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160 साल पुरानी परंपरा टूटी, मोहर्रम के जुलूस में नहीं होगी बढ़ई की मस्जिद

Wed, 12 Oct 2016 04:26 AM IST
विकास सनाड्य/अमर उजाला, झांसी
विकास सनाड्य/अमर उजाला, झांसी Updated Wed, 12 Oct 2016 04:26 AM IST
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160 year old tradition of rani lakshmibai has been broken
सांकेतिक चित्र - फोटो : Getty images

मोहर्रम के जुलूस में 160 साल पहले वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई द्वारा शुरू की गई सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बढ़ई की मस्जिद (ताजिया) इस बार नहीं होगी। दरअसल, हिंदू बढ़ई परिवार में आपसी विवाद के कारण इस बार ताजिया का निर्माण नहीं हो सका है। इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि झांसी में 160 साल पहले मोहर्रम के जुलूस के दौरान मुस्लिमों में अपने ताजिये को आगे रखने की होड़ लगी रहती थी। इससे अक्सर विवाद हो जाता था। 

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1855 में मोहर्रम पर इसी होड़ में विवाद इस कदर बढ़ा कि दो पक्ष आगे ताजिया रखने पर अड़ गए। तब रानी लक्ष्मीबाई आगे आईं और अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता से सहमति से तय किया कि मोहर्रम के जुलूस में कोई भी ताजिया किसी और का नहीं, बल्कि हिंदू बढ़ई बल्देव द्वारा बनाई गई मस्जिद (ताजिया) आगे चलेगा। बल्देव ने कुछ ही घंटों के भीतर लकड़ी की मस्जिद तैयार कर दी और फिर यही सबसे आगे चली। तब से यह परंपरा चली आ रही है और मस्जिद बनाने का काम भी बल्देव बढ़ई की पांचवीं पीढ़ी ही कर रही है। 
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बल्देव बढ़ई की पांचवीं पीढ़ी के प्रदीप शर्मा ने बताया कि पिता की मृत्यु के बाद वह 2005 से लगातार मोहर्रम जुलूस के लिए मस्जिद का निर्माण करते चले आ रहे हैं। इसमें उनके बहनोई भी सहयोग करते हैं। लकड़ी का फ्रेम वही तैयार करते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। कुछ और घरेलू कारण हैं। इसका उन्हें बेहद अफसोस है। वादा करते हैं कि अगले साल वह फिर मोहर्रम के जुलूस के लिए मस्जिद का निर्माण करेंगे।

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ऐसे मिली थी बल्देव को जिम्मेदारी

160 year old tradition of rani lakshmibai has been broken
सांकेतिक चित्र - फोटो : Getty images

झांसी रानी के दत्तक पुत्र दामोदर राव के लिए बल्देव बढ़ई ने लकड़ी का पालना तैयार किया था, जिसमें शानदार नक्काशी की गई थी। बल्देव ने यह पालना रानी को भेंट किया था। इसकी कारीगरी से रानी बेहद प्रभावित थीं। ऐसे में मोहर्रम के जुलूस के लिए मस्जिद निर्माण की बात पर उन्हें बल्देव की याद आ गई और यह काम उन्होंने उसे सौंप दिया था। बल्देव के निधन के बाद उनके परिवार के लल्ला उस्ताद, धर्मदास, दयाराम भी आजीवन इस जिम्मेदारी को निभाते रहे।

इस बार मोहर्रम के जुलूस की अगुवाई बाईसाब (महारानी लक्ष्मीबाई) का ताजिया करेगा। परंपरानुसार मोहर्रम के जुलूस में सबसे आगे बढ़ई की मस्जिद, इसके बाद बाईसाब का ताजिया तथा तीसरे नंबर पर राई का ताजिया रहता है। ताजिया कमेटी के अध्यक्ष याकूब अहमद मंसूरी ने बताया कि इस बार बढ़ई की मस्जिद न होने से जुलूस में सबसे आगे बाईसाब का ताजिया चलेगा।

उल्लेखनीय है कि 1855 में हुए विवाद के अगले साल से रानी महल के पास ताजिया सजाया जाने लगा था, जो बाईसाब के ताजिये के नाम से जाना जाता है। रानी ने इस ताजिये की जिम्मेदारी शहर कोतवाल को सौंपी थी। यह परंपरा आज भी कायम है। अब भी इस ताजिये पर आने वाला सारा खर्च शहर कोतवाल ही वहन करते हैं।

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