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क्या इरादे "अटल" रहेंगे
डॉ. विनोद पुरोहित
Updated Sat, 18 Aug 2018 06:08 PM IST
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Atal Bihari Vajpayee
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अटलजी से कभी रूबरू नहीं हुआ लेकिन लगता था कि वे बेहद करीबी और अपने से हैं। उनकी बात-व्यवहार, भाव-भंगिमा, रहन सहन और भाषा- भूषा में गजब का देसजपना, अपनापा और आकर्षण था। जैसे शिखर को जानने-समझने के लिए उस पर चढ़ना जरूरी नहीं, उसकी ऊंचाई और सम्मोहकता दूर से उसके बुलंद इरादों को परिभाषित कर देती है।
अटलजी को देख, सुन और पढ़कर जाना-समझा कि कुछ बात है जो उन्हें जमात से जुदा रखती है। इस पर उनका अटल बांकपन और बेबाकपन उन्हें अद्वितीय बनाता था।
अब वे चले गए लेकिन याद बहुत आएंगे। सभाओं में जब भी "जय श्री राम" के नारे लगेंगे तो याद आएगा कि अटलजी अब नहीं और उनके जैसा साहस किसी में नहीं, जो फटकारते हुए कहा दे- "काम ना धाम, जय श्री राम"...और मज़ाल है कि कोई फिर वैसा नारा लगा दे।
अटलजी तब भी बहुत याद आए पहलू खान और अकबर जैसे लोगों को गो रक्षा के नाम पर भीड़ ने पीट पीटकर मार डाला था। तब अटलजी जीवित थे लेकिन बीमार थे, कसमसा कर रह गए होंगे। मुखर होते तो तय था वे ऐसी हिंसक भीड़ और उन्हें पनाह देने वालों को कभी नहीं बख्शते।
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अंत्येष्टि के दिन भी उनकी आत्मा को कितना आघात लगा होगा, जब उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा जाहिर करने आए अग्निवेश को भीड़ ने दौड़ा कर पीटा। विधि के विधान के आगे उनका वश नहीं चला वरना तत्काल झिड़की देते हुए कहते- इंसानियत के दुश्मनों, यह अच्छी बात नहीं है। अटलजी तब भी बहुत याद आएंगे जब कभी सरकारें मनमानी पर उतर आएंगी तब उन्हें कौन अहसास कराएगा और ताकीद करेगा कि राष्ट्र धर्म का पालन करना चाहिए।
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अटलजी को देख, सुन और पढ़कर जाना-समझा कि कुछ बात है जो उन्हें जमात से जुदा रखती है। इस पर उनका अटल बांकपन और बेबाकपन उन्हें अद्वितीय बनाता था।
अब वे चले गए लेकिन याद बहुत आएंगे। सभाओं में जब भी "जय श्री राम" के नारे लगेंगे तो याद आएगा कि अटलजी अब नहीं और उनके जैसा साहस किसी में नहीं, जो फटकारते हुए कहा दे- "काम ना धाम, जय श्री राम"...और मज़ाल है कि कोई फिर वैसा नारा लगा दे।
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अटलजी तब भी बहुत याद आए पहलू खान और अकबर जैसे लोगों को गो रक्षा के नाम पर भीड़ ने पीट पीटकर मार डाला था। तब अटलजी जीवित थे लेकिन बीमार थे, कसमसा कर रह गए होंगे। मुखर होते तो तय था वे ऐसी हिंसक भीड़ और उन्हें पनाह देने वालों को कभी नहीं बख्शते।
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अंत्येष्टि के दिन भी उनकी आत्मा को कितना आघात लगा होगा, जब उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा जाहिर करने आए अग्निवेश को भीड़ ने दौड़ा कर पीटा। विधि के विधान के आगे उनका वश नहीं चला वरना तत्काल झिड़की देते हुए कहते- इंसानियत के दुश्मनों, यह अच्छी बात नहीं है। अटलजी तब भी बहुत याद आएंगे जब कभी सरकारें मनमानी पर उतर आएंगी तब उन्हें कौन अहसास कराएगा और ताकीद करेगा कि राष्ट्र धर्म का पालन करना चाहिए।
Atal Bihari Vajpayee
बीमारी के दौरान मौन अटलजी तब भी बहुत याद आए जब संसद में मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाई गईं। नैन मटक्का और नाना तरह की भाव भंगिमा से उसका जवाब, यह सब देख क्या बेबाक वाजपेयी चुप रह पाते? गलत तरीके से हासिल सत्ता को चिमटे से भी ना छूने का संकल्प लेने वाले अटलजी फौरन खड़े होकर ना सिर्फ झिड़कते और गलती का अहसास कराते बल्कि बताते कि यह आजादी पुरुखों के बलिदान का नतीजा है।
संसद लोकतंत्र का मंदिर है, इसकी मर्यादा रखो और सम्मान करो। इसमें बैठकर देशहित में चिंतन और चर्चा ना कर समय और जनता का पैसा बर्बाद करना-अच्छी बात नहीं है।
ऐसे कई प्रसंग हुए और होंगे, जब वे बहुत याद आए और आते रहेंगे। अटलजी का जाना भारतीय राजनीति और देश के लिए बड़ी क्षति है।
हालांकि, वक्त सारे घाव भर देता है लेकिन यह तो तय उनके जाने के साथ राजनीति की रवानगी-लय और रचनात्मकता भी चली गई। हर सवाल का उसी अंदाज में जवाब देना उन्हें अलग बनाता था। चाहे वो कितना ही गंभीर मसला क्यों ना हो, संजीदगी के साथ रोचक समाधान पेश करना उनके अटल इरादों को जाहिर करता था। कमाल की बात कि इस श्रेष्ठ कवि ने अपनी कविताओं में कभी राजनीति और वाद को नहीं आने दिया।
इसी प्रकार सियासत से अपने कवि हृदय सदा दूर रखा। यह उनका अटल व्यक्तित्व का असर है।
अब वे नहीं है...उनकी भी तस्वीरें दफ्तरों-दुकानों में सज जाएंगी, कई योजनाएं उनके नाम पर शुरू होंगी लेकिन देखना होगा कि उनके चाहने वाले कितना उनके विचारों को जीते हैं और अपने व्यवहार में लाते हैं। सत्ता, संगठन और सियासत की भी यह जिम्मेदारी होगी कि अटल सिर्फ योजनाओं के नामकरण तक ना सिमट जाएं, उनके विचारों और हौसलों में भी 'अटल' रहे।
संसद लोकतंत्र का मंदिर है, इसकी मर्यादा रखो और सम्मान करो। इसमें बैठकर देशहित में चिंतन और चर्चा ना कर समय और जनता का पैसा बर्बाद करना-अच्छी बात नहीं है।
ऐसे कई प्रसंग हुए और होंगे, जब वे बहुत याद आए और आते रहेंगे। अटलजी का जाना भारतीय राजनीति और देश के लिए बड़ी क्षति है।
हालांकि, वक्त सारे घाव भर देता है लेकिन यह तो तय उनके जाने के साथ राजनीति की रवानगी-लय और रचनात्मकता भी चली गई। हर सवाल का उसी अंदाज में जवाब देना उन्हें अलग बनाता था। चाहे वो कितना ही गंभीर मसला क्यों ना हो, संजीदगी के साथ रोचक समाधान पेश करना उनके अटल इरादों को जाहिर करता था। कमाल की बात कि इस श्रेष्ठ कवि ने अपनी कविताओं में कभी राजनीति और वाद को नहीं आने दिया।
इसी प्रकार सियासत से अपने कवि हृदय सदा दूर रखा। यह उनका अटल व्यक्तित्व का असर है।
अब वे नहीं है...उनकी भी तस्वीरें दफ्तरों-दुकानों में सज जाएंगी, कई योजनाएं उनके नाम पर शुरू होंगी लेकिन देखना होगा कि उनके चाहने वाले कितना उनके विचारों को जीते हैं और अपने व्यवहार में लाते हैं। सत्ता, संगठन और सियासत की भी यह जिम्मेदारी होगी कि अटल सिर्फ योजनाओं के नामकरण तक ना सिमट जाएं, उनके विचारों और हौसलों में भी 'अटल' रहे।