अफगान संकट: क्या ब्लिंकन, डोभाल और जयशंकर की तिकड़ी ढूंढेगी इलाज? जानकारों ने कही यह बात
-'सुपर पॉवर' अमेरिका ने अफगानिस्तान में मैदान छोड़ दिया है।
- तालिबान को पाकिस्तान दे रहा है खुलकर साथ
- पाकिस्तान, चीन, रूस, ईरान, तुर्की पर टिकी निगाहें
- रूस, तालिबान, पाकिस्तान, चीन चाहते हैं कि सत्ता छोड़ें राष्ट्रपति गनी
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विस्तार
अफगानिस्तान के हालात के आगे अमेरिका घुटने टेक चुका है। उसने अपनी फौज वापस बुला ली है। वहीं तालिबान ने अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज होने के लिए लड़ाई तेज कर दी है। अफगानिस्तान के हालात को देखते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन भारत आए हैं। ब्लिंकन ने पीएम मोदी, विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की है। वे एनएसए अजीत डोभाल से भी मिले।
जयशंकर व उनके बीच तालिबान, अफगानिस्तान और खासकर इन इलाकों की क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर विस्तार से चर्चा हुई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ब्लिंकन, जयशंकर व डोभाल मिलकर अफगान संकट का इलाज ढूंढ़ने का प्रयास करेंगे? इस बारे में जानकारों की अलग राय है।
भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारी, राजनयिक और कूटनीति के जानकारों को अभी अफगानिस्तान में पैदा हो रहे संकट का कोई सटीक समाधान नजर नहीं आ रहा है। एक संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी का कहना है कि अफगानिस्तान की कोई भी तस्वीर साफ होने में तीन-चार महीने या इससे ज्यादा भी लग सकते हैं। राजनयिक भी इसका एक सीधा और सधा सा जवाब देते हैं कि भारत अफगानिस्तान के सभी स्टेक होल्डरों के सीधे संपर्क में है। हम हालात पर नजर बनाए हैं और भारतीय हितों की रक्षा के लिए भारत सरकार प्रतिबद्ध है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची भी इसी तरह का कूटनीतिक जवाब दे देते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ उनके चेहरे पर इस बयान के पीछे की जटिलताएं भी साफ नजर आती हैं। मंत्रालय के अधिकारी मान रहे हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान अब धीरे-धीरे अपने हमले और क्षेत्रों पर कब्जा बढ़ा रहा है। तालिबान का सीधे और परोक्ष रूप से संबंध हक्कानी नेटवर्क, पाकिस्तान से संचालित होने वाले संगठन जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा से भी है।
पाकिस्तान कर रहा तालिबान की मदद
सुरक्षा और खुफिया सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान की तरफ से तालिबान को संभावित सहायता दी जा रही है। उसकी सीमा से हजारों लोग अफगानिस्तान में जाते देखे गए हैं। इस जटिल परिस्थिति में अभी राजनयिकों को भी समझ में नहीं आ रहा है कि विदेश मंत्री ब्लिंकन अपने समकक्ष एस जयशंकर को कौनसा मंत्र देकर जाएंगे।
तालिबान, रूस, चीन,पाकिस्तान की एक मांग राष्ट्रपति गनी को हटाओ
रूस अफगानिस्तान के राष्ट्रपति गनी को अमेरिका का एजेंट मानता है। रूस चाहता है कि अफगानिस्तान में शांति की स्थापना के लिए राष्ट्रपति गनी को पद से हट जाना चाहिए। तालिबान भी अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया की स्थापना तथा स्थिरता के लिए राष्ट्रपति गनी को पद से हटाने की मांग कर रहा है। तालिबान के नेता मौलवी हिबैतुल्लाह की भी मांग यही है। रूस के अलावा पाकिस्तान, चीन भी राष्ट्रपति गनी को पद से हटाने का मौन समर्थन दे रहे हैं। इन देशों के अनुसार गनी के हटते ही अफगानिस्तान में स्थितियां तेजी से बदलने लगेंगी।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय मामले के जानकारों का कहना है कि गनी के सत्ता से हटने का अर्थ तालिबान को एक विजय और मिलना है। इसके बाद स्थाई अफगानिस्तान के निर्माण में पेचीदगियां काफी बढ़ सकती हैं। जबकि इसके उलट अमेरिका चाहता है कि राष्ट्रपति गनी पद पर बने रहें। अमेरिका ने अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता की स्थापना के लिए कई देशों से संपर्क किया है, लेकिन अभी इसकी कोई ठोस रूपरेखा सामने नहीं आई है। वहीं पाकिस्तान ने अब खुलकर तालिबान के साथ मिलकर खेलना शुरू कर दिया है।
अफगानिस्तान में गृह युद्ध की संभावना से इनकार नहीं
भारतीय राजनयिकों को धीरे-धीरे अफगानिस्तान गृहयुद्ध की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है। पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि अफगानिस्तान में सीरिया जैसे हालात भी पैदा हो सकते हैं और गृहयुद्ध जैसी स्थिति भी बन सकती है। विदेश मामलों के जानकार वष्ठि पत्रकार रंजीत कुमार का कहना है कि अफगानिस्तान में धीरे धीरे अस्थिरता बढ़ रही है। शांति वार्ता प्रक्रिया में तालिबान के नेता हिस्सा जरूर ले रहे हैं, लेकिन वे कोई विश्वास का वातावरण पैदा नहीं कर पा रहे हैं। उनके हमले और क्षेत्र पर कब्जे की कोशिश जारी है। इसलिए गृहयुद्ध की संभावना है। इस तरह के हालात अफगानिस्तान और वहां की जनता के हितों के खिलाफ होगा।
क्या हैं भारत के सामने पेचीदगियां?
चीन तालिबान से संबंधों के लिए पाकिस्तान और रूस पर निर्भर है। रूस ने तालिबान से संपर्क के प्रयास तेज कर दिए हैं। रूस, चीन, पाकिस्तान साझा प्रयास कर रहे हैं। ईरान इस मुहिम में शामिल है और तुर्की ने पाकिस्तान से साथ संबंधों का लाभ उठाना शुरू कर दिया है। सुरक्षा, खुफिया और सामरिक विशेषज्ञों से मिल रही जानकारी के मुताबिक तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान समेत अन्य को अफगानिस्तान में अस्थिरता बढ़ने पर शरणार्थी की संख्या बढ़ने तथा सुरक्षा का खतरा दिखाई दे रहा है। रूस भी इसको लेकर कुछ हद तक चिंतित है। यह नई परिस्थिति भारत को मध्य एशिया तक जाने, कारोबार, व्यापार करने में संकट का अनुभव करा रही है। इसकी एक बड़ी वजह पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका भी है।
नई दिल्ली में कूटनीति के जानकार इस संभावना को लेकर चिंतित हैं। बताते हैं कि इस्लामिक आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा दोनों पाकिस्तान की धरती से संचालित होते हैं। इनका सीधा संबंध हक्कानी नेटवर्क से है। हक्कानी का परोक्ष रूप से संपर्क तालिबान से है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई भी तालिबान को शह देती रही है और वहां उसकी पैठ है। इस तरह से सुरक्षा संबंधी चिंता भारत की भी बढ़ सकती है। इसका एक बड़ा कारण अफगानिस्तान की शांति वार्ता में रूस, चीन जैसे देशों द्वारा भारत को विशेष महत्व न देना भी है। बताते हैं अभी सभी की अपनी-अपनी चिंताएं हैं और उसके समाधान के लिए ये देश रास्ता बनाने में जुटे हैं।
अफगानिस्तान की गनी सरकार
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान की गनी सरकार के पास भारत से प्रशिक्षण पाए अफगान सुरक्षा बल हैं। तीन लाख के करीब फौज है, लेकिन वित्तीय संसाधन, हथियार, सुरक्षा और लड़ाई के साधन उनके पास काफी सीमित है। अफगान फौज को तालिबान से निबटने के लिए बड़ी संख्या में हेलिकाप्टर, हवाई हमले की क्षमता, गोला-बारुद तथा रसद सामग्री चाहिए। यह सब उपलब्ध होना, वहां पहुंचना बहुत आसान नहीं है। इसके लिए अमेरिका का सहयोग और भागीदारी भी अभी कोई सशक्त रूप नहीं ले पा रही है। दूसरे पाकिस्तान ने भी अमेरिका को अफगानिस्तान के मामले में पहले जैसा सहयोग करने से हाथ पीछे खींच लिया है।
फिर भी भारत की उम्मीद कायम
इन गुटों को चाहिए सत्ता में भागीदारी
अफगानिस्तान में तालिबान और हिबैतुल्ला ब्रदर्स, मुल्ला ब्रदर्स, मुल्ला याकूब, दोस्तम, गुलबुद्दीन हिकमतयार समेत अन्य गुटों को भी राजनीतिक सत्ता में भागीदारी चाहिए। इसलिए काफी कुछ चीजें तालिबान की पिछली सत्ता की तरह नहीं होंगी। काबुल, जलालाबाद जैसे प्रांतों तक तालिबान को पहुंचना, सत्ता पर अधिकार करना बहुत आसान नहीं होगा।