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एक्सप्लेनर: स्कूल में हिजाब को हाईकोर्ट ने फिर कहा न; ये नकाब-बुर्का से कितना अलग, क्या कहता है इनका इतिहास?

Tue, 25 Aug 2026 02:17 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Tue, 25 Aug 2026 02:17 PM IST
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सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज की छात्रा की स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की मांग खारिज कर दी है। कोर्ट के इस फैसले के बाद हिजाब को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। लेकिन हिजाब, नकाब और बुर्के में क्या अंतर है और इनका इतिहास कितना पुराना है? आइए जानते हैं।
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Allahabad HC Reiterates No to Hijab in School; How Is It Different from Niqab and Burqa, History?
पर्दे की कहानी - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज की एक नाबालिग मुस्लिम छात्रा की हिजाब से जुड़ी याचिका खारिज कर दी। छात्रा स्कूल की तय यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति चाहती थी। अदालत ने कहा कि स्कूल का समान और गैर-भेदभावपूर्ण ड्रेस कोड अनुशासन और संस्थान की पहचान से जुड़ा है। 



आखिर ये पूरा मामला क्या है? याचिकाकर्ता का क्या तर्क था? हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया? हिजाब होता क्या है? हिजाब, बुर्के और नकाब में क्या अंतर है? इसका इतिहास क्या रहा है? किन देशों में इन्हें पहनने पर प्रतिबंध लागू है?

मामला क्या है?

मामला प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल का है। याचिकाकर्ता सुकैना रिजवी ने कक्षा 6 से 10 तक इसी स्कूल में पढ़ाई की थी। उसका कहना था कि इस दौरान वह हिजाब पहनती रही और स्कूल ने आपत्ति नहीं की। कक्षा 11 में दाखिले के समय स्कूल ने तय यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद उसने अपनी मां के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

क्या है विवाद?
क्या है विवाद? - फोटो : Amar Ujala

छात्रा का क्या तर्क था?

छात्रा ने याचिका में दावा किया कि हिजाब पहनना उसके धर्म की आवश्यक धार्मिक प्रथा है। उसने इसे अपने मौलिक अधिकारों से जोड़ते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(a) का हवाला दिया। उसने यह भी तर्क दिया कि स्कूल में पहले हिजाब पहनने की अनुमति थी।

स्कूल ने क्या कहा?

स्कूल का कहना था कि वह निजी, गैर-सहायता प्राप्त और सीबीएसई से संबद्ध संस्थान है, जहां सभी छात्रों के लिए एक ही ड्रेस कोड है। उसके मुताबिक किसी एक छात्र को अलग छूट देने से अनुशासन और यूनिफॉर्म की एकरूपता प्रभावित हो सकती है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि छात्रा पर्याप्त धार्मिक सामग्री नहीं दे सकी, जिससे यह स्थापित हो कि कक्षा में हिजाब पहनना इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा है।

अदालत ने माना कि स्कूल का ड्रेस कोड समान, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन व संस्थान की पहचान के उद्देश्य से है, इसलिए उसमें बदलाव या व्यक्तिगत छूट देना स्कूल के अधिकार क्षेत्र का विषय है। पहले कुछ वर्षों में हिजाब पहनने की अनुमति मिलना भी छात्रा को इसे जारी रखने का स्वतः अधिकार नहीं देता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2022 के कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्ण पीठ के फैसले को भी आधार बनाया। कर्नाटक हाईकोर्ट ने रेशम बनाम कर्नाटक सरकार मामले में कहा था कि हिजाब इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। उसने स्कूलों के ड्रेस कोड को लागू करने के अधिकार को भी बरकरार रखा था।

हिजाब को लेकर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा है?

कर्नाटक के फैसले को चुनौती देने वाले अयशत शिफा मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने 2022 में अलग-अलग राय दी थी। इसके बाद मामला बड़ी पीठ के लिए भेजे जाने की स्थिति में रहा। इसलिए हिजाब को इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा मानने या न मानने पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।

हिजाब में क्या अंतर
हिजाब में क्या अंतर - फोटो : Amar Ujala

जिस हिजाब पर बवाल वो होता क्या है?

हिजाब शब्द का अर्थ पूरे शरीर को ढकने से है, लेकिन मुस्लिम महिलाएं इससे सिर और गर्दन को ढकने के लिए इस्तेमाल करती हैं। आधुनिक मुस्लिम देशों में हिजाब प्रचलन में है। ये किसी भी रंग और स्टाइल का हो सकता है।

बुर्का कैसे है अलग?
बुर्का कैसे है अलग? - फोटो : Amar Ujala

हिजाब, बुर्का, नकाब क्या ये सब अलग-अलग होते हैं?

हां, इन सभी में काफी अंतर होता है। नकाब में हिजाब की तुलना में शरीर ज्यादा ढका होता है। वहीं बुर्का एक तरह का लबादा है, जो सिर से पैर तक पूरे जिस्म को ढक लेता है। ऐसे ही चादर बुर्का और खिमार भी काफी अलग होते हैं। 

नकाब में क्या अंतर?
नकाब में क्या अंतर? - फोटो : Amar Ujala

नकाब पहनने वाली महिला की सिर्फ आंखें खुली रहती है।

चादर बुर्का कैसे है अलग?
चादर बुर्का कैसे है अलग? - फोटो : Amar Ujala

चादर बुर्का काफी हद तक बुर्के की तरह ही होता है।

खिमार कैसे है अलग?
खिमार कैसे है अलग? - फोटो : Amar Ujala

खिमार फिटिंग में नहीं सिला होता बल्कि हिजाब के ऊपर ही चादर की तरह पहना जाता है। 

क्या है इनका इतिहास?

महिलाओं के सिर और शरीर को ढकने की परंपरा इस्लाम के उदय से कई सदियों पहले भी मौजूद थी। एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका के अनुसार, प्राचीन फारस में शाही महिलाओं को आम लोगों से अलग रखने के लिए पर्दे का इस्तेमाल किया जाता था। आकेमेनिड काल में फारसी रानियों को पर्दे वाले रथ में ले जाने के प्रमाण मिलते हैं। यूनानी इतिहासकार प्लूटार्क ने राजा आर्टैक्सर्क्स के शासनकाल की रानी स्टेटीरा का उल्लेख करते हुए इस परंपरा का वर्णन किया है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि उस समय हर महिला नकाब पहनती थी। आकेमेनिड काल की उपलब्ध कलाकृतियों में महिलाओं को सिर और गर्दन ढकने वाले कपड़ों में दिखाया गया है, लेकिन उनका चेहरा आम तौर पर खुला दिखाई देता है। 

बाद के फारसी साहित्य में चेहरा ढकने के भी उल्लेख मिलते हैं। वीस और रामीं जैसे फारसी आख्यान में वीस नाम की महिला के पर्दे के पीछे रहने और चेहरे पर नकाब लगाने का वर्णन मिलता है। इस कथा की कुछ सामग्री पर्शियन काल से जुड़ी मानी जाती है।

चादर की परंपरा
फारसी समाज में चादर नाम का एक ढीला बाहरी वस्त्र भी प्रचलित था, जिससे सिर और शरीर को ढका जाता था। कुछ संदर्भों में इससे चेहरा ढकने का भी उल्लेख मिलता है। पुराने यहूदी धर्म से जुड़े ग्रंथों में भी महिलाओं के सिर ढकने वाले वस्त्रों का जिक्र मिलता है। 

इस्लाम के बाद क्या बदला?
सातवीं सदी में इस्लाम के उदय के बाद महिलाओं के पहनावे और पर्दे को धार्मिक संदर्भ मिला। कुरान की सूरह अन-नूर 24:31 और सूरह अल-अहजाब 33:59 में महिलाओं के पहनावे और बाहरी वस्त्र से जुड़े निर्देश मिलते हैं। बाद में अलग-अलग इस्लामी विद्वानों ने इन निर्देशों की अलग-अलग व्याख्या की। इसी के साथ विभिन्न मुस्लिम समाजों में पर्दे के अलग-अलग रूप विकसित होते गए।

बुर्के का इतिहास
फारसी भाषा में बोरका या बुर्का शब्द चेहरे या शरीर को ढकने वाले परिधान के लिए इस्तेमाल होता था। 14वीं सदी में यात्री इब्न बतूता ने शिराज में बोरका के इस्तेमाल का उल्लेख किया था। बाद में मध्य एशिया और अफगानिस्तान में भी इसके अलग-अलग रूप विकसित हुए।

इस तरह, पर्दे की परंपरा इस्लाम से पहले की है, लेकिन इस्लाम के बाद इसे धार्मिक संदर्भ मिला। समय के साथ धार्मिक व्याख्याओं और अलग-अलग क्षेत्रों की स्थानीय संस्कृतियों के प्रभाव से हिजाब, नकाब, चादोर और बुर्के के अलग-अलग रूप सामने आए।

इन देशों में चेहरा ढकने पर बैन
इन देशों में चेहरा ढकने पर बैन - फोटो : Ai

किन देशों में चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लागू है?

दुनियाभर के 16 देशों में इस वक्त चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लागू हैं। 

1. यूरोप
यूरोप में सबसे पहले फ्रांस में बुर्के और अन्य तरह से चेहरा ढकने पर पाबंदी लगी थी। संसद में इसे लेकर 2011 में कानून लागू कर दिया गया था। जुलाई 2014 में इसे यूरोप की मानवाधिकार अदालत से भी मंजूरी मिल गई थी। 

इसके बाद डेनमार्क में अगस्त 2018 में पूरी तरह चेहरा ढकने पर पाबंदी लगा दी गई। यहां नियम का उल्लंघन करने वाले पर 1000 क्रोन (करीब 11 हजार रुपये) तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। बार-बार उल्लंघन करने वालों पर यह जुर्माना 10 गुना तक बढ़ाया जा सकता है।  इसके अलावा अक्तूबर 2017 में ऑस्ट्रिया में सार्वजनिक जगहों जैसे- अदालतों और स्कूलों में चेहरा ढकने पर पाबंदी लगा दी गई। नीदरलैंड में जून 2018 में सार्वजनिक जगहों जैसे दफ्तरों, स्कूलों, सार्वजनिक परिवहन, रेस्तरां, दुकानों और अन्य जगहों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लागू हुए। हालांकि, सड़कों पर चेहरा ढकने में छूट दी गई। 
बेल्जियम में पूरे चेहरे को ढकने पर प्रतिबंध से जुड़ा कानून जुलाई 2011 से ही अस्तित्व में है। इसके तहत सार्वजनिक स्थलों पर ऐसे कपड़े नहीं पहने जा सकते, जिससे इन्हें पहनने वालों की पहचान न की जा सके। इसके अलावा बल्गेरिया में 2016 चेहरा ढकने पर प्रतिबंध से जुड़ा कानून बनाया जा चुका है। नॉर्वे में जून 2018 में शैक्षिक संस्थानों में चेहरा ढकने पर पाबंदी लगा दी गई। कुछ ऐसे ही नियम लग्जमबर्ग में भी लागू हैं, जहां अस्पतालों, कोर्ट और सार्वजनिक इमारतों में चेहरा नहीं ढका जा सकता। स्विट्जरलैंड में 2025 से चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लागू है। 

2. अफ्रीका
इतना ही नहीं अफ्रीका के कई देशों में भी महिलाओं के पूरा चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लागू हैं। खासकर 2015 में अलग-अलग देशों में एक के बाद एक हुए आत्मघाती हमलों के बाद इन नियमों को कड़ाई से लागू किया गया। चैड, गेबौन, कैमरून के उत्तरी क्षेत्र, नाइजर के दिफा और रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो में सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा नहीं ढका जा सकता। इसके अलावा अल्जीरिया में अक्तूबर 2018 से ही कार्यस्थलों पर पूरा चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लागू हैं।

3. एशिया
दूसरी तरफ श्रीलंका में 2019 को ईस्टर पर हुए हमले के बाद चेहरा ढकने पर पाबंदी लगा दी गई थी। बताया जाता है कि इस प्रतिबंध के निशाने पर भी मुस्लिमों द्वारा पहना जाने वाला बुर्का और नकाब था। 

वहीं, चीन के शिनजियांग में भी सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने और लंबी दाढ़ी रखने पर पाबंदी है। यह प्रतिबंध मुख्यतौर पर इगुर मुस्लिमों को निशाना बनाने के मकसद से लागू हैं।

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