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Caste Census: एक बार जातिवाद का तूफान झेलना ही होगा, जातिगत जनगणना से कौन रहेगा फायदे में और किसे होगा घाटा

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 18 Apr 2023 08:05 PM IST
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सार
Caste Census: प्रख्यात समाजशास्त्री, राजनीतिक विशेषज्ञ एवं जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार ने कहा है कि एक बार जातिवाद का तूफान तो झेलना ही होगा। ये भी तय है कि 'जातिगत जनगणना' से कुछ राजनीतिक लोगों के तोते उड़ जाएंगे। कुछ लोग फायदे में भी रह सकते हैं...
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After the caste census started in Bihar, this demand has intensified in other parts of the country as well
Rahul Gandhi in Karnataka - फोटो : Agency

विस्तार

बिहार में जातिगत जनगणना शुरू होने के बाद देश के दूसरे हिस्सों में भी यह मांग तेज हो चली है। कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर बड़ा दांव चल दिया है। राहुल गांधी ने यूपीए सरकार के समय एकत्रित किए गए जाति जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग रख दी है। उन्होंने इस मुद्दे पर पीएम नरेंद्र मोदी को चुनौती दी है। दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इस बाबत पीएम मोदी को पत्र लिखकर जातिगत जनगणना कराने की मांग रख दी है। कांग्रेस पार्टी ने 'जितनी आबादी, उतना हक', नारा दे दिया है। देश के प्रख्यात समाजशास्त्री, राजनीतिक विशेषज्ञ एवं जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार ने कहा है कि एक बार जातिवाद का तूफान तो झेलना ही होगा। ये भी तय है कि 'जातिगत जनगणना' से कुछ राजनीतिक लोगों के तोते उड़ जाएंगे। कुछ लोग फायदे में भी रह सकते हैं।

एक कोस पर पानी तो 50 कोस पर जाति का स्वरूप बदला

बतौर प्रो. आनंद कुमार, भारतीय समाज की रचना में धर्म, जाति, भाषा और भूगोल का अहम योगदान रहा है। इसमें भाषा को खासी अहमियत दी गई। कोई भी इंसान, अपने आस-पड़ोस की सजगता से भी जाति को समझ सकता है। अपने देश में तो जाति को धर्म से अधिक मजबूती मिलती रही है। धर्म परिवर्तन करने जैसी खबरें तो सुनने या पढ़ने को मिल जाती हैं, मगर जाति परिवर्तन जैसा कुछ देखने को नहीं मिलता। हर एक कोस पर पानी बदलता है, दस कोस पर भाषा, तो पचास कोस पर जाति का स्वरूप बदल जाता है। अंग्रेजी राज में भाषा और जाति का अध्ययन नहीं हो सका। जब जनगणना शुरू हुई तो जाति का जन्म कैसे हुआ, इन तथ्यों की तह तक जाने का प्रयास नहीं हुआ। 1872 के आसपास जातिगत जनगणना शुरू हुई। जाति को स्थानीय आकार से राष्ट्रीय आकार मिलना प्रारंभ हुआ। ब्रिटिश राज में इसी आधार पर कुछ जातियों को थोड़ी बहुत सुविधाएं या आरक्षण दिया गया। तब आरक्षण का आधार सामाजिक, जातिगत या पिछड़ापन नहीं था, बल्कि उसे संख्या के आधार पर परिभाषित किया गया। मुस्लिम अल्पसंख्यकों और एंगलो इंडियन को सुविधाएं मिलीं, बाकी को छोड़ दिया गया। कई जातियों, मसलन ब्राह्मण और अनुसूचित जातियों में खुद को अल्पसंख्यक मानने की होड़ शुरू हो गई।  

75 साल बाद व्यवस्था के समक्ष चुनौती

आजादी के बाद जाति को धर्म से जोड़ा जाने लगा। हिंदुओं में तीन वर्ग सामने आए। सामान्य वर्ग में स्वर्ण जातियां, पिछड़े वर्ग में शूद्र आदि जातियां और अनुसूचित जाति में अति शूद्रों को रखा गया। महात्मा गांधी और डॉ. बीआर आंबेडकर के समझौते के मुताबिक, अनुसूचित जातियों को आरक्षण दिया गया। अब 75 साल बाद उस व्यवस्था के समक्ष चुनौती आ गई है। अनुसूचित जातियों को दलित और महादलित के रूप में पहचाना जाने लगा है। अनुसूचित जाति में आरक्षण ग्रस्त समस्या रही है। तकरीबन देश के हर उच्च न्यायालय में अनुसूचित जाति के आरक्षण को लेकर मुकदमे चल रहे हैं। दलित वोट बैंक की राजनीति करने के पास भी इसका हल नहीं है। वीपी सिंह के कार्यकाल में अन्य पिछड़ा वर्ग की बात सामने आई। राजनीतिक और सामाजिक तौर यह एक बड़ी घटना थी। उस वक्त जो आरक्षण दिया गया, उस पर स्वर्णों की तरफ से एतराज हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ी जाति में आर्थिक आधार पर संपन्नता हासिल कर चुके लोगों यानी क्रीमी लेयर को हटाकर अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को आरक्षण की सिफारिश कर दी। उस वक्त अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए राजनीतिक आरक्षण की मांग नहीं की गई। आज अन्य पिछड़े वर्ग और मजबूत पिछड़े वर्ग में बंटवारा है। वीपी सिंह फॉर्मले में तो अन्य पिछड़ा वर्ग की अनदेखी को अनदेखा कर दिया गया था। मंडल आयोग की समीक्षा करने का एक बदलाव जरूरी है, क्योंकि संख्या शक्ति से लैस अन्य पिछड़ी जाति, संख्या की दृष्टि से कमजोर अन्य पिछड़ी जाति की खातिर कोई गुंजाइश बनाने के लिए तैयार नहीं है।

राजनीति में जाति का सिक्का ही चलता है

गांव से शहर तक हर परिवार के बारे में स्वयं और दूसरों को यह मालूम होता है कि कौन किस जात का है। हालांकि सरकार के रजिस्टर में यह सच दर्ज नहीं होता। जातिगत जनगणना से सरकार का अज्ञान दूर होगा, जबकि समाज को मालूम है कि समाज की राजनीति में जाति का सिक्का ही चलता है। राजनीतिक दलों में चाहे पदाधिकारियों का चयन हो या चुनाव में टिकट देने की बात, इसमें जाति के गणित का खुला ख्याल रखा जाता है। जाति की जनगणना से तूफान के पैदा होने की आशंका है। ये अलग बात है कि यह सवाल अपनी जगह पर और ज्यादा बड़ा हो जाएगा कि क्या भारत जातियों की जनगणना का अधूरापन दूर कर जाति विहीनता की तरफ बढ़ेगा या जातिवाद की जड़ों में खाद पानी ही डालेंगे। प्रो. आनंद कुमार ने बताया कि पिछले समय में मोदी सरकार ने आरक्षण विरोधी स्वर्ण जाति के गरीब हिस्से को आरक्षण देकर, जाति व्यवस्था की पेचीदगी में नई गांठ पैदा कर दी। अब आरक्षण का आधार न सिर्फ सामाजिक या राजनीतिक अवसरों का अभाव ही नहीं, बल्कि आर्थिक साधनहीनता का अभाव भी राजनीतिक तौर तरीके से खोजा जाने लगा है। समाज में भारतीयता और जातीयता की पुरानी टकराहट है। अब नई पीढ़ी ने जाति प्रभाव के भेदभाव को कमजोर किया है, मगर लगातार चल रही वोट की चक्की ने राष्ट्रीयता और भारतीयता का कचूमर निकाल दिया है।

उत्तर भारत में भी अगड़ा पिछड़ा-परिवेश बदलेगा

कांग्रेस की छवि बैकवर्ड विरोधी रही है। एक समय ऐसा भी आया कि जब मुलायम सिंह, लालू यादव और नीतिश कुमार बैकवर्ड के मोर्चे पर आगे निकल गए। ममता बनर्जी ब्राह्रमण हैं, लेकिन उन्होंने क्षेत्रीयवाद की एक मजबूत तस्वीर बना ली है। दक्षिण भारत में भी परंपरागत राजनीति अब बदलाव पर है। जब नव निर्माण होगा तो कांग्रेस पहले नंबर पर होगी। भाजपा से नीतिश कुमार का मोहभंग, इसी का नतीजा है। पिछड़ों की पार्टी में भी स्वर्णों के लिए दरवाजे खोलने होंगे। बसपा प्रमुख मायावती, यह प्रयोग कर चुकी हैं। अखिलेश यादव ने भी ब्राहृमणों को साधने का प्रयास किया था।  

केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में भी बदलाव है। वहां भी अब मार भगाओ वाली राजनीति नहीं रही है। उत्तर भारत में भी अगड़ा पिछड़ा परिवेश बदलेगा। जाति विहीनता नही बढ़ेगी, मगर जातिवाद का तूफान तो झेलना होगा। अगली पीढ़ी को आखिर विकास ही समझ आएगा। वोट या सत्ता के लिए जातिगत जनगणना का फायदा मिल जाएगा, लेकिन कुछ लोगों के तोते भी उड़ेंगे। बिहार और यूपी में 'यादव' की राजनीति कर रहे लोगों को झटका लग सकता है। बाकी तो जीवन जीने के लिए दवाई और कमाई जैसा ही कोई फार्मूला तय करना होगा। ये तय है कि विकास की उस अवस्था तक पहुंचने से पहले हमें जातिगत दलदल से गुजरना ही पड़ेगा।

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