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केशवानंद भारती निर्णय @50:ऐतिहासिक फैसले की आधी सदी, जिसने भारतीय सांविधानिक ढांचे की सर्वोच्चता प्रस्थापित की
Tue, 25 Apr 2023 06:15 AM IST
गुलाम अहमद
रिसर्च डेस्क, अमर उजाला
रिसर्च डेस्क, अमर उजाला
Published by: गुलाम अहमद
Updated Tue, 25 Apr 2023 06:15 AM IST
सार
‘संविधान की बुनियाद में संसद नहीं कर सकती बदलाव’...इस मील के पत्थर निर्णय को 50 साल पूरे हो गए। फैसले की 50वीं वर्षगांठ पर जारी विशेष वेब पेज पर इस मुकदमे से जुड़ीं सभी जानकारियां दी गई हैं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसे जारी करते हुए कहा, वेब पेज दुनियाभर के शोधकर्ताओं को फैसले के बारे में अधिक जानने में मदद करेगा। वेब पेज पर मामले की पृष्ठभूमि, उठाए गए प्रमुख कानूनी मुद्दों, दिए गए तर्कों, निष्कर्ष और उपयोग की गई संदर्भ सामग्री उपलब्ध है।
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केशवानंद भारती
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
भारत में संविधान ही सर्वोपरि है, इसके मूल ढांचे को तोड़ा नहीं जा सकता, संसद भी इसमें संशोधन कर बदलाव नहीं कर सकती।' जिस केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया, आज उसके 50 साल पूरे हुए हैं। 13 जजों की सबसे बड़ी संविधान पीठ ने इस मुकदमे को सुना। इनमें से 7 ने निर्णय के पक्ष और 6 ने खिलाफ मत देकर बेहद करीबी बहुमत से संविधान के मूल ढांचे को स्पष्ट किया।
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस मुकदमे के 50 वर्ष पूरे होने पर एक विशेष वेब पेज भी शुरू किया। इस पेज में मुकदमे से जुड़े दस्तावेज, बहसों, लिखित जवाबों व निर्णय आदि को उपलब्ध करवाया गया है। हालांकि, इस फैसले को लेकर असहमति की आवाज भी 50 साल के इस जश्न से ठीक पहले सुनी गई जब इसी साल 12 जनवरी को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा, लोकतंत्र में जनता का मत ही बुनियादी ढांचा है।
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मुकदमा यह था
केरल सरकार भूमि सुधार कानून-1969 के तहत कासरगोड स्थित एडनीर मठ पर कब्जा करना चाहती थी। यहां के शंकराचार्य केशवानंद श्रीपदगलवरु ने इसका विरोध किया। वे मठ का प्रबंधन अपने पास रखना चाहते थे ताकि सरकार का इसमें हस्तक्षेप न हो। फरवरी, 1970 में उन्होंने मुकदमा दायर कर केरल सरकार के कदम को अपने धर्म, संपत्ति व अन्य मूल अधिकारों का उल्लंघन करार दिया। 31 अक्तूबर, 1972 को मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई, जो 23 मार्च, 1973 तक यानी पांच महीने चली। मुकदमा 68 दिन सुना गया। याची की ओर से नानीभाई पालकीवाला के नेतृत्व और फली एस नरीमन व सोली सोराबजी के सहयोग से यह मुकदमा लड़ा गया।
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पृष्ठभूमि
दो दशक से संसद व न्यायपालिका के बीच जारी संघर्ष की पृष्ठभूमि में यह मुकदमा लड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट फरवरी, 1967 में ही गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार व अन्य मुकदमे में साफ कर चुकी थी कि संविधान से नागरिकों को मिले अधिकारों में संसद संशोधन नहीं कर सकती। इस पर संसद ने एक संशोधन किया जिसके तहत वह संविधान के किसी भी हिस्से में बदलाव कर सकती थी। कानून भी पास किया कि न्यायपालिका इन पर पुनर्विचार नहीं कर सकती। उस दौरान केंद्र सरकार भूमि सुधारों के लिए संपत्ति के अधिकार को सीमित करने के लिए कदम उठा रही थी, जबकि नागरिकों को संपत्ति का मूल अधिकार मिला हुआ था। यह अधिकार 1978 में खत्म हुआ। यही अधिकार केशवानंद भारती मुकदमे में मुख्य विषय था।
संविधान के बुनियादी ढांचे में बदलाव नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय में कहा कि मूल अधिकार संविधान संशोधन के तहत खत्म नहीं किए जा सकते। हालांकि संपत्ति के मालिकाना हक को सीमित करने के कानूनों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज नहीं किया। यह साफ किया कि संसद चाहे तो संशोधन कर सकती है, लेकिन यह संशोधन संविधान के बुनियादी ढांचे को तोड़ने या बदलने वाले नहीं हो सकते।
13 जजों ने इस मुकदमे में 11 निर्णय किए। चार जजों ने निर्णय पर हस्ताक्षर नहीं किए। तत्कालीन चीफ जस्टिस सर्वमित्र सीकरी ने कहा, 'मूल अधिकारों को किसी भी दशा में निरस्त नहीं किया जा सकता। हालांकि, इन्हें जनहित में तार्किक ढंग से संक्षिप्त किया जा सकता है। संविधान के हर प्रावधान को संशोधित किया जा सकता है, पर इसकी बुनियाद और भावना को क्षति या तबाह नहीं कर सकते।'
कौन थे केशवानंद भारती
1940 में जन्मे और 1961 में एडनीर मठ के प्रमुख बने केशवानंद भारती को आदि शंकराचार्य के चार प्रथम शिष्यों में से एक तोटकाचार्य की परंपरा से जुड़ा माना जाता है। उन्होंने 19 साल की उम्र में संन्यास लिया था। वे यक्षगान सहित कन्नड़ संस्कृति, संगीत व कला के संरक्षण के लिए भी जाने जाते थे। 79 वर्ष की उम्र में 6 सितंबर, 2020 को उनका निधन हुआ।
निर्णय के पक्ष में बहुमत
चीफ जस्टिस एसएम सीकरी, जस्टिस जयशंकर मणिलाल शेलट, जस्टिस कौदूर सदानंद हेगड़े, जस्टिस अमरनाथ ग्रोवर, जस्टिस पिंगले जगनमोहन रेड्डी, जस्टिस हंसराज खन्ना, जस्टिस एके मुखर्जी।
निर्णय से असहमति...अल्पमत
जस्टिस अजीतनाथ रे, जस्टिस देवीदास गणपत पालेकर, जस्टिस कुट्टयिल कुरियन मैथ्यू, जस्टिस मिर्जा हमीदुल्ला बेग, जस्टिस एसएन द्विवेदी, जस्टिस यशवंत विष्णु चंद्रचूड़।
जानिये इस निर्णय का कैसे हुआ व्यापक असर
सरकार पर: अप्रैल, 1976 में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने जस्टिस अजीत नाथ रे को सुप्रीम कोर्ट का नया चीफ जस्टिस घोषित किया, जबकि जस्टिस जयशंकर मणिलाल शेलट, जस्टिस केएस हेगड़े और जस्टिस एएन ग्रोवर उनसे वरिष्ठ थे। तीनों ने निर्णय के पक्ष में मत दिया था, सरकार ने इनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज कर सुपरसीड कर दिया।
संविधान पर: 26 जनवरी, 1951 को अस्तित्व में आने के बाद से अब तक 102 बार संविधान संशोधन हुए हैं। इनमें से 60 से अधिक केशवानंद भारती मुकदमे के बाद हुए। बीते 50 साल में सुप्रीम कोर्ट ने 16 बार इन संशोधनों को संविधान के बुनियादी ढांचे की कसौटी पर परखा और 7 बार इन्हें ढांचे के विपरीत पाया।
न्यायपालिका पर: न्यायपालिका की शक्तियां कम करने के लिए लाए कानूनों व संशोधनों में सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय का उपयोग किया। 2014 में हुए 99वें संशोधन को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की सांविधानिक पीठ ने 2015 में खारिज किया। इस संशोधन के तहत जजों की नियुक्ति व तबादले के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बना। हालांकि, इसे कॉलेजियम प्रणाली को खत्म करने का प्रयास बताया गया। इसके अलावा भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने इससे जुड़े संशोधनों को आंशिक रूप से खारिज किया। विशेषज्ञों के अनुसार, वही हिस्से खारिज हुए, जो न्यायपालिका को विषय पर न्यायिक पुनर्विचार करने से रोकते थे।
विशेष वेब पेज पर सभी जानकारी
फैसले की 50वीं वर्षगांठ पर जारी विशेष वेब पेज पर इस मुकदमे से जुड़ीं सभी जानकारियां दी गई हैं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसे जारी करते हुए कहा, वेब पेज दुनियाभर के शोधकर्ताओं को फैसले के बारे में अधिक जानने में मदद करेगा। वेब पेज पर मामले की पृष्ठभूमि, उठाए गए प्रमुख कानूनी मुद्दों, दिए गए तर्कों, निष्कर्ष और उपयोग की गई संदर्भ सामग्री उपलब्ध है।
फैसले की वैधता पर उपराष्ट्रपति धनखड़ के सवाल
केशवानंद भारती मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर 50वें वर्ष में व्यापक बहस भी जारी है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इसी साल जनवरी में जयपुर में हुई पीठासीन अधिकारियों की कॉन्फ्रेंस में साफ शब्दों में कहा, 'लोकतांत्रिक समाज में जनता का मत ही बुनियादी ढांचा है। संसद व व्यवस्थापिका की प्रधानता व संप्रभुता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।'
विधि विशेषज्ञ रहे उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा था कि संविधान संशोधन व कानून बनाने की संसद की शक्ति किसी अन्य सत्ता के अधीन नहीं है। संविधान में लोकसभा व राज्यसभा के अलावा तीसरे किसी ऐसे प्रधान सदन की व्यवस्था नहीं की गई है जो पारित हुए कानूनों को अनुमति दे। संसदीय लोकतंत्र से समझौता करने की अनुमति कभी नहीं दी जा सकती। जनता के अभिमत को मिटाने की शक्ति किसी संस्थान के पास नहीं है। यही लोकतंत्र की जीवन रेखा है।
धनखड़ का मानना है, 1973 में केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ जाने वाले संशोधनों को अदालतों की ओर से खारिज करने का अधिकार बताया। बाद के वर्षों में इसे लेकर महत्वपूर्ण निर्णय दिए लेकिन इस प्रक्रिया में लोकतांत्रिक संप्रभुता से समझौता हुआ। 2015 में 99वां संशोधन आया, इसके तहत सभी दल एकमत से न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाना चाहते थे। राज्यों ने भी इस पर सहमति दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने असांविधानिक कह कर यह संशोधन ही खारिज कर दिया। दुनिया के लोकतंत्र के इतिहास में किसी देश में ऐसा नहीं हुआ।
उपराष्ट्रपति मानते हैं कि संसदीय संप्रभुता और स्वायत्तता लोकतंत्र को बचाए रखने की न्यूनतम जरूरत है, इससे समझौता नहीं हो सकता। जनता की संप्रभुता को बचाना संसद और व्यवस्थापिका की जिम्मेदारी है। संसद को इस बारे में विचार करना होगा।