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सातवें वेतन आयोग की सिफारिश और सामाजिक दायित्व रेलवे पर बोझ के लिए जिम्मेदार :पीयूष गोयल
Wed, 04 Dec 2019 07:05 PM IST
Trainee Trainee
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, नई दिल्ली
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Published by: Trainee Trainee
Updated Wed, 04 Dec 2019 07:05 PM IST
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Piyush Goyal
- फोटो : PTI
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रेलमंत्री पीयूष गोयल ने सातवें वेतन आयोग में बढ़े सैलरी और पेंशन समेत सामाजिक दायित्वों को रेलवे का बोझ जिम्मेदार बताया है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के मुताबिक भारतीय रेलवे की कमाई 10 साल पिछे चली गई है। पिछले वित्तीय वर्ष रेलवे का परिचालन अनुपात 100 रु कमाने के लिए लगभग 98 रु खर्च करने पड़े है।
रेलमंत्री ने बुधवार को लोकसभा में लिखित जवाब में कहा कि सातवां वेतन आयोग लागू होने के बाद से रेलवे कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर 22 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हो रहा है, जिसके वजह से वित्तीय असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सामाजिक दायित्वों के लिए कुछ ऐसे इलाकों नई लाइनों के निर्माण कर ट्रेन चलाई जा रही है जिससे नुकसान का सामना करना पड़ रहा है और इसमें फंड का बड़ा हिस्सा खर्च भी हो रहा है।
खर्च का रेलवे पर असर
प्रश्नकाल में पीयूष गोयल ने कहा सातवें वेतन आयोग लागू होने के बाद से रेलवे कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन पर 22 हजार करोड़ रुपये का अधिक खर्च हो रहा है। परिचालन के घाटा में इसका महत्वपुर्ण योगदान है। रेलवे साफ-सफाई, उपनगरीय ट्रेन चालने और गेज बदलाव पर भी काफी खर्च कर रहा है। उन्होंने कहा इन सभी खर्च से रेलवे पर असर पड़ता है।
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सामाजिक दायित्व और लाभकारी सेक्टर के लिए अलग हो बजट
रेलवे मंत्री ने कहा जब हम पूरे तस्वीर को देखते हैं तो सातवें वेतन आयोग से वेतन बढोतरी और सामाजिक दायित्व के तहत ट्रेनों को चलाने से परिचालन अनुपात एक साल में 15 पर्सेंट नीचे चला जाता है। रेलमंत्री ने कहा समय आ गया है कि हम सामाजिक दायित्वों पर खर्च और लाभकारी सेक्टर्स के लिए बजट को अलग करने की कोशिश करें।
कैग रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
परिचालन अनुपात के आंकड़े देखने से रेलवे की दयनीय स्थिती का पता लगाना बेहद आसान है और साफ साफ दिख रहा है की तमाम कोशिशों के बाद भी रेलवे को 2 फीसदी की भी कमाई नहीं हो पा रही है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रेल का परिचालन अनुपात वित्त वर्ष 2017-18 में 98.44 प्रतिशत रहने का मुख्य कारण पिछले वर्ष 7.63 प्रतिशत संचालन व्यय की तुलना में उच्च वृद्धि दर का 10.29 प्रतिशत होना है। इसमें बताया गया है कि वित्त वर्ष 2008-09 में रेलवे का परिचालन अनुपात 90.48 प्रतिशत था, जो 2009-10 में 95.28 प्रतिशत, 2010-11 में 94.59 प्रतिशत, 2011-12 में 94.85 प्रतिशत, 2012-13 में 90.19 प्रतिशत, 2013-14 में 93.6 प्रतिशत, 2014-15 में 91.25 प्रतिशत, 2015-16 में 90.49 प्रतिशत, 2016-17 में 96.5 प्रतिशत तथा 2017-18 में 98.44 प्रतिशत दर्ज किया गया।
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रेलमंत्री ने बुधवार को लोकसभा में लिखित जवाब में कहा कि सातवां वेतन आयोग लागू होने के बाद से रेलवे कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर 22 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हो रहा है, जिसके वजह से वित्तीय असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सामाजिक दायित्वों के लिए कुछ ऐसे इलाकों नई लाइनों के निर्माण कर ट्रेन चलाई जा रही है जिससे नुकसान का सामना करना पड़ रहा है और इसमें फंड का बड़ा हिस्सा खर्च भी हो रहा है।
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खर्च का रेलवे पर असर
प्रश्नकाल में पीयूष गोयल ने कहा सातवें वेतन आयोग लागू होने के बाद से रेलवे कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन पर 22 हजार करोड़ रुपये का अधिक खर्च हो रहा है। परिचालन के घाटा में इसका महत्वपुर्ण योगदान है। रेलवे साफ-सफाई, उपनगरीय ट्रेन चालने और गेज बदलाव पर भी काफी खर्च कर रहा है। उन्होंने कहा इन सभी खर्च से रेलवे पर असर पड़ता है।
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सामाजिक दायित्व और लाभकारी सेक्टर के लिए अलग हो बजट
रेलवे मंत्री ने कहा जब हम पूरे तस्वीर को देखते हैं तो सातवें वेतन आयोग से वेतन बढोतरी और सामाजिक दायित्व के तहत ट्रेनों को चलाने से परिचालन अनुपात एक साल में 15 पर्सेंट नीचे चला जाता है। रेलमंत्री ने कहा समय आ गया है कि हम सामाजिक दायित्वों पर खर्च और लाभकारी सेक्टर्स के लिए बजट को अलग करने की कोशिश करें।
कैग रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
परिचालन अनुपात के आंकड़े देखने से रेलवे की दयनीय स्थिती का पता लगाना बेहद आसान है और साफ साफ दिख रहा है की तमाम कोशिशों के बाद भी रेलवे को 2 फीसदी की भी कमाई नहीं हो पा रही है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रेल का परिचालन अनुपात वित्त वर्ष 2017-18 में 98.44 प्रतिशत रहने का मुख्य कारण पिछले वर्ष 7.63 प्रतिशत संचालन व्यय की तुलना में उच्च वृद्धि दर का 10.29 प्रतिशत होना है। इसमें बताया गया है कि वित्त वर्ष 2008-09 में रेलवे का परिचालन अनुपात 90.48 प्रतिशत था, जो 2009-10 में 95.28 प्रतिशत, 2010-11 में 94.59 प्रतिशत, 2011-12 में 94.85 प्रतिशत, 2012-13 में 90.19 प्रतिशत, 2013-14 में 93.6 प्रतिशत, 2014-15 में 91.25 प्रतिशत, 2015-16 में 90.49 प्रतिशत, 2016-17 में 96.5 प्रतिशत तथा 2017-18 में 98.44 प्रतिशत दर्ज किया गया।