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बदल गया तिब्बत के आंदोलन का रुख
शशिभूषण पुरोहित/धर्मशाला
Updated Sat, 27 Apr 2013 12:28 AM IST
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पिछले 50 सालों से आजादी और वैकल्पिक स्वायत्तता को संघर्षरत तिब्बतियों के आंदोलन का रुख एक साल में तेजी से बदला है। तिब्बत के अहिंसक आंदोलन ने धर्मगुरु दलाईलामा के सत्ता हस्तांतरण के बाद आत्मदाह का रूप ले लिया है।
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हालांकि, तिब्बत में आत्मदाह की पहली घटना मार्च 2009 में हुई। 8 मार्च, 2011 को दलाईलामा द्वारा राजनीतिक शक्तियां छोड़ने के बाद आत्मदाह की चिंगारी भड़क उठी। तिब्बत में अब तक 117 आत्मदाह की घटनाएं हो चुकी हैं। इनमें 101 की जान चली गई।
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खास यह है कि अब भारत में भी तिब्बती अपना आपा खो रहे हैं। दिल्ली में आत्मदाह की घटना के बाद तिब्बतियों ने धर्मशाला में भी इस आंदोलन में अपने जीवन की आहुति देने की कोशिश की।
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गौर करने वाली बात यह है कि जब से दलाईलामा ने तिब्बत के हेड ऑफ दी स्टेट से इस्तीफा दिया है, तब से ये घटनाएं कुछ ज्यादा बढ़ी हैं। 2011 में 14 बौद्ध भिक्षुओं ने खुद को आग के हवाले कर दिया।
2012 में सर्वाधिक 80 तिब्बती आंदोलनकारियों ने देश की स्वायत्तता को अपने प्राणों की आहुति दे दी। कम्युनिस्ट चीन के नेता शी पिंग द्वारा सत्ता संभालने के दिन भी दो तिब्बतियों ने आत्मदाह किया। गत वर्ष नवंबर और दिसंबर में भी आत्मदाह का ग्राफ काफी ऊंचा रहा।
अहिंसात्मक आंदोलन से आत्मदाह की ओर बढ़े तिब्बतियों के इस आंदोलन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
आत्मदाह हिंसा का दूसरा रूप: दलाईलामा
बौद्ध धर्मगुरु दलाईलामा ने आत्मदाह की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताते हुए अपनी आधिकारिक टिप्पणी में कहा कि आत्मदाह हिंसा का ही दूसरा रूप है। उन्होंने तिब्बत की नई पीढ़ी से आग्रह किया है कि इस मार्ग को छोड़कर संयम से काम लें। आज पूरा विश्व उनके साथ है। बहुत जल्द समस्या का हल होगा और तिब्बती अपने वतन की ओर वापसी करेंगे। उन्होंने तिब्बत में मानवाधिकारों की बहाली को चीन के नेतृत्व का भी इस ओर ध्यान खींचा है।
चीन का दबाव कर रहा मजबूर: रिंपोंछे
निर्वासित तिब्बत सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री एवं तिब्बती आंदोलन के चिंतक प्रो. सामदोंग रिंपोंछे ने कहा कि तिब्बत में चीन के दबाव और अत्याचार की वजह से बौद्ध भिक्षु आत्मदाह जैसे कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं।
तिब्बत की कीर्ति मॉनेस्टरी के लामाओं को इस कद्र प्रताड़ित किया जा रहा है कि उनके पास आत्मदाह के सिवाय दूसरा उपाय नहीं बचता। संयुक्त राष्ट्र को इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करना चाहिए। चीन को चाहिए कि तिब्बत में मानवाधिकारों की बहाली के जल्द वार्ता बुलाए।