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असुरक्षित गर्भपात से हर रोज 13 महिलाओं की मौत, गर्भपात पर क्या कहता है भारतीय कानून

Fri, 10 May 2019 05:17 PM IST
Priyesh Mishra न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Priyesh Mishra Updated Fri, 10 May 2019 05:17 PM IST
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13 women die every day from unprotected abortion, what said Indian abortion law
गर्भपात कानून - फोटो : Social Media
भारत सहित विश्व के कई देशों में तेजी से बढ़ रहे असुरक्षित गर्भपात के दौरान मौत के आंकड़ों ने सबको हैरान कर दिया है। देश में हो रहे कुल गर्भपात के आधे से ज्यादा मामलों में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती जाती है। ऐसा नहीं है कि भारत या विश्व के अन्य देशों में गर्भपात से जुड़ा कानून नहीं है, फिर भी एशिया सेफ अबॉर्शन पार्टनरशिप’ संस्था की रिपोर्ट के अनुसार देश में 80 फीसदी महिलाएं इस कानून के बारे में नहीं जानती हैं।
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मद्रास हाईकोर्ट ने 1971 में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र से इसमें आवश्यक संशोधन करने को कहा। कोर्ट ने सरकार को गर्भपात की समय-सीमा 20 से 24 सप्ताह तक करने का सुझाव दिया है।
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कोर्ट ने कहा है हर साल भारत में 17 लाख बच्चों का जन्म किसी न किसी विकारों के साथ होता हैं। ऐसे में गर्भपात के लिए वैध समय-सीमा को 20 हफ्ते से बढ़ाकर 24 हफ्ते करने की जरूरत है।
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क्या है मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट

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गर्भपात कानून - फोटो : Social Media
1971 में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट बनाया गया है और इसके तहत कई प्रावधान किए गए हैं। कोर्ट में कई मामले ऐसे भी आए हैं जहां कानूनी प्रक्रिया के पालन में इतना समय बीत गया कि उसके बाद गर्भपात करने का समय ही बीत गया।

गर्भपात के लिए महिला की सहमति जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि महिला का अपने शरीर पर संपूर्ण अधिकार है। महिला को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। 

इस कानून के तहत 20 हफ्ते तक के गर्भ को संबंधित महिला के हित को देखते हुए डॉक्टर की सलाह से टर्मिनेट किया जा सकता है। लेकिन, अगर गर्भ 20 हफ्ते से ज्यादा समय का है तो गर्भपात के लिए न्यायालय की अनुमति जरुरी है। 

इसमें भी नियम है कि अगर उस गर्भ के कारण महिला ने जान को खतरा है और डॉक्टर्स ऐसा लिखकर देते हैं तो ऐसे मामलों में गर्भपात हो सकता है। लेकिन इसके विपरीत अगर गर्भपात कराने पर महिला की जान को खतरा हो तो गर्भपात नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा यदि महिला के गर्भ में पल रहा बच्चा दिव्यांग हो तो गर्भपात का अनुमति मिल सकती है। या फिर अगर महिला शारीरिक या फिर मानसिक रूप से बच्चे को जन्म देने की स्थिति में न हो और गर्भपात कराने पर जान का खतरा हो तो भी अनुमति नहीं दी जा सकती है।

इस कानून के अनुसार, गर्भ में पल रहा शिशु यदि मानसिक या शारीरिक रूप से अपंग हो तो डॉक्टर की रिपोर्ट के आधार पर गर्भपात कराया जा सकता है। लेकिन यह कोर्ट तय करेगा कि पेट में पल रहे बच्चे की क्या स्थिति है। 

उल्लंघन करने पर सजा का प्रावधान

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गर्भपात कानून - फोटो : Social Media
अगर महिला की मर्जी के बगैर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे का गर्भपात कराया जाता है तो वह भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध है। दोषी को ऐसे मामलों में उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। भारतीय दंड संहिता की धारा-312 में सजा का प्रावधान किया गया है। इस कानून के दायरे में वह महिला भी है जिसने बिना ठोस वजह के गर्भपात कराया है। दोषी को 3 साल तक की सजा हो सकती है। 

अगर महिला की सहमति के बिना गर्भपात कराया जाता है तो दोषी को 10 साल तक कैद या फिर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। महिला की सहमति के बिना गर्भपात कराने के दौरान उसकी मौत हो जाने पर दोषी को उम्रकैद की सजा हो सकती है।

यह है गर्भपात होने की आशंका का ग्राफ

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media
यदि किसी महिला का एक बार गर्भपात हो चुका है तो दूसरी बार में गर्भपात होने  की आशंका 20 प्रतिशत रहती है। दो बार गर्भपात होने के बाद तीसरी बार गर्भधारण के समय गर्भपात की आशंका 28 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। तीन बार गर्भपात के बाद चौथी बार में गर्भधारण की स्थिति पर गर्भपात की आशंका 43 फीसदी ज्यादा होती है।

यदि गर्भवती महिला दर्द निवारक औषधि का सेवन ज्यादा मात्रा में कर रही हो तो उससे भी गर्भपात होने की संभावना बढ़ जाती है। प्लास्टिक की बॉटल आदि से निकलने वाले केमिकल के संपर्क में आने पर भी गर्भपात की आशंका 80 फीसदी बढ़ जाती है।

हमारा खान-पान भी गर्भपात होने की संभावना को बढ़ा सकता है। यदि गर्भवती महिला स्ट्रीट फूड का सेवन ज्यादा मात्रा में करती है तो इससे भी गर्भपात हो सकता है। इसके अलावा कम मात्रा में नींद लेना, स्मार्टफोन पर ज्यादा समय व्यतीत करना, लंबे समय तक टीवी देखना और शराब का सेवन करना भी गर्भपात की संभावना को बढ़ा देते हैं।

यदि गर्भवती महिला को तनाव ज्यादा है तो उससे उत्पन्न होने वाला रसायन गर्भस्थ शिशु पर नकारात्मक असर डालता है। जिसके कारण गर्भपात हो सकता है।
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