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आधार-वोटर आईडी लिंक: केंद्र सरकार ने क्यों दिया प्रस्ताव, मतदान प्रक्रिया होगी आसान या मतदाताओं के लिए कोई खतरा, जानें सबकुछ
Mon, 20 Dec 2021 02:38 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 20 Dec 2021 02:38 PM IST
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आधार कार्ड को वोटर कार्ड से लिंक कराने से जुड़ा विधेयक पास।
- फोटो :
अमर उजाला/हिमांशु भट्ट
विस्तार
केंद्र सरकार ने सोमवार को चुनाव सुधार से जुड़ा एक अहम विधेयक लोकसभा में पास करा लिया है। 'चुनाव अधिनियम संशोधन विधेयक 2021' को पास कराने के बाद लोकसभा मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दी गई। इस सुधार से संबंधित प्रस्ताव चुनाव आयोग (इलेक्शन कमीशन) ने कानून मंत्रालय को दिया था। किरन रिजिजू के नेतृत्व वाले कानून मंत्रालय ने इसे मंजूरी देने के बाद विधेयक के रूप में पेश करने का निर्णय लिया। इस प्रस्ताव के तहत चुनाव आयोग ने मतदाताओं के वोटर आईडी कार्ड्स को उनके आधार कार्ड से जोड़ने की योजना सामने रखी है। इसके अलावा 18 साल से ऊपर के लोगों को खुद को वोटर के तौर पर जोड़ने के लिए एक ही साल में कई मौके देने का भी प्रावधान रखा गया है।केंद्र सरकार की तरफ से यह विधेयक ऐसे समय में पेश किया जा रहा है, जब उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर के विधानसभा चुनावों में छह महीने से भी कम का समय बचा है। इसके अलावा वोटर आईडी कार्ड को आधार कार्ड से जोड़े जाने के कदम को कई विशेषज्ञों ने मतदाताओं के लिए खतरा बताया है। ऐसे में अमर उजाला आपको बता रहा है कि आखिर इस विधेयक पर केंद्र सरकार की ओर से चुनाव सुरक्षा के क्या तर्क दिए जा रहे हैं और विपक्ष ने इसे मतदाताओं की निजता के हनन से क्यों जोड़ा है...
आधार कार्ड को वोटर आईडी से जोड़ने का विचार क्यों?
पिछले साल मार्च में केंद्रीय कानून मंत्रालय की तरफ से संसद को बताया गया था कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को आधार नंबर के साथ जोड़ने का प्रस्ताव दिया है। इससे एक ही व्यक्ति, अलग-अलग स्थानों पर वोटर लिस्ट में अपना नाम नहीं जुड़वा सकेंगे, जिससे चुनाव में फर्जीवाड़ा और डुप्लिकेशन होने के मौके सीमित हो जाएंगे। इसके लिए लोक प्रतिनिधित्व कानून, 1951 और आधार एक्ट, 2016 दोनों में ही बदलाव किया जाएगा। हालांकि, मतदाताओं के लिए आधार और वोटर आईडी को जोड़ने का फैसला अनिवार्य नहीं बल्कि वैकल्पिक होगा।
वोटर आईडी को आधार से जोड़े जाने पर विवाद क्या हैं?
चुनाव विशेषज्ञों और स्वतंत्र थिंक टैंक्स के मुताबिक, आधार और वोटर आईडी कार्ड को लिंक किए जाने के कुछ फायदों के साथ नुकसान भी हैं। दरअसल, सरकार की ओर से दिए गए प्रस्ताव में यह अब तक साफ नहीं है कि वोटर आईडी के डेटाबेस और आधार के डेटाबेस के बीच कितना डेटा साझा किया जाएगा और इसके तरीके क्या होंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विधेयक किसी एजेंसी द्वारा मतदाताओं के डेटा लिए जाने से जुड़े प्रतिबंधों का जिक्र भी नहीं करता। हम पांच बिंदुओं में आपको समझा रहे हैं कि वोटर आईडी और आधार लिंकिंग में विशेषज्ञ किन खतरों के बारे में आगाह कर रहे हैं...
1. अभी मतदाताओं का चुनावी डेटा चुनाव आयोग के डेटाबेस में सुरक्षित रहता है। इसके सत्यापन के अपने तरीके हैं और यह सरकार के दूसरे डेटाबेस से बिल्कुल अलग है। यानी अगर आधार और चुनावी डेटाबेस को जोड़ा जाता है, तो चुनाव आयोग और आधार के डेटाबेस एक-दूसरे के लिए आसानी से मुहैया होंगे।
2. इस तरह की जानकारी अलग-अलग डेटाबेस में होने से इसके गलत इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। खासकर एक डेटा सुरक्षा कानून के अभाव में यह निजता के हनन से जुड़ा मामला भी बन सकता है।
3. विशेषज्ञों ने संभावना जताई है कि आधार और वोटर आईडी के बीच साझा डेटा का इस्तेमाल कुछ लक्षित (टारगेटेड) मतदाताओं की जानकारी हासिल करने में भी किया जा सकता है। यह काम खुद सरकार, उसकी एजेंसियां या हैकर्स की ओर से किया जा सकता है। इसके चलते वोटर्स के राजनीतिक विज्ञापनों का शिकार बनने और उन्हें मताधिकार से वंचित रखने जैसी घटनाएं भी सामने आने की संभावना है।
4. सरकार की ओर से आधार और वोटर आईडी को जोड़ने की एक सबसे बड़ी वजह यह है कि वह देश के सभी प्रवासी कामगारों को मतदान प्रक्रिया से जोड़े रखना चाहती है। ताकि वे अपने अपडेटेड आधार कार्ड के जरिए रोजगार वाली जगह से भी वोटिंग में हिस्सा ले सकें। हालांकि, चुनाव आयोग और आधार के बीच निर्बाध डेटा शेयरिंग का एक इस्तेमाल प्रवासी मतदाताओं के मूवमेंट यानी चाल-चलन की निगरानी के लिए होने का शक भी जताया गया है।
5. इतना ही नहीं मतदाताओं की जानकारी और आधार कार्ड के डेटाबेस की लिंकिंग से धोखेबाजी की संभावना भी बढ़ सकती है। दरअसल, आधार कार्ड के देशभर में इस्तेमाल होने की वजह से मौजूदा समय में यही पहचान पत्र हर तरह के सत्यापन में इस्तेमाल किया जाता है। मतदाताओं के सत्यापन के लिए भी आगे आधार को ही मूलभूत पहचान पत्र माने जाने की संभावना है। ऐसे में नकली या छेड़छाड़ वाले आधार कार्ड्स से वोटर आईडी के सत्यापन किए जाने से धोखेबाजी की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
क्या गलत इस्तेमाल की संभावनाओं से जुड़े कुछ उदाहरण भी हैं?
इन सभी तथ्यों को लेकर आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के सीनियर एनालिस्ट विभव मारीवाला और स्वतंत्र विश्लेषक प्रखर मिश्र की ओर से कुछ उदाहरण भी पेश किए गए हैं। जैसे 2020 में ही यूआईडीएआई ने माना था कि उसने करीब 40 हजार फेक आधार कार्ड रद्द किए हैं। यह पहली बार था जब यूआईडीएआई ने अपने सिस्टम में धोखेबाजी होने की बात कबूली थी।
इसके अलावा आधार कार्ड की जानकारी के जरिए लोगों की लक्षित निगरानी (टारगेटेड सर्विलांस) के मामले भी सामने आए हैं। आईडीएफसी के मुताबिक, आंध्र प्रदेश में जाति और धर्म जैसे मानदंडों का इस्तेमाल कर राज्य सरकार द्वारा संचालित एक वेबसाइट पर करीब 51.67 लाख परिवारों की लोकेशन को मनचाहे तरीके से ट्रैक किया जा सकता है।
इतना ही नहीं तेलंगाना में वोटर लिस्ट से फर्जी वोटरों को हटाने की कोशिश के दौरान 22 लाख असल वोटरों के नाम भी लिस्ट से हट गए थे। इनमें बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा का नाम भी शामिल था। तब तेलंगाना राज्य चुनाव आयोग ने एक आरटीआई के जवाब में कहा था कि उसने वोटर लिस्ट में सुधार के लिए आधार कार्ड से जुड़े एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया था, जिसकी वजह से लाखों लोगों के सार्वभौमिक मताधिकार (यूनिवर्सल सफरेज) का उल्लंघन हुआ था। जहां तेलंगाना में यह कदम गलती से उठा था, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारें इसका इस्तेमाल मनमाने तरीके से कर सकती हैं।
अब जानें- केंद्र की तरफ से और किन बदलावों का है प्रस्ताव?
लोकसभा में पेश हुए चुनाव सुधार विधेयक में केंद्र सरकार ने तीन और सुधार पेश किए हैं। यह प्रस्ताव हैं-
1. पेश किए गए विधेयक में प्रावधान है कि अब युवा चाहें तो हर साल चार अलग-अलग तिथियों पर मतदाता के रूप में अपना नामांकन करा सकते हैं। अब तक, हर साल एक जनवरी को या उससे पहले 18 साल के होने वालों को ही मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने की अनुमति है। यानी दो जनवरी को 18 साल के होने वाले लोगों को मतदाता बनने के लिए अगले साल तक का इंतजार करना पड़ता है। इसके लिए सरकार ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के सेक्शन 14(बी) में बदलाव का प्रस्ताव रखा है, ताकि नई कटऑफ तारीखों को 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्तूबर के लिए तय की जा सकें।
2. इसके अलावा विधेयक में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की भाषा में भी बदलाव का प्रावधान है, ताकि सशस्त्र सेना बल में सेवा दे रही महिला के पति को भी सर्विस वोटर के तौर पर रजिस्टर करने का मौका मिल सके। इसी लिए चुनावी कानून को जेंडर न्यूट्रल बनाने का प्रस्ताव पेश किया गया है। गौरतलब है कि पहले सशस्त्र बलों में शामिल सैनिकों की 'पत्नियों' को ही सर्विस वोटर बनाए जाने का प्रावधान था, लेकिन अब सुधार के तहत पत्नी शब्द को 'जीवनसाथी' किए जाने की योजना है, जिससे सैन्यबल में शामिल महिलाओं के पति को भी यह अधिकार मिल जाएगा।
3. पेश किए गए विधेयक में स्कूलों को मतदान केंद्र के रूप में लेने की आपत्ति खारिज करते हुए चुनाव आयोग को यह अधिकार मिल जाएगा कि वे चुनाव संचालन के लिए किसी भी परिसर को चुनावों तक ले सकते हैं।