पंजाब: क्या पिछड़ों के सहारे पार होगी अकाली दल की नैया, जानें राज्य का सियासी समीकरण
पंजाब में सियासी सरगर्मियां तेज हो चली हैं, हर रोज राजनीति घटनाक्रम बदल रहा है। विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में अकाली दल और बीएसपी ने एक साथ चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है, क्या सच में सुखबीर सिंह बादल के लिए यह गठबंधन तुरुप का इक्का साबित होगा।
विस्तार
पंजाब की सियासत इस समय पूरे देश को अपनी ओर खींच रही है। राज्य में सियासी घटनाक्रम लगातार बदल रहे हैं। कांग्रेस की अंदरूनी कलह पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुई थी कि अकाली दल ने एक नया सियासी दांव चलकर सभी को चौंका दिया। दशकों तक हिंदुत्ववादी पार्टी के साथ चुनाव लड़ने वाले अकाली दल ने अचानक बसपा के साथ गठबंधन कर सियासी गलियारों में एक नई सुगबुगाहट पैदा कर दी। अगामी चुनावों को देखते हुए प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल ने मायावती से हाथ मिलाकर राज्य के पिछड़े और दलित वोटों पर अपना कब्जा जमाने की तैयारी शुरू कर दी है।
पंजाब में दलितों का 32 फीसदी से ज्यादा वोटबैंक है। पिछले दिनों अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने चुनाव जीतने के बाद दलित उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की थी। सुखबीर सिंह बादल को यह बात अच्छी तरह से पता है कि दलितों के समर्थन के बिना 2022 का विधानसभा चुनाव जीतना संभव नहीं है। इसीलिए अकाली दल प्रमुख ने कुछ सोचकर गठबंधन को अंजाम दिया है।
प्रकाशसिंह बादल ने मायावती को फोन पर दी बधाई
शिरोमणि अकाली दल के संरक्षक प्रकाश सिंह बादल ने शनिवार को बसपा प्रमुख मायावती को फोन कर दोनों दलों के बीच गठबंधन के लिए बधाई दी। बातचीत में बादल ने कहा कि हम आपको जल्द पंजाब यात्रा के लिए आमंत्रित करेंगे।
Shiromani Akali Dal (SAD) patron Parkash Singh Badal speaks to BSP chief Mayawati over a phone call, congratulates her on the SAD-BSP alliance
"We will soon invite you to visit Punjab," he says during their conversation. pic.twitter.com/jOjZof1BaZ— ANI (@ANI) June 12, 2021
बसपा प्रमुख ने कहा-ऐतिहासिक कदम
इधर, मायावती ने कहा कि अकाली दल और बसपा के बीच गठबंधन पंजाब में एक नई राजनीतिक व सामाजिक शुरूआत है। गठबंधन के लिए दिल से बधाई और इस ऐतिहासिक कदम के लिए शुभकामनाएं।
The Alliance of SAD and BSP is the new political and social beginning in Punjab. Hearty congratulations and best wishes to the people for this historic step: BSP chief Mayawati pic.twitter.com/lROZOX8WX5
— ANI (@ANI) June 12, 2021
अकाली दल को सत्ता चलाने का पुराना अनुभव
दरअसल, राज्य में अकाली दल को सत्ता चलाने का पुराने अनुभव रहा है। लंबे समय तक पंजाब की सत्ता का स्वाद चख चुकी पार्टी को भरोसा है कि दलित वोट बैंक को अगर साध लिया जाता है तो अगामी चुनाव में पार्टी की जीत सुनिश्चित है। इसीलिए अकाली दल ने दलित और पिछड़ों के हिमायती नेता को साथ रखकर चुनाव लड़ने का प्लान बनाया। शिरोमणि अकाली दल 2007- 2012 के विधानसभा चुनावों में जीतकर सरकार बनाई थी। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों इसी दल के नेता बने थे। बाद में अकाली दल ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और फिर सत्ता में वापसी की, लेकिन कृषि कानूनों के मुद्दों पर अकाली दल भाजपा से अलग हो गया।
राज्य की एक तिहाई दलित वोटों पर सुखबीर बादल की नजर
पंजाब के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवार यानी सुखबीर सिंह बादल को बसपा से गठबंधन करना कितना रास आएगा, यह कहना तो अभी जल्दीबाजी होगी, लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि राज्य में एक तिहाई से ज्यादा दलितों और पिछड़ों का वोटबैंक चुनावी नतीजों के बदलने में अहम भूमिका अदा कर सकता है। राज्य में अनुसूचित जातियों की अच्छी खासी संख्या है। अकाली दल को यह पता है कि सत्ता पाने के लिए 40 फीसदी से ऊपर वोट प्रतिशत होनी चाहिए, अगर इससे कम होगा तो सत्ता पाना मुश्किल होगा। इसलिए सुखबीर बादल ने समय रहते हालात को भांप लिया।
बसपा-अकाली गठबंधन के सामने कांग्रेस ने खड़ी की चुनौती
पंजाब में अकाली दल जब भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ता था तो उसका फायदा अकाली दल को मिलता था। क्योंकि हिंदू वोट भी अकाली दल के पक्ष में जाता रहा। पंजाब का मालवा इलाका हिंदू वोटों का गढ़ माना जाता है, जहां करीब 67 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां पर भाजपा के चलते अकाली दल को सियासी फायदा मिलता था, लेकिन भाजपा से अलग होने के बाद सुखबीर सिंह को यहां पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि सुखबीर सिंह हिंदू वोटरों को भी अपने पक्ष में करने के लिए लगातार इलाकों का दौरा कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2022 में अकाली दल को पंजाब की कुर्सी तभी मिल सकती है जब वह दलितों के साथ-साथ हिंदू वोटों को साध ले। वहीं मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी सियासी फायदे के लिए राज्य की सभी योजनाओं में 30 प्रतिशत फंड अनुसूचित जाति की भलाई के लिए खर्च करने का एलान कर दिया । जिससे अकाली और बसपा गठबंधन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी।
पंजाब में आज तक कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं
देश में पंजाब में दलितों का प्रतिशत सबसे ज़्यादा है, राज्य की आबादी के कुल 32 फीसदी दलित इस राज्य में हैं, लेकिन आज तक पंजाब के राजनीतिक इतिहास में कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं बना। जानकार बताते हैं कि इसकी मुख्य वजह दलितों का आपस में तालमेल नहीं होना है। यहां का दलित बंटा हुआ है। कुछ तबकों की वफादारी अकाली दल की ओर है तो कुछ का झुकाव कांग्रेस की ओर। पंजाब में यह एकजुट होकर कभी नहीं रहे।
2019 में बसपा का वोट परसेंट 2 फीसदी से भी कम हुआ
1992 के विधान सभा चुनाव में बसपा ने पंजाब में 9 सीटों पर जीत दर्ज की थी। तब अकाली दल ने राज्य में बसपा का बहिष्कार किया था और 1996 लोकसभा में पार्टी ने तीन सांसदों को भी यहां से दिल्ली भेजा था। 1992 में बीएसपी का वोट शेयर 16 फीसदी था, जबकि 2014 के लोक सभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर 1.9 फ़ीसदी रह गया था 2009 के चुनाव में 21 सीट जीतने वाली बसपा का वोट प्रतिशत लगातार घटता चला गया। 2019 में तो पार्टी अस्तित्व बचाने के लिए लड़ाई लड़ने लगी। पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में हाथी ने साइकिल की सवारी की, लेकिन नतीजा सिफर निकला। बसपा को एक सीट भी नसीब नहीं हुई। बल्कि वोट प्रतिशत 4 से कम होकर 2 फीसदी पर पहुंच गया। बसपा लगातार सियासी जमीन खोती जा रही है। वहीं अकाली दल खोई हुई सियासी जमीन को वापस लाने के लिए बसपा के साथ गठबंधन किया है। अब देखना होगा कि अकाली दल अगामी चुनाव में सत्ता हासिल करने में कामयाब होती है या नहीं।