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सऊदी अरब में सड़ रही भारतीयों की लाशें, वापस लाने में असहाय हैं परिजन
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 12 Dec 2016 01:13 PM IST
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सऊदी अरब के मुर्दाघरों में रखी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कम से कम 150 लोगों की लाशें एक साल से अपने वतन लौटने की राह देख रही हैं। इन शवों के परिजन इन लाशों को अंतिम संस्कार के लिए भारत ले आ पाने में असफल रहे हैं।
रियाद स्थित भारतीय दूतावास भी इन लोगों की बहुत ज्यादा मदद नहीं कर पा रहा है। विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में दूतावास को कई पत्र लिखें हैं, लेकिन इस मामले में कोई प्रगति नहीं हो सकी है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी इस मामले में असहायता दिखाते हैं।
अधिकारियों का कहना है कि जिन लोगों की लाशें मुर्दाघरों में पड़ी हैं, वे जिन लोगों या फिर कंपनियों के यहां नौकरी करते थे, वे सऊदी नियोक्ता इस मामले में मेल और फोन कॉल्स का जवाब देने को लेकर उदासीन हैं। इन सभी लोगों की मौत बीमारी, एक्सीडेंट, हत्या और आत्महत्या जैसे कारणों से हुई है।
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तेलंगाना में हैदराबाद, करीमनगर, वारंगल, महबूबनगर और निजामाबाद के हजारों मजदूर और आंध्र प्रदेश के कुछ और जिलों के हजारों लोग खाड़ी देशों में नौकरी करते हैं। तेलुगु समुदाय के सांख्यिकी आंकड़ों के मुताबिक दोनों राज्यों से करीब दस लाख लोग सऊदी अरब में नौकरी करते हैं।
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रियाद स्थित भारतीय दूतावास भी इन लोगों की बहुत ज्यादा मदद नहीं कर पा रहा है। विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में दूतावास को कई पत्र लिखें हैं, लेकिन इस मामले में कोई प्रगति नहीं हो सकी है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी इस मामले में असहायता दिखाते हैं।
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अधिकारियों का कहना है कि जिन लोगों की लाशें मुर्दाघरों में पड़ी हैं, वे जिन लोगों या फिर कंपनियों के यहां नौकरी करते थे, वे सऊदी नियोक्ता इस मामले में मेल और फोन कॉल्स का जवाब देने को लेकर उदासीन हैं। इन सभी लोगों की मौत बीमारी, एक्सीडेंट, हत्या और आत्महत्या जैसे कारणों से हुई है।
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तेलंगाना में हैदराबाद, करीमनगर, वारंगल, महबूबनगर और निजामाबाद के हजारों मजदूर और आंध्र प्रदेश के कुछ और जिलों के हजारों लोग खाड़ी देशों में नौकरी करते हैं। तेलुगु समुदाय के सांख्यिकी आंकड़ों के मुताबिक दोनों राज्यों से करीब दस लाख लोग सऊदी अरब में नौकरी करते हैं।
शवों को वापस भेजने की प्रक्रिया काफी जटिल
मुशीराबाद के रहने वाले और दम्माम में काम करने वाले मोहम्मद ताहिर ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि लालफीताशाही की वजह से शवों को भेजने की प्रक्रिया काफी जटिल है।
इसी साल मई में हैदराबाद शहर के पुराने हिस्से में रहने वाली असिमा नाम की एक महिला की मौत हो गई। आरोप है कि सऊदी में जिस शख्स के यहां वह काम करती थी, उसने असिमा पर इतना जुल्म किया कि वह मर गईं।
तेलंगाना सचिवालय के एनआरआई विभाग ने इस सिलसिले में रियाद स्थित भारतीय दूतावास को लिखा। भारतीय दूतावास तो असिमा की लाश को सऊदी से वापस भारत लाने में नाकामयाब रहा, लेकिन एक स्वयंसेवी संगठन की मदद से आखिरकार आसिमा की लाश 20 मई को हैदराबाद भेज दी गई।
ताहिर बताते हैं, 'इस काम में कम वक्त लगा। कई ऐसे मामले में हैं जहां 8 महीने से भी ज्यादा समय से लाशें मुर्दाघर में पड़ी हैं, लेकिन उन्हें भारत नहीं लाया जा सका है।'
इसी साल मई में हैदराबाद शहर के पुराने हिस्से में रहने वाली असिमा नाम की एक महिला की मौत हो गई। आरोप है कि सऊदी में जिस शख्स के यहां वह काम करती थी, उसने असिमा पर इतना जुल्म किया कि वह मर गईं।
तेलंगाना सचिवालय के एनआरआई विभाग ने इस सिलसिले में रियाद स्थित भारतीय दूतावास को लिखा। भारतीय दूतावास तो असिमा की लाश को सऊदी से वापस भारत लाने में नाकामयाब रहा, लेकिन एक स्वयंसेवी संगठन की मदद से आखिरकार आसिमा की लाश 20 मई को हैदराबाद भेज दी गई।
ताहिर बताते हैं, 'इस काम में कम वक्त लगा। कई ऐसे मामले में हैं जहां 8 महीने से भी ज्यादा समय से लाशें मुर्दाघर में पड़ी हैं, लेकिन उन्हें भारत नहीं लाया जा सका है।'
लाश वापस भेजने में 4 से 6 लाख का खर्च
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सऊदी अरब के नियमों के मुताबिक अगर किसी की मौत हादसे में हुई है, तो 40 दिन बाद ही उसकी लाश को उसके देश में भेजी जा सकती है। ताहिर ने बताया, 'चूंकि यह प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है, इसीलिए काफी वक्त लग जाता है।' एक महिला अपने मरे हुए बेटे को लेने यहां आईं थीं, लेकिन मजबूरी में उन्हें उसे यहीं दफनाना पड़ा।' अगर किसी की मौत हत्या के कारण हुई हो, तो स्थानीय अधिकारी बिना जांच खत्म किए लाश को नहीं भेजते हैं।
ऐसे मामलों में 60-90 दिन से ज्यादा समय लग जाता है। कई मामलों में ऐसा होता है कि किसी कंपनी या शख्स के यहां नौकरी कर रहे व्यक्ति की मौत के बाद उसे नौकरी देने वाला लाश को भेजने का खर्च उठाने से इनकार कर देता है। ऐसे में भी काफी मुश्किल खड़ी हो जाती है। लाश वापस भेजने में 4 से 6 लाख का खर्च आता है, इसीलिए लोग अपने कर्मचारियों का शव भेजने में दिलचस्पी नहीं लेते।
किसी भी लाश को वापस लेकर आने में भारतीय दूतावास द्वारा लिखी 4 चिट्ठियों की जरूरत पड़ती है। इनमें मेडिकल, पुलिस रिपोर्ट और परिवार की सहमति पत्र के अलावा उस घोषणा की भी जरूरत पड़ती है जिसमें मृतक के परिवार वाले वादा करते हैं कि वे सऊदी सरकार से या फिर उस व्यक्ति को नौकरी देने वाले शख्स से किसी आर्थिक मुआवजे की मांग नहीं करेंगे। इन अनिवार्यताओं के कारण यह प्रक्रिया और ज्यादा जटिल बन जाती है।
ऐसे मामलों में 60-90 दिन से ज्यादा समय लग जाता है। कई मामलों में ऐसा होता है कि किसी कंपनी या शख्स के यहां नौकरी कर रहे व्यक्ति की मौत के बाद उसे नौकरी देने वाला लाश को भेजने का खर्च उठाने से इनकार कर देता है। ऐसे में भी काफी मुश्किल खड़ी हो जाती है। लाश वापस भेजने में 4 से 6 लाख का खर्च आता है, इसीलिए लोग अपने कर्मचारियों का शव भेजने में दिलचस्पी नहीं लेते।
किसी भी लाश को वापस लेकर आने में भारतीय दूतावास द्वारा लिखी 4 चिट्ठियों की जरूरत पड़ती है। इनमें मेडिकल, पुलिस रिपोर्ट और परिवार की सहमति पत्र के अलावा उस घोषणा की भी जरूरत पड़ती है जिसमें मृतक के परिवार वाले वादा करते हैं कि वे सऊदी सरकार से या फिर उस व्यक्ति को नौकरी देने वाले शख्स से किसी आर्थिक मुआवजे की मांग नहीं करेंगे। इन अनिवार्यताओं के कारण यह प्रक्रिया और ज्यादा जटिल बन जाती है।