फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Scientists from 17 states gather in Shimla: Focus on AI and genome editing to safeguard agriculture

शिमला में जुटे 17 राज्यों के वैज्ञानिक: खेती बचाने के लिए एआई और जीनोम एडिटिंग पर जोर, टिकाऊ कृषि पर मंथन

Thu, 22 Oct 2026 09:39 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 22 Oct 2026 09:39 PM IST
सार

 जलवायु परिवर्तन के बीच फसलों को बीमारियों से बचाने और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक एआई, जीनोम एडिटिंग और लाभकारी सूक्ष्मजीवों जैसी तकनीकों पर जोर दे रहे हैं। 

विज्ञापन
Scientists from 17 states gather in Shimla: Focus on AI and genome editing to safeguard agriculture
सीपीआरआई शिमला में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

जलवायु परिवर्तन के बीच फसलों को बीमारियों से बचाने और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक एआई, जीनोम एडिटिंग और लाभकारी सूक्ष्मजीवों जैसी तकनीकों पर जोर दे रहे हैं। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) शिमला में गुरुवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई। इसमें देश के 17 राज्यों से 250 से अधिक वैज्ञानिक, शोधकर्ता और विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। संगोष्ठी का विषय जलवायु अनुकूलता, खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि के लिए अगली पीढ़ी की पादप स्वास्थ्य रणनीतियां है। इसका उद्घाटन महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के पूर्व कुलपति डॉ. एसएस चहल ने किया। आयोजन इंडियन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसायटी के तत्वावधान में विभिन्न कृषि संस्थानों और संगठनों के सहयोग से किया जा रहा है।

विज्ञापन
Trending Videos

एआई से होगी बीमारियों की शुरुआती पहचान
डॉ. एसएस चहल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और बदलती कृषि प्रणालियों के कारण फसलों में नए कीटों और बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में खेतों की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप विश्वसनीय एआई आधारित समाधान विकसित करना जरूरी है। आईआईटी रुड़की के डॉ. देबब्रत सरकार ने बताया कि चावल में जीवाणु झुलसा रोग की शुरुआती पहचान के लिए कम लागत वाला पोर्टेबल सेंसर विकसित किया गया है। यह रोग से जुड़े विशिष्ट यौगिकों का पता लगाता है। ब्लूटूथ के जरिये इसे स्मार्टफोन से जोड़कर फसल की स्थिति की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

विज्ञापन
विज्ञापन

जीनोम एडिटिंग से विकसित होंगी रोगरोधी फसलें
भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के पूर्व निदेशक आर. विश्वनाथन ने कहा कि जीनोम एडिटिंग से वायरस, बैक्टीरिया और फफूंद से होने वाली बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी फसलें विकसित करने में मदद मिल सकती है। इससे रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम करने की संभावना भी है। आईआईटी रुड़की के श्रीराम यादव ने बताया कि जीनोम एडिटिंग के जरिये धान की जड़ों की संरचना में सुधार करने पर काम किया गया है। इससे उत्पादन और पोषण गुणवत्ता बढ़ाने की संभावनाएं हैं।

विज्ञापन

लाभकारी सूक्ष्मजीवों से रोग नियंत्रण संभव
उत्तर बंगाल कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. स्वरूप कुमार चक्रवर्ती ने कहा कि बैसिलस, स्यूडोमोनास और ट्राइकोडर्मा जैसे लाभकारी सूक्ष्मजीव फ्यूजेरियम और फाइटोफ्थोरा जैसे रोगजनकों को नियंत्रित करने में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने कीटनाशकों के अवशेष, पर्यावरण प्रदूषण और रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर भी चिंता जताई। डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के डॉ. अनिल हांडा ने कहा कि पौध सामग्री के अंतरराष्ट्रीय व्यापार से नए कीटों और रोगों के प्रसार का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए आयात-निर्यात के दौरान जैव सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ सकती हैं फसलों की बीमारियां
हैदराबाद स्थित अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईएसएटी) की वैज्ञानिक ममता शर्मा ने बताया कि चने के 5000 से अधिक आनुवंशिक नमूनों का विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में परीक्षण किया गया। इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले नमूनों की पहचान हुई है, जिनका उपयोग रोगरोधी किस्में विकसित करने में किया जा सकता है। भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) मोहाली के वैज्ञानिक संतोष बी. सतभाई ने कहा कि चूने की अधिकता वाली मिट्टी में पौधों को पर्याप्त लौह तत्व नहीं मिल पाता। इससे उनकी वृद्धि, उत्पादकता और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ सकती हैं फसलों की बीमारियां
हैदराबाद स्थित अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईएसएटी) की वैज्ञानिक ममता शर्मा ने बताया कि चने के 5000 से अधिक आनुवंशिक नमूनों का विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में परीक्षण किया गया। इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले नमूनों की पहचान हुई है, जिनका उपयोग रोगरोधी किस्में विकसित करने में किया जा सकता है। भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) मोहाली के वैज्ञानिक संतोष बी. सतभाई ने कहा कि चूने की अधिकता वाली मिट्टी में पौधों को पर्याप्त लौह तत्व नहीं मिल पाता। इससे उनकी वृद्धि, उत्पादकता और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed