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पसमांदा मुसलमानः मुस्लिमों की 85 प्रतिशत आबादी, लेकिन भागीदारी में सबसे पीछे, कैसे दूर होगी ये विषमता
Sun, 03 Oct 2021 09:14 PM IST
अमित शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमित शर्मा
Updated Sun, 03 Oct 2021 09:14 PM IST
सार
सच्चर कमेटी ने भारतीय मुसलमानों को तीन वर्गों में बांटा था। सबसे ऊपर अशरफ मुसलमान हैं। इनमें सैयद, शेख, मुगल और पठान आते हैं जो अपना मूल ईरान, ईराक या अन्य अरब देशों में देखते हैं। ये आज भी समाज में अपने को सबसे ऊपर मानते हैं।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मुस्लिम समुदाय में पिछड़े वर्ग के पसमांदा मुसलमान अब सत्ता से लेकर सामाजिक-राजनीतिक संगठनों में अपनी ज्यादा भागीदारी को लेकर मुखर हो रहे हैं। पसमांदा मुसलमानों का आरोप है कि कुल मुसलमानों में उनकी भागीदारी 85 प्रतिशत है, इस अनुसार सत्ता या सामाजिक-राजनीतिक संगठनों में उनकी भागीदारी भी इसी के अनुरूप होनी चाहिए, लेकिन मुसलमानों की भागीदारी के नाम पर केवल उच्च वर्ग के मुसलमानों को ही भागीदारी दे दी जाती है, जिससे पिछड़े वर्गों के मुसलमान पिछड़े ही रह जाते हैं। पसमांदा मुसलमानों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की है कि वे उनके वर्ग की भागीदारी बढ़ाने की योजना पर काम करें।
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सच्चर कमेटी ने भारतीय मुसलमानों को तीन वर्गों में बांटा था। सबसे ऊपर अशरफ मुसलमान हैं। इनमें सैयद, शेख, मुगल और पठान आते हैं जो अपना मूल ईरान, ईराक या अन्य अरब देशों में देखते हैं। ये आज भी समाज में अपने को सबसे ऊपर मानते हैं। दूसरे वर्ग में अजलफ मुसलमान हैं जो छोटे-मोटे कामकाज करने वाले वर्ग से आते हैं। तीसरे वर्ग में अरजल मुसलमान आते हैं जो सामाजिक तौर पर सबसे पिछड़े वर्ग से आते हैं। अजलफ और अरजल मुसलमानों को मिलाकर कुल मुसलमानों का 85 प्रतिशत होता है और सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी में इन्हें भी इतनी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
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लेकिन पसमांदा मुसलमानों का दावा है कि कुल मुसलमानों की भागीदारी में सबसे ज्यादा हिस्सा अशरफ मुसलमानों का ही होता है, जबकि आबादी में उनकी हिस्सेदारी सबसे कम है। एक आंकड़े के अनुसार 14वीं लोकसभा तक मुसलमानों के 400 प्रतिनिधि संसद तक पहुंच चुके हैं, लेकिन इनमें से 340 अशरफ मुसलमानों में से रहे हैं, जबकि 85 प्रतिशत आबादी के बाद भी अजलफ-अरजल मुसलमानों के केवल 60 नेता ही संसद तक पहुंच सके। पसमांदा मुसलमानों की मांग है कि अब सरकार और मुस्लिम राजनीतिक संगठनों को अपने अंदर इन अजलफ-अरजल मुसलमानों की भागीदारी बढ़ानी चाहिए।
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पसमांदा मुसलमानों के संगठन ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हाफिज गुलाम सरवर ने अमर उजाला से कहा कि आदर्श के तौर पर इस्लाम में जातिवाद नहीं है, लेकिन व्यवहार के तौर पर मुस्लिम समुदाय में भी भारी जातिवाद है। उच्च वर्ग के मुस्लिम नेता मुसलमानों के नाम पर आंदोलन तो करते हैं, लेकिन जब भागीदारी की बात आती है तो वे केवल उच्च वर्गे के लोगों को ही भागीदारी देने का काम करते हैं।
उन्होंने कहा कि केवल नौकरियों में भागीदारी की ही बात नहीं है, मुस्लिम समुदाय के संगठनों - जैसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीअत-उलेमा-ए-हिंद में भी केवल उच्च वर्ग के मुसलमान ऊंचे पदों पर बैठे हुए हैं। इन संगठनों में भी पसमांदा मुसलमानों को पर्याप्त भागीदारी नहीं दी जाती है। उन्होंने कहा कि जब आंदोलन की बात होती है तो इसी वर्ग के लोगों को भारी संख्या में बुलाकर आंदोलन सफल कराया जाता है, लेकिन जब पदों पर जिम्मेदारी देने की बात आती है तो उच्च वर्ग के मुसलमानों को ही भागीदारी दी जाती है।
ऑल इंडिया जमाते सलमानी के राष्ट्रीय अध्यक्ष खैरुल बशर ने कहा कि पसमांदा मुसलमान अपने खान-पान रहन-सहन में पूरी तरह से भारतीय हैं। हमारे यहां घरों में हिंदू परिवारों की तरह आज भी शादी विवाह के अवसर पर मेंहदी-हल्दी जैसी रस्में निभाई जाती हैं तो पहनावे में हमारे घरों की महिलाएं साड़ी पहनना ज्यादा पसंद करती हैं। इस अर्थ में हमारे परिवार भारतीय संस्कृति के ज्यादा करीब हैं। लेकिन जब सत्ता-राजनीति में भागीदारी की बात आती है तो दूसरे वर्गों के लोगों को प्राथमिकता दी जाती है।
2012 के यूपी विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर चुनावी मैदान में उतर चुके शकील आलम सैफी ने कहा कि अशरफ मुसलमान, जो अपना मूल ईरान-ईराक में देखते हैं, वे समाज में सबसे ऊपर हमारे प्रतिनिधि बनकर बैठे हैं, जबकि भारतीय मूल के मुसलमान जो परिवर्तित होकर मुसलमान बने हैं, उनकी कोई कीमत नहीं की जाती है। उन्होंने कहा कि हमारे वोट किसी दल के बंधक नहीं हैं। यदि भाजपा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए ज्यादा बेहतर कार्य योजना पेश करती है तो उनके समाज के लोगों का समर्थन भाजपा को भी जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहल करनी चाहिए।