चंद्रमाओं अमलथिया और थेबे  का अध्ययन किया। इनकी कक्षाएं थोड़ी-सी झुकी हुई हैं। यह विचलन दरअसल बृहस्पति के शुरुआती भौतिक स्वरूप का संकेत देता है। इन्हीं कक्षीय विसंगतियों का विश्लेषण कर यह अनुमान लगाया गया कि प्राचीन बृहस्पति की त्रिज्या उसकी मौजूदा त्रिज्या से लगभग दो गुना थी और उसका आयतन 2,000 पृथ्वी जितना था।

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भविष्य के मॉडल की नींव
अध्ययन मौजूदा ग्रह निर्माण सिद्धांतों में एक ठोस स्तंभ के रूप में देखा जा रहा है। अब तक वैज्ञानिकों को ग्रहों के निर्माण में गैस अपारदर्शिता, भारी तत्वों के कोर का द्रव्यमान और अभिवृद्धि दर जैसी अवधारणाओं पर भरोसा करना पड़ता था, जिनमें अनिश्चितता थी। लेकिन अब शोधकर्ता ग्रहों के चंद्रमाओं की कक्षीय गति और कोणीय संवेग संरक्षण जैसे सीधे मापे जा सकने वाले कारकों के आधार पर अधिक भरोसेमंद निष्कर्ष निकाल पा रहे हैं। यह अध्ययन उस निर्णायक समय की तस्वीर पेश करता है, जब सौर नेबुला धीरे-धीरे वाष्पित हो रहा था। यानी जब निर्माण सामग्री तेजी से समाप्त हो रही थी और ग्रहों की बनावट को अंतिम रूप दिया जा रहा था। इस प्रक्रिया का समापन एक प्रकार से सौरमंडल की ‘वास्तु योजना’ के पूरा होने जैसा है।

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