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अफगानिस्तान: सुरक्षा संबंधी चिंताओं को समझ रहे हैं रक्षा मंत्री राजनाथ, एनएसए डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर

Fri, 20 Aug 2021 05:45 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Fri, 20 Aug 2021 05:45 PM IST
सार

विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि चीन से हमें उतना बड़ा खतरा नहीं है। रूस के साथ भी चिंता की बात नहीं है। लेकिन पाकिस्तान, अफगानिस्तान (तालिबान), चीन और रूस के बीच में बढ़ते समीकरण आने वाले समय में बड़ी चिंता पैदा कर सकते हैं...

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After takewover of afghanistan by taliban India is woory for our citizens evacuation and trade with central asia
अफगानिस्तान के हालात को लेकर पीएम मोदी के नेतृत्व में CCS की बैठक। - फोटो : ANI (File Photo)

विस्तार

इस समय सबसे गरम मुद्दा अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत में वापसी है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर अपने अमेरिकी समकक्ष एंटनी ब्लिंकन के साथ लगातार इस मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं। ताजा हालात को लेकर दोनों की गुरुवार को भी चर्चा हुई है। भारत के सामने दो सबसे अहम मुद्दे हैं। पहला, यह कि अफगानिस्तान से अपने नागरिकों को सुरक्षित कैसे ले आएं और दूसरा, मध्य एशिया से लेकर अफगानिस्तान तक जुड़े अपने हित को कैसे सुरक्षित रखें। यहां चिंता कूटनीतिक, रणनीतिक साझेदारी दोनों की है।

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अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत के लिए मध्य एशिया का गेट-वे हैं। इसके बाद रास्ता ईरान के चाबहार से मिलता है। व्यापार, कारोबार, आवाजाही सबकुछ के लिए। यह मुकम्मल हो तो ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाकिस्तान समेत तमाम देशों से कारोबार, व्यापार, गैस पाइप लाइन, उर्जा सुरक्षा से जुड़े मसले बहुत आसान हो सकते हैं। लेकिन यह सब तभी भारत के हित में है जब अफगानिस्तान में हालात पिछले 10 सालों जैसे हों और इससे बेहतर होते जाएं। अभी तो सबसे बड़ी चिंता अफगानिस्तान के अंदरुनी हालात ही हैं।

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अफगानिस्तान (तालिबान)-पाकिस्तान का समीकरण ठीक नहीं

रक्षा और विदेश मंत्रालय के जानकार कहते हैं कि अफगानिस्तान (तालिबान) और पाकिस्तान का समीकरण भारत के हित में नहीं है। पाकिस्तान की नजर अफगानिस्तान के भूभाग को अपने हित में इस्तेमाल करने की है। इसका जरिया तालिबान बनेगा। विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि चीन से हमें उतना बड़ा खतरा नहीं है। रूस के साथ भी चिंता की बात नहीं है। लेकिन पाकिस्तान, अफगानिस्तान (तालिबान), चीन और रूस के बीच में बढ़ते समीकरण आने वाले समय में बड़ी चिंता पैदा कर सकते हैं। वह कहते हैं कि दुनिया को पता है कि पाकिस्तान की जमीन से भारत विरोधी आतंकी संगठन चलते हैं। वहां के आतंकी संगठनों से तालिबान के रिश्ते कोई नई बात नहीं है। रक्षा मंत्रालय और खुफिया तथा सुरक्षा एजेंसी से जुड़े सूत्र कहते हैं कि इसमें सीधे-सीधे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को भी जोड़ लेना चाहिए। आने वाले समय में इसे ध्यान में रखना सबसे अधिक महत्वपूर्ण होगा। ऐसा समझा जा रहा है कि एनएसए अजीत डोभाल रक्षा और विदेश मंत्रालय की चिंताओं को समझकर आगे की रणनीति तैयार कर रहे हैं।

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जिओपॉलिटिक्स ने बढ़ाई हैं चुनौतियां

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बिना किसी लाग लपेट के स्वीकार किया है कि बदली भूराजनैतिक (जिओपालिटिक्स) ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं को बढ़ाया है। जो राजनाथ सिंह खुलकर नहीं कहना चाहते, वह आतंकवाद और कट्टरपंथ को लेकर बढ़ रही सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं। जम्मू-कश्मीर में सीमा पार का आतंकवाद लगातार नए तरीके से चुनौती पेश कर रहा है। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी लगातार घुसपैठ की फिराक में हैं। इन आतंकी संगठनों का संबंध लश्कर-ए-जांघवी, हक्कानी नेटवर्क से है। सभी के तार अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान के आकाओं से जुड़ते हैं। तालिबान ने अफगानिस्तान में जितनी बढ़त और मजबूती बनाई है उसके समानांतर पंजशीर घाटी (ताजिकिस्तान मूल के लोगों की संख्या है) में सक्रिय नॉदर्न अलायंस, हजारा कम्युनिटी के लड़ाके, पश्तो, बलोच या फिर हेरात के शेर कहे जाने वाले इस्माइल खान, मजार-ए-शरीफ के मार्शल अब्दुल रशीद दोस्तम की सेना कमजोर हुई है।

पंजशीर की घाटी के लड़ाकों में प्राकृतिक घेरेबंदी के कारण थोड़ी ताकत है। यहां के बड़े नेताओं में अहमद मसूद, खुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित करने वाले उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह और मोहम्मद खान हैं। लेकिन इसी के साथ करीम खलीली, अफगानिस्तान के सीईओ अब्दुल्ला अब्दुल्ला, अब्दुल राशिद दोस्तम, मोहम्मद मोहाकिक, अब्दुल कादिर, आसिफ मोहसेनी के गुट को अपनी दिशा तय करनी है। ऐसे में तालिबान के मजबूत होने पर अफगानिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथ और आतंकवाद दोनों को शह मिल सकती है। पाकिस्तान के संगठन इसका लाभ ले सकते हैं और भारत जैसे देशों के लिए नशे के कारोबार से लेकर सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा सकते हैं।

अमेरिका और रूस दोनों को साधने की चुनौती

शीत युद्ध के दौर में भारत को रूस से काफी मदद मिलती रही। विश्वसनीय सामरिक साझीदार देश का दर्जा। 90 के दशक के बाद स्थितियां तेजी से बदली और साल 2000 में भारत ने अमेरिका के साथ संबंधों को तेजी से आगे बढ़ाया। 2005 में अमेरिका के साथ परमाणु करार के प्रयास ने धीरे-धीरे भारत और अमेरिका को सामरिक साझीदार देश के तौर पर लाकर खड़ा कर दिया। भारत ने अपने रक्षा हथियारों की निर्भरता को काफी हद तक मिला दिया। रूस के साथ-साथ इस्राइल, अमेरिका, यूरोपीय देश प्रमुख हो गए। इसके सामानांतर रूस से कुछ दूरी बनती गई। रूस ने अमेरिका को जवाब देने के लिए चीन, चीन के सहयोग से पाकिस्तान और ईरान सीरिया के साथ अपने करीबी संबंधों को बढ़ाना तेज किया है। अमेरिका के दबाव में भारत ने ईरान से अपने संबंधों से थोड़ा समझौता किया। रूस अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान को एक स्टेक होल्डर के रूप में ले रहा है। पाकिस्तान के ही इशारे पर तालिबान के नेता चीन की यात्रा कर आए। हालांकि भारत, चीन और रूस के बीच में एससीओ, ब्रिक्स, आरआईसी जैसे तीन फोरम हैं। लेकिन फिर भी रूस अफगानिस्तान में शांति बहाली और वार्ता के मामले में भारत की भूमिका को बहुत सीमित मानता है।

भारत ने अमेरिका के साथ-साथ आस्ट्रेलिया, जापान के सहयोग से बने क्वैड फोरम को अहमियत दी है। क्वैड के नाम से चीन चिढ़ता है। रूस खुश नहीं रहता। इसके कुछ संकेत चीन द्वारा लद्दाख क्षेत्र में भारत की परेशानी बढ़ाने के दौरान देखे गए। कूटनीति के जानकार मानते हैं कि रूस ने इसमें अपनी परंपरागत भूमिका निभाने से परहेज किया। जबकि अमेरिका के साथ परमाणु करार के समय वह चीन पर दबाव बनाने के लिए भारत के साथ खड़ा हुआ था। समझा जाता है कि चीन और पाकिस्तान दोनों आपसी गठजोड़ में इसका लाभ उठा सकते हैं। इस तरह से पहली बार क्षेत्रीय, द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के केन्द्र में भारत के सामने रूस और अमेरिका को एक साथ साधने की चुनौती मानी जा रही है।

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