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राजनाथ सिंह: विकसित भारत के लिए सांस्कृतिक पुनर्जागरण जरूरी; रक्षा मंत्री ने स्वामी दयानंद सरस्वती को किया याद

Mon, 16 Dec 2024 06:48 AM IST
शुभम कुमार अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Published by: शुभम कुमार Updated Mon, 16 Dec 2024 06:48 AM IST
सार

राजनाथ सिंह ने कहा कि आज भारत की आजादी का अमृतकाल चल रहा है। यह संयोग है कि आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती की 200वीं जयंती वर्ष मनाया जा रहा है। स्वामीजी ने एक जागरूक सांस्कृतिक भारत की कल्पना की थी।

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150th Foundation Year of Arya Samaj: Rajnath Singh said Cultural renaissance is necessary for developed India
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह - फोटो : एएनआई

विस्तार

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि हर राजनीतिक और राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक सामाजिक और सांस्कृतिक धरातल तैयार करना पड़ता है। इसलिए अगर हमें भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य हासिल करना है तो हमें देश में फिर से सांस्कृतिक पुनर्जागरण का वातावरण तैयार करना होगा।
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भारत की आजादी का अमृतकाल- राजनाथ सिंह
रक्षा मंत्री रविवार को यहां भारत मंडपम में आर्य समाज के 150वें स्थापना वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आज भारत की आजादी का अमृतकाल चल रहा है। यह संयोग है कि आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती की 200वीं जयंती वर्ष मनाया जा रहा है। जिस तरह स्वामीजी ने एक जागरूक सांस्कृतिक भारत की कल्पना की थी, उसी तरह हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत के निर्माण का लक्ष्य रखा है। हमारा मानना है इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें सांस्कृतिक जागरूकता का माहौल बनाने की जरूरत है।
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स्वामी दयानंद सरस्वती ने देश की सोई चेतना को जगाया
रक्षा मंत्री ने कहा कि गुजरात की धरती पर जब स्वामीजी का जन्म हुआ था तब देश अंग्रेजों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। अंग्रेजी शासक भारत और भारतीय संस्कृति को दोयम दर्जे का बता कर उसका सार्वजनिक रूप से उपहास उड़ाते थे। स्वामी दयानंद सरस्वती ने भारत की सोई चेतना को जगाने का काम किया।
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उन्होंने कहा कि उनका प्रभाव अंग्रेजी शासन से लड़ने वाले लाला लाजपत राय, राम प्रसाद बिस्मिल, स्वामी श्रद्धानंद जैसे कई महापुरुषों पर पड़ा। स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने उनकी भूमिका और योगदान के बारे में लिखा है कि स्वामीजी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले योद्धा थे। उन्होंने ही सबसे पहले स्वराज की मांग की थी।

सबसे पहले की स्वराज की मांग  
रक्षा मंत्री ने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही सबसे पहले स्वराज की मांग की थी। वह केवल वेदों की मीमांसा करने वाले ऋषि मात्र ही नहीं थे, बल्कि वे देश में नई सांस्कृतिक यात्रा के प्रकाश पुंज थे। हमारे वेद, भारतीय ज्ञान विज्ञान की गंगोत्री की तरह है।


बिना उद्गम समझे भारतीय ज्ञान गंगा का विस्तार समझ पाना मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन है। इसलिए स्वामीजी ने मूल की तरफ ही सबका ध्यान खींचा। वेदों में ऐसे ज्ञान हैं जिनका सहारा लेकर हम जलवायु परिवर्तन समेत आधुनिक युग की समस्याओं के भी समाधान ढूंढ सकते हैं।
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