76th Independence Day: सबसे जवां हम, बेरोजगारी की बेड़ियां टूटें... फिर कल सुनहरा
किसी भी देश का युवा होना, उसके वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं को मजबूत करता है। महात्मा गांधी ने स्वराज और ग्राम उद्योग की परिकल्पना के केंद्र में युवाओं को रखा था। उन्हें खादी निर्माण के जरिये न सिर्फ स्वरोजगार का मॉडल दिया बल्कि ‘स्वदेशी अपनाओ, विदेशी भगाओ’ के नारे के जरिये अंग्रेजों के खिलाफ उनका जोश भी बुलंद किया।
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विस्तार
देश में एक ओर नौकरी की किल्लत है तो दूसरी ओर दिग्गज कंपनियों की कमान हमारे युवाओं के हाथ में है। 54 फीसदी आबादी की उम्र 25 साल से कम है, तो 62 फीसदी की उम्र काम करने की है।
रोजगार देने की चुनौती कायम
90 फीसदी कंपनियां नौकरी के लिए कौशल की मांग करती है और भारत में 58 फीसदी युवाओं में इसका अभाव है।
- देश में बेरोजगारी दर करीब आठ फीसदी है।
- करीब साढ़े पांच करोड़ लोगों के पास कोई काम नहीं है।
आज देश में करोड़ों युवा हर साल श्रम के लिए उपलब्ध हो रहे हैं। लेकिन जरूरी कौशल का अभाव उन्हें बेरोजगार रहने पर मजबूर कर रहा है।
- एक आंकड़े के मुताबिक, 90 फीसदी कंपनियां नौकरी के लिए कौशल की मांग करती है लेकिन भारत में 58 फीसदी युवाओं में इसका अभाव है। इसके चलते रोजगार नहीं मिलता और जिन्हें नौकरी मिल जाती है, उन्हें सही वेतन नहीं मिलता।
- यही वजह है कि देश में बेरोजगारी दर करीब आठ फीसदी है। करीब साढ़े पांच करोड़ लोगों के पास कोई काम नहीं है। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में कौशलपूर्ण शिक्षा पर नीतियां लागू हुई हैं। लेकिन इनका दायरा और बढ़ाने की जरूरत है।
इंडिया स्किल रिपोर्ट
इंडिया स्किल रिपोर्ट- 2020 के अनुसार, मिलेनियल्स (21वीं सदी में किशोरावस्था पाने वाले) देश के श्रमबल का 47 फीसदी हिस्सा हैं। अगले दस साल तक इस मामले में उनका ही बोलबाला रहेगा।
- भारत की जनसांख्यिकी अपने आप में एक बड़ा संसाधन है, जिसे आधुनिक कौशलपूर्ण शिक्षा देकर मजबूत भविष्य तैयार हो सकता है।
- भारतीय युवा देश की आर्थिक, विज्ञान-तकनीक और मानव संसाधन क्षमताओं का दोहन कर उसे सुनहरे कल की ओर ले जा सकते हैं। याद रखें, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, गूगल और ट्विटर जैसी दिग्गज कंपनियों की कमान आज भारतीयों के हाथों में ही है।
दुनिया में दूसरे पायदान पर, आगे विस्तार की दरकार
स्टार्टअप और अरबों डॉलर की कंपनियों के दौर के साथ भारत कदमताल जरूर कर रहा है लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ लघु, सूक्ष्म व मध्यम उद्योग (एमएसएमई) वैसी रफ्तार नहीं पकड़ पाया। दुनिया में एमएसएमई के मामले में भारत दूसरे पायदान पर है और इनकी तादाद करीब साढ़े छह करोड़ है, जिनकी जीडीपी में 29 फीसदी हिस्सेदारी है। लेकिन कमजोर ढांचागत सुविधा, नवाचार का अभाव, कम कौशल व उत्पादकता और पर्याप्त वित्त संसाधन के अभाव में यह क्षेत्र अपेक्षित तरक्की नहीं कर पाया। इनमें से 99 फीसदी उद्योग जीवनभर लघु श्रेणी तक ही सीमित रह जाते हैं। अगर इन्हें मजबूत किया जाए तो ये देश के तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की मंजिल की राह आसान कर सकते हैं।
भारत का अमेरिका, चीन के बाद सबसे ज्यादा सवा पांच लाख करोड़ रुपये सैन्य खर्च
देश के लिए जान लुटाने वाले योद्धाओं की कभी कमी नहीं रही। कमी थी तो नए उपकरण और हथियारों की, जिन्हें रणभूमि में मिले सबक और संभावित खतरों के मद्देनजर हम पूरा करते रहे। आज अंग्रेजों (ब्रिटेन) को पीछे छोड़ हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति बन चुके हैं। इस ताकत की बदौलत ही चीन को घेरने के लिए बने क्वॉड जैसे समूहों में भारत को तवज्जो मिली है। हालांकि, रूस, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों पर हथियारों की निर्भरता ने हमारे आधुनिकीकरण के लिए जरूर चुनौती खड़ी की है।
- फिलहाल भारत अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए 70 फीसदी आयात पर निर्भर है। एस-400 जैसे उन्नत मिसाइल सिस्टम और रफेल सरीखे लड़ाकू विमान हम विदेशों से ही ले रहे हैं।
- बीते कुछ वर्षों में स्वदेशी निर्माण में तेजी आई है। सरकार ने 41 आयुध कारखानों को समायोजित कर सात नई रक्षा कंपनियां बनाई हैं। देश में टी-92 टैंक, अर्जुन टैंक और बख्तरबंद वाहनों के अलावा हल्के लड़ाकू विमान तेजस का निर्माण हुआ है। इस विमान को खरीदने में तो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे छह देश दिलचस्पी दिखा चुके हैं।
- वहीं, स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत का नौसेना बेड़े में शामिल होना गर्व का पल रहा है। लेकिन स्वदेशी रक्षा निर्माण की राह अभी लंबी है, जिसे हम जितना तेजी से तय कर सके, उतना ही हमारे आधुनिकीकरण और खर्च के लिए फायदेमंद होगा। सैन्य प्रशासन के स्तर पर देखें तो हिंद महासागर और लद्दाख में चीन की घुसपैठ, पश्चिम में सीमा पार से आतंकवाद और अस्थिर अफगानिस्तान व श्रीलंका को देखते हुए भारत को थिएटर कमांड के गठन का लक्ष्य जल्द पूरा करना होगा।