{"_id":"655aa6255099bd7e7b0d6967","slug":"191-billion-labor-hours-wasted-in-india-due-to-heat-in-2022-claim-in-new-edition-of-lancet-countdown-2023-11-20","type":"story","status":"publish","title_hn":"Report: 2022 में गर्मी से भारत में 191 अरब श्रम घंटे हुए बर्बाद; लैंसेट काउंटडाउन के नए संस्करण में दावा","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Report: 2022 में गर्मी से भारत में 191 अरब श्रम घंटे हुए बर्बाद; लैंसेट काउंटडाउन के नए संस्करण में दावा
Mon, 20 Nov 2023 05:49 AM IST
यशोधन शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: यशोधन शर्मा
Updated Mon, 20 Nov 2023 05:49 AM IST
सार
गर्मी के संपर्क में आने से 2022 में 490 बिलियन संभावित श्रम घंटों का नुकसान हुआ। तुलनात्मक रूप से यह 1991 से 2000 के मुकाबले लगभग 42 प्रतिशत अधिक है। औसतन दुनिया में प्रत्येक श्रमिक ने श्रम क्षमता के 143 संभावित घंटे खो दिए।
विज्ञापन
गर्मी से श्रम घंटे प्रभावित
विस्तार
भारत में 2022 में गर्मी के कारण 191 अरब संभावित श्रम घंटे बर्बाद हो गए। यह 1991 से दो हजार की तुलना में 54 प्रतिशत अधिक है। इतने श्रम घंटे बर्बाद होने का अर्थ है कि 219 बिलियन डॉलर की हानि, जो देश की जीडीपी के 6.3 प्रतिशत के बराबर है।
विज्ञापन
स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर लैंसेट काउंटडाउन के नवीनतम संस्करण में इसका खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भीषण गर्मी का कृषि श्रमिकों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा। इससे उनका 64 प्रतिशत समय बर्बाद हुआ और संभावित आय का 55 प्रतिशत नुकसान हुआ।
विज्ञापन
रिपोर्ट में धूप के संपर्क और व्यवसायिक कामकाजी उम्र की आबादी के बीच संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के साथ 195 देशों के लिए गर्मी से संबंधित श्रम क्षमता हानि की गणना की गई। इसका असर गरीब और विकासशील देशों के साथ-साथ अमेरिका जैसे उच्च आय वाले देशों में निर्माण कार्यों में लगे लोगों पर पड़ा है।
विज्ञापन
गर्मी के संपर्क में आने से 2022 में 490 बिलियन संभावित श्रम घंटों का नुकसान हुआ। तुलनात्मक रूप से यह 1991 से 2000 के मुकाबले लगभग 42 प्रतिशत अधिक है। औसतन दुनिया में प्रत्येक श्रमिक ने श्रम क्षमता के 143 संभावित घंटे खो दिए। इस वजह से 1.3 अरब से अधिक श्रमिकों को 39 प्रतिशत अधिक वैश्विक कार्यबल के नुकसान का सामना करना पड़ा। इनमें से 80 प्रतिशत निम्न या मध्यम मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) देश शामिल हैं।
निम्न और मध्यम देश ज्यादा प्रभावित
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2010 से 2014 और 2018 से 22 के बीच चरम मौसम की घटनाओं से आर्थिक नुकसान 23 प्रतिशत बढ़ गया। यह नुकसान केवल 2022 में 264 बिलियन डॉलर के बराबर हुआ, जबकि गर्मी के जोखिम के कारण वैश्विक नुकसान बढ़कर 863 बिलियन डॉलर हो गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रम क्षमता की हानि ने निम्न और मध्यम-एचडीआई देशों को सबसे अधिक प्रभावित किया। इस वजह से संभावित आय हानि उनके सकल घरेलू उत्पाद के 6.1 प्रतिशत और 3.8 प्रतिशत के बराबर हुई।
2060 तक दोगुने से अधिक नुकसान का अनुमान
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि 2041-60 तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित भी कर लिया गया तब भी 1995-2014 की अवधि की तुलना में सालाना संभावित श्रम घंटों का दोगुने से अधिक का नुकसान होगा। आने वाले समय में इसकी चपेट में निम्न और मध्यम आय वाले देश के साथ-साथ विकासशील और उच्च आय वाले देश भी आएंगे। इसका सबसे ज्यादा असर ठंडे मुल्कों को हो सकता है, क्योंकि वहां का श्रमबल बढ़ती गर्मी के साथ तालमेल बैठाने में अपेक्षाकृत गर्म देश के मुकाबले ज्यादा कमजोर है।
यह रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के लिए पार्टियों के 28वें सम्मेलन (सीओपी 28) से पहले जारी की गई है जो मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ श्रम कार्यबल से होने वाले आर्थिक नुकसान पर केंद्रित है।