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Pahalgam: कोई बुराई पर उतर आए तो राजा का कर्तव्य है प्रजा की रक्षा और वह अपना कर्तव्य करें- संघ प्रमुख भागवत

Sat, 26 Apr 2025 07:00 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Sat, 26 Apr 2025 07:00 PM IST
सार

पहलगाम हमले के बाद पूरे देश में गुस्सा है। इस बीच, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आतंकियों को सबक सिखाने की बात कही है। उन्होंने राजधानी दिल्ली में एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि हमारा मूल धर्म अहिंसा है, लेकिन कुछ लोग नहीं बदलेंगे, चाहे कुछ भी करो।   

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After the Pahalgam attack, Mohan Bhagwat hinted at action against Pakistan, know what he said
मोहन भागवत। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पहलगाम हमले के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि अहिंसा हमारा धर्म है और गुंडों को सबक सिखाना भी हमारा धर्म है। हम अपने पड़ोसियों का कभी अपमान या नुकसान नहीं करते लेकिन फिर भी अगर कोई बुराई पर उतर आए तो दूसरा विकल्प क्या है? राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना है, राजा को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। वे राजधानी दिल्ली में आयोजित एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम में पहलगाम आतंकी हमले में जान गंवाने वाले पर्यटकों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।  

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कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि हमारा धर्म संतुलन देने वाला धर्म है। हमारे यहां स्पष्ट उल्लेख है। ...अहिंसा ही हमारा स्वभाव, हमारा मूल्य है। हमारी अहिंसा लोगों को अहिंसक बनाने के लिए है। कुछ लोग (अहिंसक) बन जाएंगे, कुछ लोग बिगड़ जाएंगे...और इतने बिगड़ जाएंगे कि दुनिया में उपद्रव करेंगे। हम किसी के दुश्मन नहीं हैं। द्वेष हमारा स्वभाव नहीं है। रावण का वध भी उसके कल्याण के लिए हुआ। संहार को हिंसा नहीं कहते। आततायियों से मार न खाना और गुंडागर्दियों को सबक सिखाना, यह भी हमारा धर्म है। पाश्चत्य विचार पद्धति में यह दोनों चीजें एक साथ नहीं चल सकतीं। वहां यह संतुलन ही नहीं है, लेकिन हमारे यहां यह संतुलन है।

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राजा का कर्तव्य है प्रजा की रक्षा करना
हम कभी भी अपने पड़ोसियों का कोई अपमान, कोई हानि नहीं करते, लेकिन अगर हम इस तरह रहें और तब भी कोई बुराई पर ही उतर आए तो हमारे पास दूसरा इलाज क्या है? राजा का तो कर्तव्य है प्रजा की रक्षा करना है और राजा अपना कर्तव्य करेगा। गीता में अहिंसा का उपदेश है, लेकिन महाभारत में अर्जुन लड़े। उन्होंने लोगों को मारा क्योंकि उस समय उनके सामने ऐसे लोग थे कि उनका दूसरा इलाज नहीं था।
 

सनातन धर्म को सही अर्थों में समझने की आवश्यकता
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने सनातन धर्म को सही अर्थों में समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि धर्म तब तक धर्म नहीं है जब तक वह सत्य, शुचिता, करुणा और तपस्या के चार सिद्धांतों का पालन नहीं करता। उन्होंने कहा कि इससे परे जो कुछ भी है वह अधर्म है।  

उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान में हमने धर्म को कर्मकांड और खान-पान की आदतों तक सीमित कर दिया है, जैसे कि किसकी किस तरह पूजा की जानी चाहिए और क्या खाना चाहिए और क्या नहीं। यह एक संहिता है... सिद्धांत नहीं। धर्म एक सिद्धांत है।
 
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हिंदू धर्मग्रंथों में कहीं भी अस्पृश्यता का उपदेश नहीं
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि हिंदू समाज को हिंदू धर्म को समझने की आवश्यकता है, जो दुनिया के सामने अपनी परंपराओं और संस्कृति को पेश करने का सबसे अच्छा तरीका होगा। हिंदू धर्मग्रंथों में कहीं भी अस्पृश्यता का उपदेश नहीं दिया गया है। कोई भी 'ऊंच' या 'नीच' (ऊंचा या नीच) नहीं है। उन्होंने कहा यह कभी नहीं कहा जाता कि एक काम बड़ा है और दूसरा छोटा... अगर आप ऊंच-नीच देखते हैं, तो यह अधर्म है। यह दयाहीन व्यवहार है। मोहन भागवत ने कहा कि कई धर्म हो सकते हैं और उनमें से प्रत्येक उनका पालन करने वालों के लिए महान हो सकता है। लेकिन, व्यक्ति को अपने द्वारा चुने गए मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और दूसरों का सम्मान करना चाहिए। 
 

आगे उन्होंने कहा कि किसी को बदलने की कोशिश मत करो। धर्म के ऊपर एक धर्म है। जब तक हम इसे नहीं समझेंगे, हम धर्म को नहीं समझ पाएंगे। धर्म के ऊपर वह धर्म आध्यात्मिकता है। 

वहीं, इस कार्यक्रम में बोलते हुए स्वामी विज्ञानानंद ने कहा कि उनकी पुस्तक 'द हिंदू मेनिफेस्टो' प्राचीन ज्ञान के सार को बताती है, जिसे समकालीन समय के लिए पुनर्व्याख्यायित किया गया है। उन्होंने कहा कि हिंदू विचार हमेशा वर्तमान की जरूरतों को संबोधित करता रहा है, जबकि ऋषियों द्वारा शक्तिशाली सूत्रों में निहित कालातीत सिद्धांतों में दृढ़ता से निहित रहा है। 

 

'हिंदू कभी ऐसा नहीं करते'
इससे पहले गुरुवार को बोलते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि हिंदू कभी किसी से उसका धर्म पूछकर उसे नहीं मारते। यह लड़ाई धर्म और अधर्म के बीच की है। उन्होंने कहा कि रावण को भी पहले सुधरने का मौका दिया गया था, लेकिन जब उसने बदलाव से इनकार कर दिया, तब राम ने उसका अंत किया। इसके साथ ही भागवत ने आगे कहा कि हमारे दिल में दुख है, हम गुस्से में हैं। लेकिन इस बुराई को खत्म करने के लिए ताकत दिखानी होगी। 

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समाज पर एकता पर दिया जोर
साथ ही भागवत ने समाज में एकता पर भी जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर समाज एकजुट रहेगा, तो कोई भी दुश्मन हमें नुकसान नहीं पहुंचा पाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर कोई हमें बुरी नीयत से देखेगा, तो उसकी आंख निकाल दी जाएगी। भागवत ने कहा था कि हिंसा हमारे स्वभाव में नहीं है, लेकिन चुपचाप सहना भी ठीक नहीं। एक सच्चे अहिंसक व्यक्ति को मजबूत भी होना चाहिए। ताकत हो और जरूरत पड़े, तो उसे दिखाना भी चाहिए।

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