देश में 35 फीसदी बच्चों को नहीं लगते टीके, स्वास्थ्य पर मीडिया की गलत रिपोर्टिंग से फैलती है अफवाह
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देश भर में हर साल लगभग 35 फीसदी नवजात शिशुओं को टीकाकरण का लाभ नहीं मिल पाता है, जिससे आगे चलकर ऐसे बच्चों को काफी गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ता है। वहीं बच्चों के अलावा महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी लोग ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिसकी वजह से देश में स्वास्थ्य पर लोगों को ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है। इसके अलावा स्वास्थ्य बीट पर काम करने वाले हिंदी पत्रकारों को भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
बच्चों के टीकाकरण, महिलाओं के स्वास्थ्य, रक्त दान और स्वास्थ्य रिपोर्टिंग को लेकर के यूनिसेफ, भारतीय जनसंचार संस्थान, थॉमसन रॉयटर्स व ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सहयोग से अमर उजाला ने नई दिल्ली में दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया था, जिसमें उर्दू मीडिया के पत्रकारों ने भी हिस्सा लिया।
स्वास्थ्य को लेकर अफवाहों का दौर ज्यादा
यूनिसेफ की संचार अधिकारी सोनिया सरकार एवं भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक केजी सुरेश ने 'क्रिटिकल अप्रेजल स्किल प्रोग्राम' कार्यशाला का शुभारंभ किया। कार्यशाला के पहले दिन केजी सुरेश ने कहा कि सोशल मीडिया के प्रभाव के चलते देश भर में स्वास्थ्य को लेकर के अफवाहों का बाजार ज्यादा फल फूल रहा है।
कई बार अखबार, वेबसाइट और टीवी में गलत रिपोर्टिंग के चलते अफवाहें ज्यादा फैलती हैं, जिससे हर आदमी प्रभावित होता है। आईआईएमसी के बाद अमर उजाला देश में ऐसा दूसरा संस्थान है, जिसने इस तरह की कार्यशाला का आयोजन किया है।
निपाह वायरस ने तबाह किया केरल का टूरिज्म मार्केट
उन्होंने कहा कि निपाह वायरस गलत रिपोर्टिंग के चलते केरल के पर्यटन उद्योग को पूरी तरह से तबाह कर दिया। हालांकि यह वायरस कोजिकोड शहर के एक छोटे से हिस्से में फैला था, लेकिन इसको ऐसे पेश किया गया, जैसे पूरा शहर ही इससे प्रभावित है। राज्य में आने वाले पर्यटकों ने अपनी ट्रिप को भी वायरस की डरावनी खबरों के चलते रद्द कर दिया था।
टीकाकरण अभियान हो रहा है प्रभावित
यूनिसेफ के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. भृगु कपूरिया ने कहा, 'भारत की गिनती उन देशों में होती है जहां बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाए जा रहे हैं। सालभर में करीब 26 मिलियन नवजातों को इसके तहत वैक्सीन लगाए जा रहे हैं। मगर बिना साक्ष्य के इसे लेकर ऐसी अफवाहें फैलाई जा रही हैं जिससे सरकार की ओर से चलाए जा रहे टीकाकरण अभियान प्रभावित होते हैं।'
इसलिए देश में बढ़ रहे हैं स्तन कैंसर के मामले
वरिष्ठ पत्रकार आरती धर ने कहा कि देश की ज्यादातर शादी-शुदा महिलाओं में स्तन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह कि मां बनने के बाद कई महिलाएं 6 महीने बाद अपने बच्चों को स्तनपान कराना बंद कर देती हैं। माताओं को कम से कम 3 साल तक बच्चों को स्तनपान कराना चाहिए, क्योंकि इसी दौरान बच्चों के मस्तिष्क का 80 फीसदी विकास होता है।
वहीं शिशु दुग्ध विकल्प अधिनियम 1992 और संशोधित अधिनियम 2003 के तहत कोई भी मां के दूध के विकल्प के तौर पर किसी भी डब्बा बंद दूध, शिशु आहार या दूध की बोतलों का उत्पादन, आपूर्ति, वितरण या प्रचार नहीं कर सकता। अगर इसे बढ़ावा देते या दो साल के छोटे बच्चे को ऐसा आहार देते हुए कोई स्वास्थ्य कर्मी पाया गया, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।'
गर्भवती महिलाओं को पड़ती है खून की ज्यादा जरूरत
आरती धर ने कहा कि गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी के दौरान सबसे ज्यादा खून की जरूरत पड़ती है, लेकिन उनके खुद के रिश्तेदार जैसे पति, मां, सास-ससुर व भाई आदि रक्तदान करने से भाग जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि लोगों के दिमाग में डर बैठा है कि खून देने से वो कमजोर हो जाएंगे, जबकि ऐसा नहीं है।
डाटा पर शोध करने के मामले में पत्रकार उदासीन
भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रोफेसर डॉ. गीता बामजई ने कहा कि स्वास्थ्य पर जारी किए गए विभिन्न शोधपत्रों को पढ़ने में पत्रकार काफी उदासीन रहते हैं। आम जनता को राजनीतिक खबरें नहीं बल्कि विज्ञान से जुड़ी खबरें ज्यादा प्रभावित करती है।
किसी भी शोध को छापने से पहले उसकी विश्वसनीयता परखनी चाहिए। इसके लिए सही आंकड़ों को पेश करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसी भी अध्ययन को आधा-अधूरा छापने से अर्थ का अनर्थ होने का खतरा बना रहा है। लिहाजा, रिसर्च रिपोर्ट के हर अहम बिंदु को लोगों के सामने रखना चाहिए।
कैस पर सिखाएं रिपोर्टिंग के गुर
स्वास्थ्य बीट कवर करने वाले पत्रकारों को वरिष्ठ पत्रकार एमएच गजाली, प्रमोद जोशी व यूनिसेफ की न्यूट्रिशन एक्सपर्ट गायत्री सिंह ने भी रिपोर्टिंग के गुर सिखाएं। एमएच गजाली ने पत्रकारों को आने वाली दिक्कतें व टीकाकरण की परेशानियों के कारणों के बारे में बताया।
कार्यशाला का संचालन कर रहे अमर उजाला के वरिष्ठ संपादक संजय अभिज्ञान ने कहा कि 'कैस' की विधा अनुसंधान और शोध प्रस्तावों को आंकने की कला है। उन्होंने कहा, 'सप्रमाण लेखन ही कुंजी है। शोध या अनुसंधान से किसी कंपनी या समूह यी लॉबी को फायदा होता हो तो उसका उल्लेख संबंधित रिपोर्ट में जरूर करना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि कई बार दवा कंपनियां अपना प्रचार प्रसार करने के लिए फर्जी शोध करवाती हैं। लिहाजा, किसी भी अध्ययन, खास तौर से जो स्वास्थ्य संबंधी विषयों से जुड़े हों, उनके नतीजों को प्रकाशित करने से पहले पत्रकारों को अच्छी तरह उनकी पड़ताल करने की जरूरत है।