फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Solan News ›   batal dussehra solan gun fires sin pot 600 year old tradition

हिमाचल में अनोखा दशहरा: यहां बंदूक से फोड़ा जाता है पाप का घड़ा, 600 साल से चली आ रही अनोखी परंपरा; जानें

Tue, 20 Oct 2026 09:48 AM IST
Ankesh Dogra योगेश शर्मा, अर्की (सोलन)।
योगेश शर्मा, अर्की (सोलन)। Published by: Ankesh Dogra Updated Tue, 20 Oct 2026 09:48 AM IST
सार

हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के अर्की में मनाया जाने वाला बातल दशहरा अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां रावण दहन से पहले राज परिवार बंदूक से पाप के घड़े को निशाना बनाता है। 

विज्ञापन
batal dussehra solan gun fires sin pot 600 year old tradition
यहां बंदूक से फोड़ा जाता है पाप का घड़ा - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित बातल गांव का ऐतिहासिक दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं के लिए जाना जाता है। करीब 600 वर्षों से मनाए जा रहे इस मेले में आज भी राजाओं के शासनकाल की परंपराओं का निर्वहन किया जाता है। यहां दशहरे पर रावण दहन के साथ बंदूक से पाप के घड़े को निशाना लगाने की परंपरा निभाई जाती है। सरकारी दस्तावेजों में इस उत्सव का उल्लेख वर्ष 1908 से मिलता है। मेले में शामिल होने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग पहुंचते हैं।

विज्ञापन
Trending Videos

अर्की से चार किलोमीटर जंगल के रास्ते बातल पहुंचती है पालकी
दशहरे के अवसर पर अर्की बाजार में राजाओं के समय स्थापित भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर से ठाकुर जी की पालकी सजाकर शोभायात्रा निकाली जाती है। यह शोभायात्रा अर्की बाजार से गाहर होते हुए करीब चार किलोमीटर लंबे जंगल के रास्ते बातल गांव पहुंचती है। गांव पहुंचने पर ग्रामीण पालकी का भव्य स्वागत करते हैं। इसके बाद पूजा-अर्चना की जाती है और दशहरे से जुड़ी पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

राज परिवार निभाता है पाप का घड़ा फोड़ने की परंपरा
पंचायत प्रधान उर्मिला शर्मा के अनुसार, राजाओं के शासनकाल में रावण दहन की जगह बंदूक से घड़े को निशाना बनाकर फोड़ने की परंपरा थी। इस घड़े को पाप का घड़ा माना जाता था। इसे फोड़ना असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक माना जाता है। आज भी राज परिवार की ओर से बंदूक से घड़े पर निशाना लगाने की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद अन्य लोग भी निशाना लगाते हैं और अंत में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। यही अनूठी परंपरा बातल दशहरे को दूसरे स्थानों के दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती है।
विज्ञापन

खेल प्रतियोगिताओं के साथ सजती हैं सांस्कृतिक संध्याएं
दो दिवसीय बातल मेले में दिन के समय खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, जबकि रात को सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन होता है। इनमें स्थानीय कलाकारों के साथ बाहरी राज्यों से आने वाले कलाकार भी प्रस्तुतियां देते हैं। मेले की सांस्कृतिक संध्याओं में गजल गायक चंदन दास, अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन सहित कई चर्चित कलाकार प्रस्तुति दे चुके हैं। प्रसिद्ध नृत्यांगना शोभना नारायण, जो पूर्व राष्ट्रपति केआर नारायण की पुत्री हैं, भी यहां अपनी प्रस्तुति दे चुकी हैं।
 

बातल से शुरू हुई रावण दहन की परंपरा: स्थानीय निवासी
स्थानीय निवासी शांति स्वरूप के अनुसार, क्षेत्र में रावण दहन की शुरुआत बातल से हुई थी। बाद में यह परंपरा अन्य स्थानों पर भी शुरू हुई। ऐतिहासिक मान्यताओं, राजपरिवार से जुड़ी रस्मों और सांस्कृतिक आयोजनों के कारण बातल दशहरा आज भी क्षेत्र के प्रमुख पारंपरिक मेलों में शामिल है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed